Friday, July 6, 2018

गांव की गलियां

बचपन में गांव से
बाहर निकला था
बड़ा आदमी बन कर लौटने

कहाँ-कहाँ नहीं भटका
दो पैसे ज्यादा कमाने
के चक्कर में

त्रिपुरा में अगरतला
आसाम में धुबड़ी
बंगाल में बादुरिया
बिहार में चकिया
मेघालय में शिलोंग
हरियाणा में फरीदाबाद
और अंत में कोलकता

हजारों मिलो का
सफर किया और
हर जगह ब्यापार किया

सोचा था
ढेर सारा पैसा कमा कर
लौट आउंगा गांव

पैसा तो कमा लिया
लेकिन नहीं लौट पाया
सपना बन कर ही
रह गया गांव

मेरे गांव की गलियां तो
आज भी जगती है मेरे
लौट आने के इन्तजार में।









Thursday, June 28, 2018

अन्तिम संस्कार

कल शाम
अचानक उसकी
साँसों की डोर टूट गई

देह को रात भर
बर्फ की सिल्ली पर
रखा गया

सुबह होते ही
उठाने की तैयारी
होने लग गई

पहले नहलाया गया
नए कपड़े पहनाए गए
अर्थी को फूलों से
सजाया गया

सुहागन का
जोड़ा पहना कर
माँग में सिंदूर भरा गया

अर्थी को कन्धा दे कर
श्मशान घाट पर
लाया गया

देह को चिता पर रखा गया
बेटे ने मुखाग्नि दे कर
अंतिम संस्कार किया

भस्म को गंगा में
प्रवाहित भी
कर दिया गया

मुझे विवश हो कर
सब कुछ नेत्रों के सामने
घटित होते देखना पड़ा।

स्मृति के अवशेष तक
जीवन का रहना है
समय के संग सभी कुछ
विस्मृत होना है।







धूप-छांव

सर्दियों में मैंने सोचा
हमारा घर धूप में
होना चाहिए

गर्मियों में मैंने सोचा
हमारा घर छांव में
होना चाहिए

फिर सोचा पहले
घर तो बनना चाहिए
घर होगा तो धूप -छांव
भी आ जाएगी

बेटा होगा तो
बहु भी आ जाएगी
दिन उगेगा तो
रात भी ढल जाएगी।





Monday, June 25, 2018

मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा

तुम चिंता मत करो
मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा

मैं तुम्हें दुनिया की
सब से अच्छी अस्पताल में
लेकर जाऊंगा

तुम्हारा अच्छे से अच्छा
इलाज़ कराऊंगा
लेकिन मरने नहीं दूंगा

मैं अपनी सांसों में से
कुछ सांसें तुम्हें दूंगा
अपने सपनों में से
कुछ सपने तुम्हें दूंगा
लेकिन तुम्हें मरने नहीं दूंगा

तुम घबराना मत
मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा
जरुरत पड़ी तो मैं तुम्हें
यमराज से भी छिन लूंगा

मुझे यह भी पता है कि
मेरे ज़िंदा रहने के लिए
तुम्हारा ज़िंदा रहना
कितना जरूरी है मेरे लिए।











Saturday, June 23, 2018

गांव बदल गया है

गांव में
गोबर-मिटटी से पुते
कच्चे-पक्के घर
अब नजर नहीं आते

पनघट पर
बनी-ठनी पनिहारिनों की
हंसी-ठिठोली
अब नजर नहीं आती

चौपाल पर
चिलम-बीड़ी के संग
लम्बी-चौड़ी बहसे
अब नजर नहीं आती

सांझ-सवेरे
गायों को दुहना
चक्की से आटा पीसना
अब नजर नहीं आता

खेतो में
चौपायों को चराना
अलगोजो को बजाना
अब नजर नहीं आता

गांव बदल गया है।












वो मेरे जीवन में आई

वो मेरे जीवन में आई
पचास वर्ष तक
प्रेम बेली लिपटाई
अचानक तितली बन उड़ गई
मैं पलकें झपकाता रहा
टूटते तारों को देखता रहा।

Thursday, May 31, 2018

जिंदगी का मजा तो आ ही गया

मैंने चारों बेटों के यहाँ, एक-एक गेस्ट रूम बनवा दिया
तीन-तीन महीने मेहमान बनना, मुझे भी तो भा ही गया।

बहुत खुश हूँ ढलती उम्र में, बेटो - बहुओं के संग रह
जिन्दगी का एक नया तराना, मुझे भी तो भा ही गया।

चली गई वो जिंदगी की राह में, मुझे एकेला छोड़ कर
मगर दर्द को मुट्ठी में दबा, जीना मुझे भी आ ही  गया।

दिन गुजरते गए, रातें बीतती गई, जिंदगी चलती रही
मुझे भी यादों के सहारे, दिल बहलाना तो आ ही गया।

साथ छूट गया, मगर हमारे प्यार में कोई कमी नहीं आई
कविता के बहाने ही सही, मिलने का सहारा आ ही गया।

यह अलग बात है कि हम, साथ नहीं रह सके जिंदगी भर
मगर जितने दिन भी रहे, जिंदगी का मजा तो आ ही गया।