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Monday, May 27, 2013

कटेली चम्पा



कोलकता के
विक्टोरिया मेमोरियल
का हरा भरा मैदान

सुबह का समय
साइड वाक पर घुमते
लोगो का समूह 

कटेली चम्पा के
फूलों से वातावरण का
महकना

फूलों का अपना
अस्तित्व कायम रखने की
  हर संभव कोशिश करना

तभी क्रूर हाथों का
बढना पेड़ की तरफ और
 तोड़ लेना फूल को

दो-चार हाथों मे से 
 निकलना फुल का और
नोच डालना पंखुड़ियों को

कर डालना उसकी
गंध और कोमलता को
तहस-नहस

इन्सान की हवस से
फुल के अस्तित्व का
चिर-हरण

कटेली चम्पा के 
अन्तर से दुखोच्छवास
का छुटना। 

फूल जो पेड़ का सौंदर्य है, उसकी सोभा है, लेकिन विक्टोरीया में घूमते लोग कटेली चम्पा के पेड़ पर लगे फूल को ढूँढ कर तोड़ लेते है। थोड़ी देर फूल दो चार हाथों में घूमता है और फिर नोच कर डाल  दिया जाता है, पांच मिनट में फूल का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। 


  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]