Thursday, August 7, 2014

काश !तुम मेरे साथ रहती




आज-कल मुझे
किसी के फ़ोन का
इन्तजार नहीं रहता

जब तक तुम साथ थी
इन्तजार रहता था
तुम्हारे फोन का

दिन में आ जाते थे
पांच -सात फ़ोन तुम्हारे
दो-चार मैं भी कर लेता था

लेकिन अब किस के
फ़ोन का इन्तजार करू 
और किस को मैं करूँ ?

दिन में कभी-कभी 
भूल से खोल लेता हूँ 
टेबल की दराज को 

यह देखने के लिए 
कि तुम्हारा कोई 
फ़ोन तो नहीं आ गया 

लेकिन दूसरे ही पल 
ख़याल आता है 
अरे ! तुम्हारा फ़ोन तो 
अब कभी नहीं आने वाला 

अनमना हो 
देखने लगता हूँ 
फ़ोन पर लगी 
तुम्हारी तस्वीर को

सोचता हूँ काश ! 
हमेशा हम दोना का 
साथ बना रहता

जैसे सीप और मोती 
सूरज और प्रकाश 
दीपक और बाती 
काश ! ऐसा होता।  



कोलकाता
६ अगस्त, २०१४

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