Tuesday, March 17, 2009

गाय का बछड़ा


कृष्णा अपने ननिहाल गया था
   गाय ने बछड़ा वहाँ दिया था 
         बछडा कृष्णा को प्यारा लगा
            साथ में उसके खेलने लगा                               
                                     
रोज सवेरे जल्दी  उठता      
दौड़ पास बछड़े के जाता 
          प्यार से उसको गले लगाता
           कभी हाथ से उसे सहलाता                                          

कृष्णा की छुट्टिया खत्म हो गई 
वापिस आने की टिकट बन गई 
         जाकर झट नानी से बोला     
         नट-खट ओ  भोला-भाला                 

बछड़े की भी टिकट बना दो  
    प्लेन में मेरे साथ बिठा दो 
        मैं इसको ले कर जाऊँगा
         साथ में इसके मैं खेलूँगा       

नानी ने उसको समझाया
माँ -बेटे का प्यार बताया
        माँ से अलग बेटे को करना
        बड़ा पाप है ध्यान में रखना

कृष्णा को झट समझ आ गया
वापिस अपने घर को आ गया। 
        एक दिन नानी को फ़ोन मिलाया
       बछडे से बात करावो उन्हें बताया 

नानी बछड़ा बनकर बोली
प्यारी मीठी वाणी बोली 
           अच्छे-अच्छे  काम करो
           दुनिया में तुम नाम करो

पढ़ -लिख कर विद्वान बनो 
पाकर ज्ञान महान बनो 
     करो बड़ो का आदर तुम  
      प्यार सभी का पावो तुम।       

कोलकत्ता
17 मार्च 2009
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )






                  



                  

Saturday, February 28, 2009

मेरा गाँव


गाँव में वह पीपल का पेड़ भी नहीं रहा
जिस पर हम सब मिल कर खेलते  थे
  आशु काका की बैलगाड़ी भी नहीं रही   
  जिस पर चढ़ कर शहर जाया करते थे  
                                                  मेरा गांव अब बदल गया है।

कुम्हार काकी का अब नाच भी नही रहा
जो शादियों में ढोल पर हुआ करता था
दूध- दही की नदियाँ भी अब नहीं  बहती  
 जो घर पर मेहमान आने पर बहती थी।
                                                     मेरा गाँव अब बदल गया है।

 अलागोजों पर कजली भी नहीं गाई जाती 
जो गायों को चराते समय चरवाहे गाते थे
 गौरियां भी अब चौपाल में गीत नहीं गाती
जो गणगौर के पूजन के  समय गाती   थी
                                                         मेरा गाँव अब बदल गया है।

गाँव में अब निर्विरोध चुनाव भी नहीं  होते
जो मालू काका के सरपंच रहने तक हुए थे
   चौपाल पर अब हँसी ठहाके भी नहीं लगते  
     जो बलजी के रहते समय तक लगा करते थे    
                                                            मेरा गाँव अब बदल गया है। 

       गाँव में अब पनघट पर पायल भी नहीं बजती    
     जो कभी बनठन करऔरतें पानी लाने जाती थी 
      गांव में अब लम्बे घूँघट भी दिखाई नहीं  देते
          जो कभी गाँव की औरतें निकाला करती थी | 
                                                          मेरा गाँव अब बदल गया हैं। 


कोलकत्ता
२८ फ़रवरी,२००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Wednesday, February 18, 2009

अन्तिम अध्याय




इतिहास का अन्तिम अध्याय
                                 कभी नही लिखा जाता है
यह तो हर पीढ़ी दर पीढ़ी      
                                       पुस्त दर पुस्त लिखा जाता है           


हर बार मरे हुओं को जीवितों की
                          अदालत में पेश किया जाता है
कभी फूलों की माला तो कभी
                         काँटों का ताज पहनाया जाता है


हर सदी में कोई अच्छा तो
                                       कोई बुरा काम होता  है
राम के साथ रावण का
                                 इतिहास भी लिखा जाता है


इतिहास के पन्नों में यही सब
                                             जुड़ता चला जाता है
इतिहास का अन्तिम अध्याय
                                        कभी नही लिखा जाता है।



कोलकत्ता
१७  फ़रवरी  २००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, February 17, 2009

सत्ता का हस्तांतरण

बहू ने
सास की थाली में
घी से चुपड़ी चपाती
को रखा

प्यार से कहा -
खाइए !
थक गई तो
लोग कहेंगे
बहू ने सास को
ठीक से नही रखा

सास के
मुँह में जानेवाला ग्रास
हाथ में ही थम गया

आज अचानक
सास को वास्तविकता
का ज्ञान हो गया

कल तक
सास जो बहू को
अपने पास रखने का
दम भर रही थी

आज बहू
उसे अपने पास रखने
का एहसास दिला रही थी 

शब्दों के
बोल में ही सब कुछ
बदल गया था

अनजाने  में ही
शान्ति से
सत्ता का हस्तांतरण 
हो गया था।



कोलकत्ता
१७ फ़रवरी, २००९

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, January 19, 2009

वतन

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   आभारी हूँ मैं तुम सबका, जो इतना प्यार दिया
    अपना समझ कर हमें,जो इतना सम्मान दिया 
                  तुम्हारे प्यार को साथ लिए जा रहे हैं
                   आज हम अपने वतन को जा रहे हैं। 

  ये खुशियाँ जो तुम लोगो ने दी, बहुत याद आयेंगी
ये क्षण जो सब के साथ बिताए हर पल याद आयेंगे   
                    हम सुखद स्मृतियों के संग जा रहे हैं
                     आज हम अपने वतन को जा रहे हैं।

परिवार से दूर रह कर भी, परिवार की तरह रहना
  एक दूसरे के सुख-दुःख में सदा साथ-साथ रहना  
                   हम सबकी मधुर यादें लिए जा रहे हैं
                     आज हम अपने वतन को जा रहे हैं।

      जिन्दगी के सफर में, किसी मोड़ पर मिलेंगे 
    इन रिश्तों और लम्हों को फिर से ताजा करेंगे
                इन्हीं आशाओं के साथ हम जा रहे हैं 
                  आज हम अपने वतन को जा रहे हैं।

  चकाचोंध ओ डॉलर की खनक में मत फँसना
    फ़िर से अपने वतन लौट कर तुम सब आना 
           हम तुम्हें घर लौटने की कसम दे रहे हैं
                आज हम अपने वतन को जा रहे हैं। 
            
हिम्मत वालों की हार नही होती,यह याद रखना 
सफलता तुम्हारे कदम चूमे, इतने महान बनना 
               सब की की मंगल कामना कर रहे हैं 
                 आज हम अपने वतन को जा रहे हैं।     


सैन डिएगो (अमेरिका)
१९ जनवरी, २००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, December 29, 2008

इतिहास



इतिहास
बहुत पढ़ चुके
अब इसे पढ़ना छोड़ो 
और स्वयं इतिहास का
सर्जन करो 

जिससे
आने वाली पीढ़ी
पढ़ कर तुम पर
गर्व कर सके

जिंदगी तो
बिखरे दानो की तरह है
कुछ तो पंछी चुन गए
कुछ शेष बची है

कहीं ऐसा न हो  कि
घर आया इतिहास  का मेहमान
तुम्हारे यहाँ से
खाली हाथ चला जाए 

और तुम्हारा नाम
इतिहास के सुनहरे पन्नों पर
अंकित होने से ही रह जाए। 
    
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

सेन डिएगो  (अमेरिका )
२९ दिसम्बर, २००८ 

 

Wednesday, December 24, 2008

यहाँ कहाँ

 बरिटो,सेंडविच ,पिज्जा खाया                       
लाजानिया,पास्ता, बर्गर खाया
  बकलावा, फलाफल, टाको खाया                    
  सब कुछ यहाँ का हमने खाया 
 पर खीर चूरमा यहाँ कहाँ ?                            


स्टेचू आफ लिबर्टी देखा                           
गोल्डन गेट को घूम कर देखा
डिजनीलैंड की रोनक देखी,                        
  सब कुछ हमने यहाँ पर देखा 
  पर ताज महल सा यहाँ कहाँ ?                  


 टोर्रे पाइन, मियामी देखा                           
 लाहोया, सेंटा मोनिका देखा    
     कोरोनाडो, हवाई बीचों को देखा                   ,
   सब में नहाए, सभी को देखा     
पर हरकी पौड़ी यहाँ कहाँ?                    


   थैंक्स गिविंग में मिलते देखा                  
क्रिशमस को जगमगाते देखा      
नाचते गाते इस्टर में देखा                     
सभी त्योंहारों को हमने देखा  
  पर होली का मजा यहाँ कहाँ ?               
 

सैन डिएगो (अमेरिका)
२४ दिसम्बर ,२००८

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )