Tuesday, January 9, 2018

घर की निशानी चली गई

बस्ते के बोझ तले बचपन बीत गया
मस्ती भरी सुहानी नादाँ उम्र चली गई।

तेल,नून,लकड़ी के भाव पूछता रह गया
जीवन से झुंझती मस्त जवानी चली गई।

बुढ़ापा क्या आया सब कुछ चला गया
दरिया सरीखी दिल की रवानी चली गई।

चूड़ियाँ, बिन्दी, मंगलसुत्र सब हट गया
औरतों के सुहाग की निशानी चली गई।

पढ़-लिख कर बेटा शहर चला  गया
बाप के बुढ़ापा की उम्मीद चली गई।

गांव का जवाँ फ़िल्मी गीतों में रीझ गया
मेघ मल्हार, कजली की तानें चली गई।

गांव में खाली पड़ा मकान बिक गया
गांव की जमीं से घर की निशां चली गई।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )

Wednesday, January 3, 2018

बरस बीतग्या (राजस्थानी कविता )

सहेळ्या रो झुलरों
माथै पर घड़ो
बणीठणी पणिहारियाँ देख्या न्हं
बरस बीतग्या।

सोनल बरणा धौरा
खेजड़ी'र खोखा
मोरियाँ रो नाच देख्यां न्हं
बरस बीतग्या।

फोग'र रोहिड़ा
खेत'र खळां
मदवा ऊंटां री गाज सुण्यां न्हं
बरस बीतग्या।

बळती अर लूवां
सरदी'र डांफर
भूतियो बगुळियो देख्यां न्हं
बरस बीतग्या।

सावण रो महीणो
रिमझिम बरसतो म्है
अलगोजा पर मूमल सुण्यां न्हं
बरस बीतग्या।

आँगण मायं माण्डना
ब्याव रो राती जोगो
लुगायां रो टूंटियों देख्यां न्हं 
बरस बीतग्या।

Monday, December 25, 2017

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं

भूल गया मैं सब रंगरलियाँ
सुख गई खुशियों की बगियाँ
जीवन की झांझर बेला में
पाई मैंने विछोह की पीड़ा

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा। 

लाख बार मन को समझाया
फिर भी मन नहीं भरमाया 
आँखों से अश्रु जल बहता 
कैसे छिपाऊं मन की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा।

डुब गया सूरज खुशियों का
संग-सफर छूटा जीवन का  
तुम तो मुक्त हुई जीवन से
मैंने पाई वियोग की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा।



 ( यह कविता "कुछ अनकही ***"में छप गई है। )

Friday, December 22, 2017

बहुत याद आती है

जब भी आकाश से
बरसती है रिमझिम बूँदें
मुझे याद आती है तुम्हारे
गेसुओं से टपकती बूँदें

मैं अक्सर खड़ा हो जाता हूँ
खिड़की खोल कर
देर तक खड़ा रहता हूँ
यादों की चादर ओढ़ कर

ऐसे बदलते मौसम में
बहुत याद आती है तुम्हारी
हवा की छोटी सी दस्तक भी
आहट लगती है तुम्हारी

बहुत सारे महीने और वर्ष
बित गए तुमसे बिछड़े
लेकिन तुम्हारा इन्तजार और
यादें आज तक नहीं बिछड़े

तुम्हारे विरह के दर्द में
आज भी लम्बी आहें भरता हूँ
हर सांस के संग
तुम्हें याद करता हूँ

तुम्हारी सूरत आँखों से
नहीं निकल पाती है
जितना भी भुलना चाहता हूँ
उतनी याद अधिक आती है।


फ्रेम में जड़ी तुम्हारी
तस्वीर देख कर सोचता हूँ
आज भी दमक रही होगी 
तुम्हारे भाल पर लाल बिंदिया

कन्धों पर लहरा रहे होंगे 
सुनहरे रेशमी बाल 
चहरे पर फूट रहा होगा 
हँसी का झरना

चमक रही होगी मद भरी आँखें
झेंप रही होगी थोड़ी सी पलकें
देह से फुट रही होगी 
संदली सौरभ 

बह रही होगी मन में  
मिलन की उमंग
बौरा रही होगी प्रीत चितवन 
गूंज रहा होगा रोम-रोम में
प्यार का अनहद नाद

मेरे मन में आज भी
थिरकती है तुम्हारी यादें
महसूस करता हूँ
तुम्हारी खुशबु को
तुम्हारे अहसास को।
फ्रेम में जड़ी तुम्हारी
तस्वीर देख कर सोचता हूँ
आज भी दमक रही होगी 
तुम्हारे भाल पर लाल बिंदिया

कन्धों पर लहरा रहे होंगे 
सुनहरे रेशमी बाल 
चहरे पर फूट रहा होगा 
हँसी का झरना

चमक रही होगी मद भरी आँखें
झेंप रही होगी थोड़ी सी पलकें
देह से फुट रही होगी 
संदली सौरभ 

बह रही होगी मन में  
मिलन की उमंग
बौरा रही होगी प्रीत चितवन 
गूंज रहा होगा रोम-रोम में
प्यार का अनहद नाद

मेरे मन में आज भी
थिरकती है तुम्हारी यादें
महसूस करता हूँ
तुम्हारी खुशबु को
तुम्हारे अहसास को।



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है ]



Friday, December 8, 2017

तुम आओगी ना

दिसंबर आ गया
तुम्हारा पश्मीना साल
अभी तक ज्यों का त्यों
रखा है अलमारी में
तुम्हें ही ओढ़ना है ना
तुम आओगी ना

ठण्ड भी बढ़ गई है
मेरा स्वेटर, मफलर
निकाल कर धुप में
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना

सुबह उठ कर
अदरक वाली चाय बना
तुम्हें ही पिलाना है ना
तुम आओगी ना

मीठी आंच में सेंक
गरम-गरम भुट्टे
निम्बू-नमक लगा
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना।




Wednesday, November 29, 2017

अक्सर मैं जब तनहा होता

अक्सर मैं जब तनहा होता, गीत तुम्हारे लिखता हूँ
बैठ कल्पना के पंखों पर, तुमसे मिलता रहता हूँ।

भूल हुई मुझसे जीतनी भी, मैं स्वीकार उन्हें करता हूँ
तुम छोड़ गई मझधार मुझे, यह स्वीकार नहीं करता हूँ। 

तुम तो भूल गई मुझको, पर मैं तो याद सदा करता हूँ
एक बार देखो ऊपर से, कब से तुम्हें निहार रहा हूँ।

नींद नहीं आती है मुझ को,यादों के संग मैं सोता हूँ 
  सपनों की गोदी  में चढ़, तुम से मिलता रहता हूँ।  

हर पल तुम्हारी यादों को, मैं दिल में बसाए  रखता हूँ
जब-जब याद तुम्हारी आती,  मैं गुनगुनाया करता हूँ।

आँखों से अश्रुजल बहता, जब भी तुम पर लिखता हूँ
कैसे लिख दूँ मन की बातें,जो कुछ लिखना चाहता हूँ।  



( यह कविता "कुछ अनकही" में छप गई है )

Thursday, November 23, 2017

सुकून भरी तुम्हारी यादें

मेरे ख्यालों में तुम थी
मेरे ख़्वाबों में तुम थी
मेरे परिहास में तुम थी
मेरे समर्पण में तुम थी
सुकून भरी तुम्हारी यादें।

मेरी शायरी में तुम थी
मेरी ग़ज़ल में तुम थी
मेरी सासों में तुम थी
मेरी बातों में तुम थी
सुकून भरी तुम्हारी यादें।

मेरी कल्पना तुम थी
मेरी भावना तुम थी
मेरी मोहब्बत तुम थी
मेरी आराधना तुम थी
सुकून भरी तुम्हारी यादें।

मेरी चाहत तुम थी
मेरी मंजिल तुम थी
मेरी जिंदगी तुम थी
मेरी बंदगी तुम थी
सुकून भरी तुम्हारी यादें।

मेरे दिल का करार तुम थी
मेरी रूह की पुकार तुम थी
मेरी रातों की नींद तुम थी
मेरे दिन का चैन तुम थी
सुकून भरी तुम्हारी यादें।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )