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Wednesday, March 18, 2015

विरह ही है प्रेम का अनन्त

जब तक तुम साथ थी
मेरी हर शाम
खुशबुओं से नहाई होती थी 

कहकहों और
मुस्कराहटों के बीच
चाय की चुस्कियाँ चलती थी 

लेकिन आज
तुम्हारी यादों के चंद सिक्के
कुल जमा पूँजी रह गई है मेरे पास 

जैसे ही शाम फैलाती है
क्षितिज पर मटमैली चादर
मेरे मन पर छाने लगती है निराशा

धुँधलका खिड़की से झाँक 
चटकाने लगता है 
विरह के दर्द की कली-कली

खामोश रात में
बंद पलकों से तलासता हूँ
अतीत की धुंध में तुम्हारी यादें 

करता हूँ प्रयास
तुम्हारी यादों के संग 
रम जाने का

दूर खिड़की में
टिमटिमाती रोशनी देख
सोचता हूँ शायद विरह ही है
प्रेम का अनन्त।


[ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]