Thursday, May 17, 2018

हमें भी याद कर लेना

आँखों ही आँखों से,  इशारों की बात आए
घूँघट से झांक कर, हमें भी याद कर लेना।

ख़्वाबों में कभी,  हसीन चेहरा नजर आए
 थोड़ा मुस्कराकर,  हमें भी याद कर लेना।

बन संवर कर, कभी आईने के सामने जाओ
 खुद से शरमा कर,  हमें  भी याद कर लेना।

राहे सफर में, अगर चलते-चलते थक जाओ
 थोड़ी देर सुस्ता कर,  हमें भी याद कर लेना।

चाँद-सितारों की महफ़िल में, अगर कभी जाओ
थोड़ा  निचे  झांक कर,  हमें  भी  याद कर लेना।

चलो छोड़ो जाने दो, अब हम कभी नहीं रूठेंगे 
 तुम भी नजर अंदाज कर,  हमें  याद कर लेना। 

Friday, May 4, 2018

बोलने वाली रातें चली गई

शांत जीवन में, एक सुनामी लहर सी आई
पल भर में, हजारों अश्क दे कर चली गई।

जिन्दगी में हर ख़ुशी अब, गैर हाजिर हो गई
बोलने वाली रातें अब,न जाने कहाँ चली गई।

मेरी शेर ओ शायरी, किताबों में धरी रह गई
सुर्ख होठों पर लगा, पढ़ने वाली तो चली गई।

बिना सोचे समझे, वो अनमनी चाल चल गई
दिन सुनसान और रातें वीरान कर,चली गई।

कसमें खाई थी साथ रहेंगे, एकाकी कहाँ गई
एक अधूरा ख्वाब दिखा, बिना कहे चली गई।

जीवन में हर कदम पर, सिसकियाँ ही रह गई
मेरे दिल में यादों की शमा जला, वो चली गई।





Monday, April 30, 2018

मेरे संग-संग

आज बहती पुरबा ने 
हौले से मेरे कान में कहा-
क्यों उदास बैठे हो ?

बिखरे पलों को समेटो फिर से
बीती यादों को सहेजो फिर से 
याद करो संग-सफर की बातें
बेहद मीठी होती है यादें

मैं जैसे ही तुम्हारी यादों में डूबा
तुम बरखा बन चली आई मेरे पास
तुम्हारी यादों की रिमझिम फुहारों ने
भीगा दिया मेरा तन-मन-प्राण

मैं भूल गया तन्हाई
डूब गया यादों की गहराई
तुम कल फिर से आना
सूरज की पहली किरण संग

मेरे सिरहाने बैठ
अपनी नर्म अँगुलियों से
मेरे गालों को छूना

मेरे बिखरे बालों को
तनिक सँवार देना
मैं जब भी तुम्हें याद करूँ
तुम इसी तरह से चली आना।



यादों की नाव

मेरी स्मृतियों में
आज भी ताजा है वे दिन
जब ढलती सांझ में हम
गंगा किनारे बंधी नाव में
जाकर बैठ जाते थे

गंगा की लहरों पर
हिचकोले खाती नौका
शीतल  हवाओं के झोंके
मन को शकुन देते थे

कितनी बातें करते थे
अंत नहीं था बातों का
रात घिर आती लेकिन
बातें खतम नहीं होती थी

गीता भवन के
दरवाजे बंद होने की
घंटी सुन कर ही हम
लौटते थे अपने कमरे में

आज जब भी
तुम्हारी याद आती है
आँखों में उतर आती है गंगा
चल पड़ती है यादों की नाव।





Tuesday, April 17, 2018

पांच वर्ष की पोती आयशा

मेरी पांच वर्ष की पोती
आयशा
नहीं जानती
चाँद, तारों और परियों
के बारे में

उसने नहीं देखा
कभी अम्बर में
आकाशगंगा को
तारों की बरात को
वह नहीं जानती चाँद में
सूत कातती  बुढ़िया को

उसने नहीं सुनी
परियों की कहानियाँ
जो उतर कर आती है
आसमान से  धरती पर

जिनके उड़ने के लिए
लगे रहते है सफ़ेद पंख
हाथ में जिनके रहती है
सुनहरी जादू की छड़ी

आयशा के पास
ढेर सारे खिलोनें हैं
पेंटिंग के लिए कलर्स
अल्फाबेट की पुस्तकें हैं

अब तो वो खेलने लगी है
अपनी मम्मी के मोबाइल्स से
शिनचैन, नोबिता जैसे
कार्टूनों के संग विडिओ गेम

उसे नहीं मालूम
चाँद, सितारें और परियों की
 दुनिया के बारे में।






Monday, April 16, 2018

जितना दिया है उतना ही तो मिलेगा

आज बेटे की
शादी की सालगिरह है
बेटे ने आकर बाप को
प्रणाम भी नहीं किया है
बहु ने रास्ते चलते
ससुर को प्रणाम कर अपना
फर्ज निभा लिया है।

शाम को होटल में
डिनर और केक कटाने का
प्रोग्राम बना है
बेटे ने अपने दोस्त को बुलाया है
उसकी बहु को भी बुलाया है
मुंबई से आई
जान- पहचान वाली को भी
आमंत्रित किया है
लेकिन नहीं कहाँ बेटे ने
आपने बाप को
कि चलना आज होटल में
सभी साथ खाना खाएंगे
और केक काटेंगे।

बाप अकेला घर पर था
सोच रहा था कि क्या कल
इसके बेटे भी इसके साथ
इसी तरह का व्यवहार करेंगे ?
क्या उसे भी उतना ही दुःख होगा ?
सोच के साथ ही
बाप ने माथे को झटक दिया
सोचा नहीं नहीं
उन्हें इतना दर्द नहीं होगा
क्योंकि उन्होने जितना दिया है
उतना ही तो मिलेगा।


Tuesday, April 10, 2018

देखो प्यारा बसंत आया

देखो प्यारा बसंत आया

सर्दी की हो गई विदाई
हवा सौरभ लेकर आई
बादलों से ब्योम  छाया
देखो प्यारा बसंत आया

बागों में कोयल कुहकी
बौरों से बगिया महकी
भंवरा फूलों से कह आया
देखो प्यारा बसंत आया

पिली सरसों से खेत सजे
नव पल्लवों  से पेड़ सजे
फूलों-पत्तों में रंग छाया
देखो प्यारा बसंत आया

धरती का आँगन महका
गौरी बाँहों में प्यार सजा
अभिसार का मौसम आया
देखो प्यारा बसंत आया ।