Wednesday, August 10, 2011

भूलें नहीं,



प्रभु ! हम तुम्हे भूलें नहीं    
कहने से काम चलेगा नहीं 
    
                         पूरी तरह सर्मर्पित हो कर  
                           हर कर्म करे प्रभु निमित्त   

समर्पित कर दें जीवन प्रभु में
   निमित्त हो जाये प्रभु हाथ में

                                        चाहे पत्तो की तरह उड़ाएं 
                                            चाहे फूलो की तरह खिलाएं       

प्रभु जो करें हम सिर धरे 
    सब कुछ प्रभु के नाम करें।     


कोलकत्ता
१० अगस्त, २०११
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, August 8, 2011

आएगा जरुर.



एक दिन
ऐसा भी आएगा

सुदूर युग में ही सही 
लेकिन एक दिन 
आएगा जरूर

जब कोई भी अमीर या
गरीब नहीं होगा
सभी समान रूप से
सम्पन्न होंगे

जब कोई भी असहाय या
निर्बल नहीं होगा
सभी स्वस्थ और
नीरोग होंगे

जब रंगभेद और 
जातपांत का भेद नहीं होगा
सभी भाईचारे के साथ
प्रेम से रहेंगे 

जब अणुबम और 
मिसाइले नहीं बनेंगी
दुनिया के लोग शान्ति और 
सौहार्द से रहेंगे 

जब अपराध और अत्याचार
का कहीं नाम नहीं होगा
सभी ईमानदारी और 
सच्चाई पर चलेंगे

जब धर्म और मजहब के नाम 
पर लोग नहीं बंटेंगे 
मानव सेवा को ही 
सर्वोच्च समझेंगे

जब युद्ध और संघर्षों का
नाम नहीं होगा
इंसान की आँख से
आँसू नहीं गिरेंगे 

जब दुनिया सीमाओं में
नहीं बंटी होगी
सभी वसुधैव कुटुंब के  
सिद्धांत पर जियेंगे

जब हर तरफ सुख ही
सुख बरसेगा
पूरा ब्रहमाण्ड धरती को
ही स्वर्ग समझेगा

 एक दिन
ऐसा आएगा जरूर,
सुदुर युग में ही सही
लेकिन आयेगा जरुर। 


   कोलकाता                                                                                                                                                 
८ अगस्त, 2011
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )





Thursday, August 4, 2011

साथ-साथ



जब तुमने अपना
हाथ मेरे हाथ में दिया था
तो हमने वादा किया था
साथ जियेंगे
साथ मरेंगे 

आज तक
तुमने मेरा साथ निभाया
हाथ में हाथ डाल
पूरी दुनिया में घुमाया 

अब वो हाथ
तुम क्यों छुडाना चाहती हो
आगे का सफ़र क्यों अकेली
करना चाहती हो ? 

मत छुड़ावो
अपना हाथ मेरे हाथ से
रहने दो इसे अभी मेरे हाथ में

 अभी हम
बाकि दुनियां को देखेंगे
साथ-साथ घूमेंगे

और फिर 
चलेंगे साथ-साथ
एक दूजे का हाथ पकड़
क्षितिज के उस पार तक

जहां जाकर
कोई वापिस नहीं आता
 वहाँ तक। 





कोलकत्ता
३  अगस्त, २०११


(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

मोक्ष


पीड़ा से कहराती
बुढ़िया बोली-
  " भगवन अब उठाले " 

"तथास्तु"
नेपथ्य से आवाज आई 

"मरे मेरे दुश्मन,
 मै क्यों मरू " -
बुढ़िया बुदबुदाई 

जीने की चाहत 
मरती नहीं 
फिर कैसी
मोक्ष की कामना ?



कोलकता
३ अगस्त, २०११

Tuesday, August 2, 2011

आज के गीत



एक समय था
जब गीत गाये जाते थे

खेतों में
खलिहानों में
पनघट पर
पहाड़ों पर
सर्वत्र
गीत गाये जाते थे

वो गीत
हृदय से निकला करते थे 
दुःख-सुख में साथ रहते थे
श्रम में हौंसला बढ़ाते थे

अब गीत
श्रम या सुख दुःख
से नहीं निकलते
वो अर्थ से निकलते हैं 

अब गीतों में
न छंद है न लय है 
न ताल है न स्वर है

आज गीत
जीवन के गीत नहीं
जीविका के गीत बन गए हैं। 

कोलकाता
२ अगस्त, 2011

यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, August 1, 2011

टूटता सपना

पढाई करके
जब कलकता कमाने निकला
तब यह सोच कर निकला
एक लाख कमाने के बाद
वापिस गाँव लौट आऊँगा 

गाँव आकर
प्रकृति के संग रहूँगा
खेती करूँगा
गाय भैंस को पालूँगा

खालिश दूध के साथ
रोटी खाऊँगा
अपनी आठों याम
मस्ती के सँग जीऊँगा

गाँव में बच्चों को
अपने ढंग से पढाऊँगा
अस्पताल खुलवाऊँगा
सड़के बनवाऊँगा

बिजली लगवाऊँगा
अपने गाँव को एक
आदर्श गाँव बनवाऊँगा 

आज एक लाख
की जगह सैकड़ों लाख
कमा लिए लेकिन संतोष
अभी भी नहीं आया है

अब मै टाटा,बिड़ला
अम्बानी की जीवनी को 
पढ़ने लगा हूँ

एक कहावत है 
सपने देखने वालों के ही
सपने पूरे होते हैं

और मै अब 
इसकी सच्चाई को
परखने में लगा हुआ हूँ

मैंने अपनी चाहतों के
जो मोती कभी पिरोये थे
उन्हें आज भी पिरोना चाहता हूँ
लेकिन बुद्धि तर्क दे कर
मन को समझा देती है 

क्या करोगे वहाँ जाकर ?
जो काम तुम करना चाहते थे
वो काम गांवों में सरकार कर रही है

और जब सरकार कर रही है तो 
तुम्हारे करने के लिए
अब गाँव में रहा ही क्या है ?

ऐसा सिर्फ
मेरे साथ ही नहीं
मेरे बहुत से दोस्तों के
साथ भी हुआ है।  


कोलकत्ता
३१ जुलाई,२०११ 
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Sunday, July 31, 2011

मत बदलो

ग्वाल- बालों को अलगोजे पर
अपने लोक गीत गाने दो
मत उनके होठों पर
नए तराने सजाओ 

पनघट पर जाती गौरियों को
घूँघट से ही झांकने दो
मत उनको पश्चिमि
रंग में सजाओ 

मेहमान का स्वागत
छाछ और मट्ठे से करो
मत उनको कोका कोला
   पिलाकर स्वास्थ्य नष्ट  करो 

  बुड्ढे माँ- बाप की सेवा   
घर पर रख कर ही करो
 वृद्धाश्रम भेज कर अपना
 भविष्य मत बिगाड़ो

पेड़-पौधों और पर्यावरण
की रक्षा करो
जंगलों को काट कर 
  अपना जीवन मत बिगाड़ो।

  कोलकत्ता                                                                                                                                            
३१ जुलाई, २०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )