Thursday, September 24, 2020

मेहनत

मेहनत उस बूढ़े की 
कड़कड़ाती धूप में सवारी ढ़ोना,
कमाना दो पैसे 
दो जून की रोटी के लिए। 

मेहनत उस औरत की 
घर-घर जाकर बर्तन माँजना,
कमाना दो पैसे 
बेटे को पढ़ने के लिए।  

मेहनत उस मजदुर की 
दिन भर ईंट-गारा ढोना  
कमाना दो पैसे 
परिवार को पालने के लिए 

मेहनत उस बच्चे की 
दिन भर बूट पोलिस करना 
कमाना दो पैसे   
बीमार माँ की दवा के लिए

क्या इस देश का गरीब 
सदा इसी तरह से 
पिसता रहेगा ?

क्या वह जीवन की 
मूलभूत आवश्यकताओं के लिए
सदा ही तरसता रहेगा ?

कब आएगा वह दिन 
जब वो सुख से 
अपनी जिंदगी को जी सकेगा ?




( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )


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Friday, August 28, 2020

जय श्री कृष्ण राधे - राधे

हमारे घर है
एक छोटी सी गुड़िया
नाम है आयशा

वो लगाती है
अपने बालों में
एक सुन्दर सा
हेयर बेंड

रखती है अपने
बालों को खुला
फिर इठलाती है
परियों की तरह

करती है
इन्द्रधनुष के रंगों से
बादलों पर चित्रकारी

नचाती है नैन
कम्प्यूटर स्क्रीन पर
दौड़ाती है उंगलियाँ
किबोर्ड पर

लगाती है प्ले पार्लर
खिलाती है सबको
लौटा लाती है सब का 
प्यार भरा बचपन

सोते समय
सब को कहती है
जय श्री कृष्ण
राधे - राधे।





Tuesday, August 25, 2020

तुम तो आज भी मेरे संग हो

तुम मेरी सुबह की अंगड़ाई हो
तुम मेरी चाय का मिठास हो
तुम मेरी छुट्टी की सुबह हो
तुम मेरे होठों की प्यास हो 
तुम आज भी मेरे संग हो।

तुम मेरी बैचेनी का सुकून हो
तुम मेरे दिल की धड़कन हो
 तुम मेरे प्यार की ग़ज़ल हो 
            तुम मेरे संग में परछाईं हो           
तुम आज भी मेरे संग हो।

तुम मेरे लबों की मुस्कान हो 
तुम मेरे दिल का अरमान हो
 तुम मेरी यादों की हिचकी हो 
तुम मेरे सपनों की रानी हो 
तुम आज भी मेरे संग हो।

तुम मेरे जीवन का संगीत हो 
तुम मेरी कविता का छंद हो 
तुम मेरे दिल की आवाज हो
तुम मेरे प्यार की पनाह हो 
तुम तो आज भी मेरे संग हो।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। ) 

Sunday, August 9, 2020

नौका लगी किनारे पर

नौका लगी किनारे पर
जाने को उस पार 
कुछ तो साथी चले गए
   बाकी का नंबर तैयार। 

दुनियां केवल रैन बसेरा 
वापिस सब को जाना है 
कोई आगे, कोई पीछे 
इसी नाव पर चढ़ना है।  

जीवन में जो कर्म किए 
वही साथ में जायेंगे
बाकि रिश्ते-नाते सारे
यहीं धरे रह जायेंगे।

 दो दिन का यह मेला है 
अंतिम नियति तो जाना है
नौका लगी किनारे पर
अपनी बारी चढ़ना है।

                                                              
                                                                  ( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )




Friday, July 31, 2020

उसका चेहरा देखने लायक था

जीवन में कुछ घटनाएं 
ऐसी भी होती है 
जो सदा याद रहती है 

अमेरिका की सुसाईड हिल
सुशीला झुक कर पहाड़ी की
गहराई को देख रही थी
मैंने पीछे से हल्का धक्का दिया
वो कांप उठी
चहरे पर खौप झलक उठा 
मैंने पीछे से उसे अपनी 
बाँहों में जकड लिया  
उसका चेहरा देखने लायक था।

दार्जिलिंग की पहाड़ी
श्याम-राजू पहाड़ी की ढलान पर
उतरते हुए दौड़ रहे थे
दोनों बच्चों के पांव उखड़ गए
वो रुक नहीं पा रहे थे
सामने गहरी खाई थी
सुशीला भय से कांप उठी 
मैंने दौड़ कर बच्चों को पकड़ा 
उसका चेहरा देखने लायक था।

हम यमुनोत्री से  
दर्शन कर लौट रहे थे 
हनुमान चट्टी पार करके 
आगे बढे तो खबर मिली 
लैंड स्लाइड से आगे का 
रास्ता बंद हो गया है 
गाड़ियों का लम्बा जाम लग गया 
न पीछे जाना संभव न आगे बढ़ना
शाम ढल गई, अन्धेरा छाने लगा
सुशीला घबरा गई 
देर रात थोड़ा रास्ता बना 
हमारी गाड़ी निकलते समय
खाई की तरफ फिसल गई
उसका चेहरा देखने लायक था।




Thursday, July 30, 2020

बुढ़ापे में तुम्हारा सहारा

तुम अपने बेटे-बेटियों को
क्यों भेज देते हो अमेरिका
क्या वहाँ सोने की खान है
जो तुम्हारे देश में नहीं है ?

लाड-प्यार से पाले अपने
जिगर के टुकड़े को भेज देते हो
सात समुद्र पार
पता नहीं फिर वो वहाँ से
कब लौट कर आएगा ?

क्यों भेज देते हो इतनी दूर 
कि सिसकियाँ भी सुनाई नहीं पड़ें 
डबडबाई आँखें भी नहीं देख सको 

खो जायेंगे वहाँ
डालर की चकाचौंध में
बसा लेंगे अपना घर किसी
अमेरिकन या चाइनीज के संग
तुम बुढ़ापे में, देखते ही रहोगे
उनके लौट आने की राह

मत दिखाओ उन्हें ज्यादा सब्जबाग 
जुड़े रहने दो देश की धरती से 
ताकि उन्मुक्त होकर जी सके अपना जीवन 
बन सके बुढ़ापे में तुम्हारा सहारा। 



Wednesday, July 15, 2020

मेरा मन आज उदास हो गया

मेरा मन आज उदास हो गया
बैठे-बैठे तुम्हारे ख्यालों में खो गया।
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तुम्हारी बदरी सी जुल्फें
तुम्हारा हँसता हुवा चेहरा
तुम्हारे आँचल का मुझे छूना, याद आ गया
मेरा मन तुम्हारी चुहलबाजी की
यादों में खो गया
मेरा मन आज उदास हो गया।
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मेरा रूठना और तुम्हारा
कनखियों से देख कर हँसना
तुम्हारा अंतर का भोलापन, मुझे याद आ गया
मेरा मन तुम्हारी आँखों के सहज
सलोनापन में खो गया
मेरा मन आज उदास हो गया।
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तुम्हारे संग हँसी के कहकहे लगाना
थक कर तुम्हारी बाँहों को थामना
तुम्हारा बारिश में भीगना, मुझे याद आ गया
मेरा मन तुम्हारे मृदु हाथों के स्पर्श की
सुखद अनुभूति में खो गया
मेरा मन आज उदास हो गया।
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गांव के घर में टिचकारी से बुलाना
इशारों में ही सब कुछ समझाना
तुम्हारे मुखड़े का लंबा घूंघट, मुझे याद आ गया
मेरा मन तुम्हारे नर्म अहसासों की
सिहरन में खो गया
मेरा मन आज उदास हो गया।
.
मेरा मन आज उदास हो गया
बैठे-बैठे तुम्हारे ख्यालों में खो गया।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )