Sunday, December 13, 2020

भोग का चिंतन नहीं छोड़ सके

वेदियां सजाते रहे 
हवन करते रहे 
तिलक लगाते रहे 
भंडारा देते रहे 
मगर अंतस का 
परिवर्तन नहीं कर सके। 

तीर्थों में घूमते रहे 
दर्शन करते रहे 
धर्मग्रन्थ पढ़ते रहे 
प्रसाद लेते रहे  
मगर जीवन से 
राग-द्वेष को नहीं छोड़ सके। 
 
व्याख्यान सुनते रहे 
जयकारा लगते रहे 
माला फेरते रहे 
कीर्तन करते रहे 
मगर अहं का 
अवरोध नहीं हटा सके। 

मंदिरों में जाते रहे 
आरतियां करते रहे 
घंटियां बजाते रहे 
चरणामृत लेते रहे 
मगर भोग का 
चिंतन नहीं छोड़ सके।  



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )







4 comments:

  1. धार्मिक कर्मकांड दिखावटी और खोकले बन गए हैं।
    मंदिर या मस्जिद जैसी संस्थाओं में शांति नहीं रही
    अंतस व विचार बिगड़े रह जाते हैं।
    बहुत सुंदर रचना।

    नई रचना- समानता

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