Monday, August 23, 2021

गुलदस्ता

सबकी  प्रशंसा की  भूख  बढ़ गई 
परिवार  वालों से   दूरिया बढ़ गई 
वाह वाह कहने वाले रिश्ते जो बने 
खून के  रिश्तों में  दरारे  पड़ गई। 

प्रभु ने हम सब को इन्शान बनाया 
हमने नए धर्म और पंथ को चलाया 
अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बता कर
फिर एक दूजे को काफिर बताया। 

जो आया है उसे  एक दिन जाना है 
कागज़ की नाव को तो डूब जाना है  
रोज मरने वालों को हम देख रहें हैं 
फिर भी हमने इसे नहीं पहचाना है।

दिन भर मोबाईल पर चैट करते हैं 
हर समय उसको साथ में  रखते हैं 
रेडिएशन से बिमारियाँ  बढ़ रही है 
फिर भी सभी लापरवाही करते हैं।  


Saturday, August 21, 2021

फूलों की हँसी

रहती थी एक परी 
फूलों के घर में
विद्यादेवी ले गई उसे 
सात समंदर पार 
घर के फूल उदास हो गए। 

अपनी अनवरत साधना के बल 
परी एक दिन सफल हुई 
विद्यादेवी से वरदान पाने में 
अपना नाम रोशन कर 
परी निकल गई विद्यामंदिर से। 

बाहर मुद्राराक्षस ने 
अपना जाल फैला रखा था 
परी अनजाने में फंस गई जाल में। 

क्या परी अब 
मुद्राराक्षस के तिलस्म को तोड़ पाएगी ?
डॉलर के मायालोक को छोड़ पाएगी ?
सभी प्रश्न तो सामने खड़े हैं। 

घर के फूल तो आज भी उदास है
परी का स्वदेश लौट कर आना ही 
घर के आँगन की ख़ुशी 
और फूलों की हँसी है। 


 


रिश्तों की रूबाइयाँ


मैं अब कोई तर्क  नहीं करता 
सब की चुपचाप सुनता रहता 
जीवन  की  साँझ  ढलने लगी  
अब बोल कर भी क्या करता। 

किसी से कुछ नहीं कहना है 
रिश्तों को  केवल  निभाना है 
कुछ चोटें जो दिल  पर लगी 
उन्हें भी चुपचाप ही सहना है। 

जीवन का उद्देश्य बदल गया 
धन-दौलत सब कुछ हो गया 
कहते थे जिसे  हाथ  का मेल 
वही आज सब कुछ हो गया। 

स्वार्थ में बेटे भी रिस्ता भूल गए 
माँ बाप का अहसान भूल गए 
कड़वे बोल इस तरह से बोले 
जिंदगी भर का घाव कर गए।  

बाप बेटे की सुनकर भी जीता है 
दर्द सह कर रिश्ता निभाता है 
क्या करे वो बाप जो कहलाता 
गम खाता और  आँसूं पीता है। 


Monday, August 16, 2021

मेरे जीवन की स्वर्णिम निधि

तुम थी मेरी जीवन-साथी 
तुम थी जीवन की आशा,
जन्म-जन्म तक साथ रहें 
यह  थी प्यारी अभिलाषा।  

दुःख-सुख दोनों एक भाव 
हमने सब संग - संग झेला,
जीवन का आनन्द उठाया 
हर मौसम  हँस कर झेला। 

धुप-छाँव के इस जीवन में 
तुमने  मेरा  साथ  निभाया,
चारों  पुत्रों को  पढ़ा लिखा 
तुमने उनको योग्य बनाया। 

सुन्दर - सुन्दर  बहुऍं आई 
उनसे  सदा  प्रशंसा   पाई, 
मान -  मर्यादा में  रह कर 
तुमने अपनी  धाक जमाई। 

चार पोते और तीन पोतियाँ  
उनको दिनी  स्नेहिल छाया, 
नाम सुशीला किया सार्थक 
मेरा  सदा सम्मान  बढ़ाया। 

Friday, August 13, 2021

रजनीगंधा महकाने कब आओगी ?

हे गुलाबी अधरों वाली 
मेरी रूपसि !
तुम सप्त-सुर सजाने कब आओगी।           
सावन की भीगी रातों में 
अमृत कण बरसाने कब आओगी।  

हे शबनमी नेत्रों वाली 
मेरी प्रेयसी !
तुम नेह-निमंत्रण देने कब आओगी, 
अभिलाषाओं की गलियों में 
नयनों का प्यार बरसाने कब आओगी ? 

हे मृदु कपोलों वाली 
मेरी मानिनी !
तुम प्रणय गीत सुनाने कब आओगी, 
मदभरे प्यारे मौसम में 
यौवन मदिरा बरसाने कब आओगी ?

हे कोमलांगिनी 
मेरी मोहिनी !     
तुम पायल की रुनझुन सुनाने कब आओगी।
मेरे सपनों के मधुबन में 
रजनीगंधा महकाने कब आओगी ? 



Saturday, August 7, 2021

बादल गरजे बरसे कौनी ( राजस्थानी कविता )

बादल गरजे बरसे कौनी 
बळती चालै  जबर घणी
सोनळ धोरां धधके बालू 
बळबा लागी कणी-कणी। 

राह देखता  आँख्यां रेगी 
बरसे  सूरज  लाय  घणी, 
खेता माईं   धान सूकग्यो 
कठै लुकग्यौ म्हेरो धणी।
 
तीसा मरता  डांगर मरग्या 
ताल - तैलया सुख्या पाणी, 
रिणरोही में  उड़ै बघुलिया 
कद बरसलो अम्बर पाणी। 

सावण उतर भादौ  लागग्यो 
ईन्दर  बरस्यो  कौनी  पाणी 
आवो सगळां बिरख लगावा 
जद  बरसलो  अम्बर  पाणी। 





Monday, August 2, 2021

ईश्वर और कवि

ईश्वर और कवि 
दोनों का काम ही 
सृजन करना है 

ईश्वर मनुष्य का 
और कवि कविता का 
सृजन करता है 

कवि खुश होता है 
कविता का सृजन कर के 
होता है उसके प्रति समर्पित 

क्या ईश्वर भी अब 
खुश है अपनी कृति से 
समर्पित है अपनी रचना को ?