Friday, March 31, 2023

बोली में मिठास है रामराम की

मेरे पास न पहाड़ों के गीत 
न घाटियों और दर्रों के 
न नदियों और नाविकों के 
न सागर और मछुवारों के 
मैं तो मरुधरा का रहने वाला हूँ 
थोड़े से सुर है अलगोजों के
सांसों में महक है मिट्टी की 
थोड़ी सी छांव है खेजड़ी की 
बोली में मिठास है रामराम की।  



Tuesday, March 21, 2023

जय-जय गंगा मईया

पर्वतों को चूमती 
लहरों संग मचलती 
धरती को सींचती 
कलकल करती गंगा 
जब हरिद्वार में प्रवेश करती
कोटि-कोटि कण्ठों से गूंजता है  
जय-जय गंगा मईया। 




हर्पिस व्याधि

मैंने तो तुम्हें नहीं बुलाया 
न कभी तुम्हें पुकारा 
तुम्हीं भीगी बिल्ली की तरह 
चुपचाप आ घुसी मेरी पीठ में 
और बैठ गई जम कर।  

तुम बेहया हो 
तुम विषनागिनी हो 
तुमने जकड लिया मेरी पीठ को 
न जाने तुमने कितनों को 
अपने पंजों में जकड़ा होगा 
तुम ईर्ष्याग्रस्त हो
अत्याचार कर रही हो। 

मैं कहता हूँ 
तुम अभी भी चली जाओ 
वरना हम ऐसा करेंगे कि तुम्हें 
छठी का दूध याद आ जाएगा  
अभी भी समय है लौट जाओ 
हर्पिस लौट जाओ। 



Friday, March 10, 2023

जीवन के टूटते रिश्तों का दर्द

पिता लुटा देता जीवन भर की कमाई 
बेटे की पढ़ाई - लिखाई के लिए,
बेटा नहीं करता माँ-बाप की चिंता 
चला जाता विदेश कॅरियर बनाने के लिए।
चंद पैसे कमाते ही बेटा बोलने लगता 
क्या किया था आपने हमारे लिए,
आपके पास पांच रुपये नहीं होते थे 
हमें चॉकलेट खरीद कर देने के लिए। 

बेटी ससुराल की बातें बताने लगती पीहर में 
पीहर का दखल शुरू होता बेटी के लिए,
थोड़े दिन बाद ही हो जाता है मनमुटाव  
दोनों कर देते हैं केस अलगाव के लिए।

टूट जाते हैं रिश्ते छोटी छोटी बातों में
जो कसक देते रहते हैं जीवन भर के लिए,
जीवन का असली सुख तो परिवार के संग है 
धन तो केवल साधन है जीवन यापन के लिए। 
















Monday, March 6, 2023

उन्मन आँखें भर आई

फागुन आया मीत न आई  
बसन्त रह गया  सपनों में,
तस्वीर उसकी टँगी हुई है   
यादों की चार सलाखों में। 

बिन सजनी  जिया न लागे 
फाग का रंग न चढ़े मन में,   
तन की पीड़ा और बढ़ गई 
इस मौसम  की पुरवाई में।

कौन  मलेगा  रंग गालों पर 
कौन  भरेगा  अब  बाँहों में  
हंसी - ठिठोली  रीती  सारी 
बैरंग  हुवा  मन  फागुन  में। 

हमजोली  की चंचल  नजरें 
अब नहीं टकरेगी होली  में, 
रंग गुलाल उड़ेगा चहुँ दिसि 
पर  मजा  न होगा  होली में। 




Friday, March 3, 2023

बस्तियाँ जलती रही

जमीन को खाली कराने  
सरकारी फरमान निकला 
पुलिस बल साथ लेकर 
अस डी एम खुद निकला 

भीड़ चिल्लाती रही 
बुलडोज़र घरों को रौंदता 
आगे बढ़ता रहा 
औरतें छाती पीटती रही 
शासन बस्ती उजाड़ता रहा 

माँ-बेटी दौड़ी अन्दर 
बंद कर लिया दरवाजा 
बचाने अपना घर 
बाहर किसी ने लगादी आग 
धूं-धूं कर जलने लगा घर 

लपटे ऊँची उठने लगी 
माँ-बेटी जलती रही अन्दर  
आकाश सारा हो गया लाल 
आर्तनाद सुनाई देता रहा बाहर

भीड़ अपनी आवाज से 
आकाश पाताल एक करती रही  
सरकार के कानों जूं तक नहीं रेंगी  
जमीन खाली कराने बस्तियाँ जलती रही।