Wednesday, September 2, 2009
Monday, August 31, 2009
जीवन की साँझ
बहारों के साथ मैंने भी गुनगुनाया था
अब वो गुलसन वीरान हो गया है
हसीन पलों को मैंने भी जिया था
अब वो चमन कहीं खो गया है
चाँदनी रातो में मैंने भी गीत गाये थे
अब वो गीत कहीं खो गए हैं
फूलों से राहों को मैंने भी सजाया था
अब वो राहें वीरान हो गई हैं
जिन्दगी में अनेक बसन्त आये थे
अब तो वहां पतझड़ आ गया है
कल्पना के पंखो से चाँद को छुआ था
अब कल्पना के पाखी उड़ गए हैं
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तूफ़ान की पीठ चढ़ दुनिया घूमा था
अब तूफ़ान भी शांत हो गया है
किरणों को पकड़ आकाश को छुआ था
अब वो भुजाऐं निर्मल हो गई हैं
अब वो भुजाऐं निर्मल हो गई हैं
उगते सूरज के साथ मैं भी हँसा था
अब ढलते सूरज को देख रहा हूँ
जीवन का बसंत तो बीत गया
अब तो यादों के सहारे जी रहा हूँ।
कोलकात्ता
३१ अगस्त २००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
Sunday, August 30, 2009
उदगम का खोना
अस्पताल में तुम
रूग्ण-बीमार
रूग्ण-बीमार
प्रतीक्षारत
अपनी अनन्त
यात्रा के लिए
तुम्हे पता है कि
तुम अब चंद घंटो की
मेहमान हो
तब भी तुम्हे
मेरी ही चिंता रही
मैं खड़ी खड़ी थक जाउंगी
मेरी ही चिंता रही
मैं खड़ी खड़ी थक जाउंगी
महा प्रयाण के
समय तक तुम मेरा हाथ
अपने हाथ में थामे रहीकितना स्नेह था
ममत्व था माँ
तुम्हारे अन्दर
आज तुम्हे
चले जाना है
अपनी अनन्त यात्रा पर
सदा-सदा के लिए
सब कुछ यहीं
छोड़ कर
छोड़ कर
डबडबा रही है
मेरी आँखे
कलेजे में हुक सी
उठ रही है
कलेजे में हुक सी
उठ रही है
मुझे दुःख है
आज मेरे
उदगम के खोने का।
लेखिका: सुशीला कांकाणी
दिनांक: १७.०४.२००६
Tuesday, March 17, 2009
गाय का बछड़ा
गाय ने बछड़ा वहाँ दिया था
बछडा कृष्णा को प्यारा लगा
साथ में उसके खेलने लगा
रोज सवेरे जल्दी उठता
दौड़ पास बछड़े के जाता
प्यार से उसको गले लगाता
कभी हाथ से उसे सहलाता
कृष्णा की छुट्टिया खत्म हो गई
वापिस आने की टिकट बन गई
जाकर झट नानी से बोला
नट-खट ओ भोला-भाला
बछड़े की भी टिकट बना दो
प्लेन में मेरे साथ बिठा दो
मैं इसको ले कर जाऊँगा
साथ में इसके मैं खेलूँगा
नानी ने उसको समझाया
माँ -बेटे का प्यार बताया
माँ से अलग बेटे को करना
बड़ा पाप है ध्यान में रखना
कृष्णा को झट समझ आ गया
वापिस अपने घर को आ गया।
एक दिन नानी को फ़ोन मिलाया
बछडे से बात करावो उन्हें बताया
नानी बछड़ा बनकर बोली
प्यारी मीठी वाणी बोली
अच्छे-अच्छे काम करो
दुनिया में तुम नाम करो
पढ़ -लिख कर विद्वान बनो
पाकर ज्ञान महान बनो
करो बड़ो का आदर तुम
प्यार सभी का पावो तुम।
कोलकत्ता
17 मार्च 2009
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
17 मार्च 2009
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
Saturday, February 28, 2009
मेरा गाँव
गाँव में वह पीपल का पेड़ भी नहीं रहा
जिस पर हम सब मिल कर खेलते थे
जिस पर हम सब मिल कर खेलते थे
आशु काका की बैलगाड़ी भी नहीं रही
जिस पर चढ़ कर शहर जाया करते थे
मेरा गांव अब बदल गया है।
कुम्हार काकी का अब नाच भी नही रहा
जो शादियों में ढोल पर हुआ करता था
जो शादियों में ढोल पर हुआ करता था
दूध- दही की नदियाँ भी अब नहीं बहती
जो घर पर मेहमान आने पर बहती थी।
मेरा गाँव अब बदल गया है।
अलागोजों पर कजली भी नहीं गाई जाती
जो गायों को चराते समय चरवाहे गाते थे
गौरियां भी अब चौपाल में गीत नहीं गाती
जो गणगौर के पूजन के समय गाती थी
मेरा गाँव अब बदल गया है।
गाँव में अब निर्विरोध चुनाव भी नहीं होते
जो मालू काका के सरपंच रहने तक हुए थे
चौपाल पर अब हँसी ठहाके भी नहीं लगते
जो बलजी के रहते समय तक लगा करते थे
मेरा गाँव अब बदल गया है।
गाँव में अब पनघट पर पायल भी नहीं बजती
जो कभी बनठन करऔरतें पानी लाने जाती थी
गांव में अब लम्बे घूँघट भी दिखाई नहीं देते
जो कभी गाँव की औरतें निकाला करती थी |
मेरा गाँव अब बदल गया हैं।
कोलकत्ता
२८ फ़रवरी,२००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
Wednesday, February 18, 2009
अन्तिम अध्याय
इतिहास का अन्तिम अध्याय
कभी नही लिखा जाता है
यह तो हर पीढ़ी दर पीढ़ी
पुस्त दर पुस्त लिखा जाता है
हर बार मरे हुओं को जीवितों की
अदालत में पेश किया जाता है
कभी फूलों की माला तो कभी
काँटों का ताज पहनाया जाता है
हर सदी में कोई अच्छा तो
कोई बुरा काम होता है
राम के साथ रावण का
इतिहास भी लिखा जाता है
इतिहास के पन्नों में यही सब
जुड़ता चला जाता है
इतिहास का अन्तिम अध्याय
कभी नही लिखा जाता है।
कोलकत्ता
१७ फ़रवरी २००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
Tuesday, February 17, 2009
सत्ता का हस्तांतरण
बहू ने
सास की थाली में
घी से चुपड़ी चपाती
को रखा
प्यार से कहा -
खाइए !
खाइए !
थक गई तो
लोग कहेंगे
बहू ने सास को
ठीक से नही रखा
ठीक से नही रखा
सास के
मुँह में जानेवाला ग्रास
हाथ में ही थम गया
आज अचानक
सास को वास्तविकता
का ज्ञान हो गया
कल तक
सास जो बहू को
अपने पास रखने का
दम भर रही थी
आज बहू
उसे अपने पास रखने
का एहसास दिला रही थी
शब्दों के
बोल में ही सब कुछ
बदल गया था
अनजाने में ही
शान्ति से
शान्ति से
सत्ता का हस्तांतरण
हो गया था।
कोलकत्ता
१७ फ़रवरी, २००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
कोलकत्ता
१७ फ़रवरी, २००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
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