Saturday, March 9, 2024

ग़ज़ल

 जब से तुम बिछुड़ी हो मेरे जिंदगी से 
मेरी मंजिल का कोई ठौर ही नहीं रहा।

जब से हम दोनों की राहें अलग हुई  
मेरे जीवन में तो मधुमास ही नहीं रहा।  

मैं तो सदा राहों में आँखें बिछाता रहा 
तुम्हें तो राहों में चलना पसंद ही नहीं रहा। 

मैं तो सदा तुम्हारी आँखों में देखता रहा  
मुझे आईना में कभी विश्वाश ही नहीं रहा। 

कहते हैं शहरों में सब कुछ मिलता है    
मगर तुम्हारे जैसा प्यार तो कहीं नहीं रहा।   

Thursday, February 29, 2024

पिता की व्यथा

बेटे का भविष्य संवारने 
बाप सब कुछ करता है, 
जलती धूप ओढ़कर भी 
बेटे को छाया करता है। 

दिन-रात मेहनत करके 
बेटे का पालन करता है,
अपने सुख को भूल कर 
बेटे को खुशियां देता है। 

बेटे को पढ़ा-लिखा कर 
उसको योग्य बनाता है,
घर, जमीन, जायदाद 
सब बेटे को दे देता है। 

मगर बेटा बाप बनते ही 
बाप को भूल जाता है,
अपने कड़वे बोलो से 
बाप को आहत करता है। 

लाचार बाप बेबस होकर 
अपना भाग्य कोसता है, 
बेटे के जुबान खंजर से 
आँखों से अश्रु बहाता है। 




Monday, February 5, 2024

झूठ का बोलबाला

सदा सत्य मैं बोलता, कहता रहता  रोज, 
कितना झूठ बोलना, करता रहता खोज।  

सत्य तो अब रहा नहीं, चला गया है रूठ, 
यदि बोले कोई सत्य तो, मानो उसको झूठ।  

सतयुग के संग सत्य गया, जैसे था मेहमान, 
कलयुग में अब हो रहा,  झूठों का सम्मान। 

जीवन जीना होता कठिन, अगर न होता झूठ 
आपस में होती कलह, सब में पड़ती फुट। 

सत्य जेल में बंद हुवा, झठा करता मौज,  
जो जितना झूठ कहे, उसकी ऊँची औज । 



Saturday, December 16, 2023

गंगा की लहरों में समा गया

जेठ-आषाढ़ की गर्मियों  में
सत्संगी चले आते 
अपने परिवार के संग 
शांति की खोज में
एकांत तपोवन 
मुनि की रेती 
ऋषिकेश में

जहाँ पहाड़ियों की कोख में 
कलकल बहती गंगा 
सरसराती ठंडी हवा 
वृक्षों पर चहकते पंछी 
निः शब्द वातावरण में 
गूंजते प्रभु के गान 

सभी लगाते ध्यान 
करते प्रभु गुणगान 
बना खिचड़ी मिटाते क्षुधा 
रात में सो जाते गंगा किनारे 
आनंद की लहरे लेती हिलोरें 

देखत ही देखते 
सब कुछ बदल गया 
शहरी सभ्यता ने 
उथल-पुथल मचा दी 
सुख-सुविधा की सारी सामग्री 
मनोरंजन का सारा सामान 
जंगल में अमंगल करने 
आ गया 

पहाड़ों की कोख में 
छिपी शांति गायब हो गई 
पंछियों का कलराव
पत्तों की गुफ्तगू 
वृक्षों का प्रेमालाप 
प्रभु गुणगान 
सब कुछ गंगा की लहरों में 
समा गया।  




Saturday, May 13, 2023

तुम एक बार आ जाओ ना

पपीहा बोले वर्षा ऋतु आई 
यादें तुम्हारी घटा बन छाई 
तुम मेघा बन कर मुझ पर 
रिमझिम प्यार लुटा दो ना 
तुम एक बार आ जाओ ना। 

बिना तुम्हारे रह न सकूंगा 
प्रीति रस में बह न सकूंगा 
तुम चूनर ओढ़ सितारों की 
शुभ चूड़ियां खनका दो ना 
तुम एक बार आ जाओ ना। 

मैं तड़पूँ ज्यों धन में बिजुरी 
या जैसे हो जल बिन मछरी 
तुम अपने तन की खुशबू से 
मेरा  तन-मन महका दो ना
तुम एक बार आ जाओ ना। 

जीवन को पतझड़ ने घेरा 
गम का बढ़ने लगा अँधेरा 
तुम मेरे सुने मन मन्दिर में  
कोई सुन्दर राग छेड़ दो ना 
तुम एक बार आ जाओ ना। 








Friday, May 12, 2023

खुद ही बनना है खैवया

जीवन के इस रंगमंच पर 
मिलना और बिछुड़ना है,
         अपना अभिनय पूरा कर  
          वापिस सब को जाना है।

खाली  हाथ सभी आये हैं  
खाली  हाथ चले जाना  है,
       दुनियाँ  केवल रैन बसेरा 
        झूठा मन ही भरमाना है। 

सूरत गोरी हो या काली 
राख  सभी  को होना है, 
         जीवन के इस सफर में 
         मौत मुसाफिर खाना है।  

दुःख-सुख जीवन के साथी 
जीवन में संग-संग चलते हैं, 
       जन्म मृत्यु का खेल है सारा 
        आवागमन  यहाँ रहता  है।  

कोई नहीं  यहाँ  मेरा तेरा 
कोई नहीं  यहाँ  रह पाया, 
        अपने जीवन की नैया का 
          खुद ही बनना है खैवया।