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Friday, February 8, 2019

हाथ की सफाई है

अस्पतालों का करोड़ों में,  बजट बनता है
अस्पताल जाओ तो, मिलती नहीं दवाई है।

स्कूल -कॉलेज चलाना, व्यापर बन गया है
  लाखों डोनेशन में लेते, महंगी हुई पढाई है।

देश  का अन्नदाता, आज भी  भूखा रहता है
कौन समझेगा दर्द, जिनके फटे न बिवाई है।

अब तो चुनावों में, बाहुबल-पैसा चलता है
   पैसा खरचो  चुनाव जीतो, यही सच्चाई है। 

कुर्सी मिलते ही, करोड़ों में बटोरने लगते हैं 
क्या करेगा कानून, चोर-चोर मौसेरे भाई हैं। 

भ्रस्टनेता देश को लूट, डकार तक नहीं लेते
  अच्छा मदारी जो कहता, हाथ की सफाई है।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )