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Saturday, May 20, 2017

जीवन का एक कटु सत्य

सुबह सवेरे
चाय के साथ
जब मैं सन्मार्ग पढ़ता हूँ
मुख्य पृष्ठ पर
सरसरी निगाहें डाल
मैं सीधा तथाकथित पेज
पर चला जाता हूँ
जहां एक अदद तस्वीर
के  साथ लिखा होता है
"बड़े दुःख के साथ सूचित
किया जाता है कि  ----"
यह देखने कि आज कोई
परिचित तो नहीं चला गया

मन में ख़याल आता है
एक दिन मेरा फोटो भी
इसी पेज पर छपेगा
मैं भी उस दिन एक
समाचार बन जावूंगा

घरकी दीवार पर फ्रेम में
लग जाएगी एक तस्वीर
पहना दी जाएगी माला
पुण्य तिथि पर बहु
एक पंडित को बुला कर
करवा देगी भोजन
दे देगी दक्षिणा में
एक धोती-गंजी और चंद रुपये।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]