Tuesday, February 3, 2015

बाळपणो (राजस्थानी कविता)

गाँव में सगळा सागै
कौनी हुंवतो
खून रो रिस्तो 

पण हुंवतो सगळा रे सागै 
चाची-ताई-भाभी अर 
ताऊ-चाचा रो रिस्तो 

म्हारो टाबरपणो
पार हुवंता ही 
स्हैर खिंच ल्यायो मनै
आपके कनै 

पण म्हारौ बाळपणो
ओज्युं गाँव मांय   
गुवाड़ी री चूंतरया माथै 
पग लटकायां बैठ्यो है 

गाँव री बूढी-बडेरया 
ओज्युं संज्यों राखी है 
म्हारी तोतली बोली ने  
आपरै मना मांय 

म्हारै बाळपणै री तस्वीरा
ओज्युं जम्योड़ी है
बारै निजरां मांय 

गाँव जाऊँ जणा
दोन्यू हाथ माथै फैर'र
दैव मनस्यूं आसीसा

थारी हजारी उमर हुवै
तू सदा सुखी रेवै
दुधां न्हावै अर पूतां फळै 

ओ गाँव है
अठै मन रो रिस्तो रैवै
अपणायत रो रिस्तो रैवै

मिनखपणो दिखै
ठौर-ठौर पर अठै
हेत र नेह री ओज्युं
लैरा ब्येवै गांव मेँ अठै। 













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