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Wednesday, June 16, 2010

भिखारिन




विक्टोरिया में
मोर्निंग वाक करके
हम शर्मा की दुकान पर 
 आकर बैठ गए 

सुबह के नाश्ते में
गर्म जलेबी और
समोसों के साथ
चाय का घूँट लेने लगे 

तभी एक दुबली पतली
काया वाली औरत
बच्चे को गोद में लिए 
हमारे सामने आकर
खड़ी हो गई

वो टुकुर-टुकुर हमारी
तरफ देख रही थी
उसकी आँखों में एक
याचना थी 

किसी ने कहा 
कितनी बेशर्म है
सामने छाती पर
आकर खड़ी हो गई 

हमने हटाने के लिए 
बचा-खुचा उसकी तरफ
बढ़ा दिया

वो हाथ में लेकर
एक कौन में चली गई
बच्चे को गोदी से उतार कर
उसके माथे पर हाथ फेरते हुए
खिलाने लगी 

हमने महसूस किया
उसकी आँखों में
अब याचना नहीं
एक तृप्ति का भाव था। 



कोलकता
६ जून,२०१०

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )