Thursday, September 10, 2009

बर्ड फ्लू



मुर्गी बोली
सुनो प्रिये
बर्ड फ्लू
आ गया है
इंसान अब
हमें नही
खायेगा 

अब हम
थोड़े नहीं
बहुत साल

आराम से जियेंगे

मुर्गा बोला
तुम भूल रही हो
तुम जानवरों के नहीं 
इन्सान के पल्ले
पड़ी हो 

अरे  !
इन्सान तो
अपनों को भी
नहीं छोड़ते
तुमको क्या छोडेंगे

पहले तो
दस बीस को
मारते थे

अब तो
हजारों को
एक साथ मारेंगे।



कोलकत्ता
९ सितम्बर, २००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, September 8, 2009

दादीजी की कहानी

दादी ने बच्चों से कहा-
बच्चों आओ मैं तुम्हें 
एक कहानी सुनाऊँ

बड़ा राहुल बोला-
दादीजी अभी मैं
होमवर्क कर रहा हूँ
बाद में सुनूँगा

मँझली पूजा बोली-
दादीजी अभी मैं
टी.वी देख रही हूँ
बाद में सुनूंगी

छोटी राधिका बोली-
दादीजी अभी मैं
फ्रेंड से बात कर रही हूँ
बाद में सुनूंगी

सबसे छोटा कृष्णा बोला-
दादीजी अभी मैं
कंप्यूटर पर गेम खेल रहा हूँ
बाद में सुनूँगा

दादी जी ने रूठते हुए कहा -
अब मैं तुम्हें कभी कहानी
नही सुनाऊँगी

सभी बच्चे
एक साथ बोले -
हम इंटरनेट पर ही सुन लेंगे।




कोलकत्ता
८ सितम्बर, २००९

Sunday, September 6, 2009

कबूतर को दाना






माँ अपने
कमरे में
रोज रात को
एक कटोरा भर कर
दाना रखती 


मुहें अंधेरे
उठ कर
छत पर
जाकर
कबूतरों को
दाना डाल आती

कभी
आराम-बीमार
हो जाती
तो हमें कहती
जाओ कबूतरों
को दाना डाल आओ

वो कौन से
तुम से माँगने आयेंगे
बेचारे बिन झोली के
फ़कीर हैं 

माँ के
जाने के बाद
ये काम
माँ की बहू
कर रही है

रोज सवेरे
उठ कर
छत पर जाकर
कबूतरों को दाना 
डाल आती है

कहती है
बेचारे बिन झोली के
फ़कीर है

और यही 
हमारी संस्कृति की
लकीर है।  


      कोलकत्ता
 ६ सितम्बर,२००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
  

Friday, September 4, 2009

बिल्ली को बुखार




पूसी बिल्ली को हो चढ़ा बुखार
टेम्परेचर हो गया एक सौ चार

भोलू डॉक्टर को उसे दिखाया
उसने पूसी को वायरल बताया

झट एक इंजेक्शन लगवाया
फ़िर थोड़ा परहेज़ बताया

नहीं दौड़ोगी चूहों के पीछे 
नही खाओगी  दूध मलाई  

सोंठ डालकर काढा पीकर
तुम सोओगी ओढ़ रजाई

अभी करोगी तुम आराम 
 पूसी को हो गया जुकाम।





कोलकत्ता
४ दिसम्बर, २००९


(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Wednesday, September 2, 2009

कोल्हु का बैल


मेरे गांव में
कालू कुम्हार के
घर एक बैल है 

बैल सुबह से
 शाम तक कोल्हू
  चलाता है

 वह तब तक
चलाता रहेगा
जब तक वो जिन्दा रहेगा

शहर में
इस बैल का
प्रतिनिधित्व मैं करता हूँ 

सुबह से शाम तक
कोल्हू का बैल
बना घूमता रहता हूँ

और
  तब तक
   घूमता रहूँगा
       जब तक ......  .I




Monday, August 31, 2009

जीवन की साँझ



  बहारों के साथ मैंने भी गुनगुनाया था        
           अब वो गुलसन वीरान हो गया है 
  हसीन पलों को मैंने भी जिया था              
                अब वो चमन कहीं खो गया है 

चाँदनी रातो में मैंने भी गीत गाये थे        
                 अब वो गीत कहीं खो गए हैं
फूलों से राहों को मैंने भी सजाया था       
                   अब वो राहें वीरान हो गई हैं 

जिन्दगी में अनेक बसन्त आये थे           
                     अब तो वहां पतझड़ आ गया है       
     कल्पना के पंखो से चाँद को छुआ था          
                       अब कल्पना के पाखी उड़ गए हैं           
  |
तूफ़ान की पीठ चढ़ दुनिया घूमा था       
                  अब तूफ़ान भी शांत हो गया है   
   किरणों को पकड़ आकाश को छुआ था             
                   अब वो भुजाऐं निर्मल हो गई हैं    

        उगते सूरज के साथ मैं भी हँसा था                  
                     अब ढलते सूरज को देख रहा हूँ         
जीवन का बसंत तो बीत गया             
              अब तो यादों के सहारे जी रहा हूँ। 


कोलकात्ता                                                                                                                                            
३१ अगस्त  २००९
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Sunday, August 30, 2009

उदगम का खोना

अस्पताल में तुम
रूग्ण-बीमार
खाट पर सोई हुयी

प्रतीक्षारत 
अपनी अनन्त
यात्रा के लिए

तुम्हे पता है कि 
तुम अब चंद घंटो की 
मेहमान हो

तब भी तुम्हे
मेरी ही चिंता रही
मैं खड़ी खड़ी थक जाउंगी 

महा प्रयाण के
समय तक तुम मेरा हाथ 
अपने हाथ में थामे रही

कितना स्नेह था
ममत्व था माँ
तुम्हारे अन्दर

आज तुम्हे
चले जाना है
अपनी अनन्त यात्रा पर

सदा-सदा के लिए
सब कुछ यहीं
छोड़ कर

डबडबा रही है
मेरी आँखे
कलेजे में हुक सी
उठ रही है 

मुझे दुःख है
आज मेरे 
उदगम के खोने का। 


लेखिका: सुशीला कांकाणी
दिनांक: १७.०४.२००६