Saturday, December 17, 2016

मिनखपणो (राजस्थानी कविता)

म्हारौ बाळपणो
ओज्युं गाँव माँय
गुवाड़ी री चूंतरया माथै 
पग लटकायां बैठ्यो है 

गाँव री बूढी-बडेरया 
ओज्युं संजो राखी है 
म्हारी तोतली बोली ने  
आपरै मना मांय 

म्हारै बाळपणै रा चितराम
ओज्युं जम्योड़ा है
बारै निजरां मांय 

गाँव जाऊँ जणा
माथै पर दोन्यू हाथ फैर'र 
दैव घणी आसीसा

थारी हजारी उमर हुवै
थे सदा सुखी रेवो
दुधां न्हावो अर पूतां फळो 

ओ गाँव है
अठै मन रो रिस्तो रैवै
अपणायत अर हैत रैवै

मिनखपणो दिखै पग-पग पर अठै
हेत-नैह री ओज्युं लैरा ब्येवै अठै।

मनड़ै रा मोती (राजस्थानी कविता )


         O
म्है तो चावौ हो
थनै सावण-भादौ री
उमट्योड़ी कलायण दाईं
देखबो करूँ 

पण तुंतो 
बरस'र पाछी 
बावड़गी।  


        OO
म्हारै माथै भला ही 
चाँद चमकण लागग्यो हुवै 
मुण्डा पर भला ही 
झुरया पड़नै लागगी हुवै 

पण म्हारै हैत में थूं 
कोई कमी देखी कांई  
जणा बता थूं सावण री
डोकरी दाईं क्यूँ चली गई। 




        OOO
पून ज्यूँ बालूरा धोरा नै
सजार- संवार चली जावै
बियान ही थूं चली गई
म्हारै जीवण ने सजार- संवार

पून तो साँझ ढल्या
ठण्डी हुवारा लैहरका लैर
पाछी आज्यावै पण थूं
पाछी कोनी बावड़ी।  
       


Saturday, December 3, 2016

क्षणिकाएँ ---तुम्हारे लिए

अँखियां ढूंढें
तुमको चहुँ ओर
सजनी आओ।

तुम्हें पुकारा
आवाज लौट आई
तुम न आई।

तुम्हें बुलाने
कहाँ भेजु सन्देश 
बताओ मुझे।

दिल पुकारे
सर्द ठंडी रातों में
आ जाओ अब।

ढूंढ रही है
मेरी कविता तुम्हें
कहाँ हो तुम।

ठहर गई
मेरी जिंदगी आज
तेरे जाने से।

तुम्हें खो कर
अपना सुख चैन
खो बैठा हूँ मैं।




Friday, December 2, 2016

मेरी आँखों में ख्वाब नहीं है

तुम्हारा स्नेह स्पर्श पाकर
                      मन में प्यार का दीप जलता
                                     हैत का सागर हिलोरें लेता  
                                                                                      अब वह स्नेह स्पर्श नहीं है                                                                                                                  मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।     

जब-जब तुम मुस्कुराती 
                        अधरों पर प्यार का गीत उभरता 
                                 सावन कजरी गाने लगता  
                                                       अब वह मादक मुस्कान नहीं है
                                                                               मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।     
                                                                                    

तुम्हारे तन की उन्मादक गंध
                   मेरे गीतों में मादकता भरती 
                                       दिल में प्यार के फूल खिलाती
                                                        अब वह उन्मादक गंध नहीं है
                                                                             मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।

                                                                            
                                                                             
     तुम्हारे नयनों की छवि देख     
                       कजरारे बदरा पर गीत उमड़ते 
                                          होठों पर झूलों वाले गीत मचलते 
                                                             अब वह पलकों की छांव नहीं है
                                                                                  मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।

                                                                                                
                                                                                             
तुम्हारे पायल के स्वर से
                              भंवरों के गुंजन सा गीत निकलता
                                              सावन श्यामल धन बन छा जाता
                                                              अब वह पायल का संगीत नहीं है
                                                                                मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।

                                                                                 
  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Tuesday, October 25, 2016

बेबसी का जीवन

नहीं मरनी चाहिए
पति से पहले पत्नी
पति का भीतर-बाहर
सब समाप्त हो जाता है

घर भी नहीं लगता
फिर घर जैसा
अपने ही घर में पति
परदेशी बन जाता है

बिन पत्नी के
पति रहता है मृतप्रायः
निरुपाय,अकेला
ठहरे हुए वक्त सा और
कटे हुए हाल सा

घर बन जाता है
उजड़े हुए उद्यान सा
बेवक्त आये पतझड़ सा

ढलने लग जाती है
जीवन की सुहानी संध्या
रिक्त हो जाता है
बिन पत्नी के जीवन

अमावस का अन्धकार
छा जाता है जीवन में
बेअर्थ हो जाता है
फिर जीना जीवन।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]




गोळ-मटोळ रोटी (राजस्थानी कविता)

चूल्हा स्यु उठ रियो है धुँओं
थेपड़या नें फूँक दे'र 
सुलगा रही है माँ


झर रियो है आँख्यां स्यू पाणी 
हुय राखी है लाल-लाल 

पण रोटी बणणी है 
टाबरा तांई 
ओसण री है आटो 
लकड़ी री काठड़ी मांय  

दोन्यु हथेलियाँ रे बीच 
आटै रो गोळो रख 
बणा री है गोळ-मटोळ रोटी 

तुवो गरम हुया 
डालसी रोटी तुवा पर 
जकी पर रेसी  माँ री 
आँगल्या रा निशाण 

भाभी ले ज्यासी भातो 
खेत मांय हळ चलावंता भाई तांई 
टाबर खार जावेला सकूल 

दौपारी ताईं कौनी 
आण देव भूख नै 
घर की चौखट तांई 
माँ की गोळ-मटोळ रोटी। 




Thursday, August 11, 2016

बम बम बोले रे काँवड़िया

सावन महीना लागा बम बम बोले रे काँवड़िया

फूलन-बसन लगा सजाई रे काँवड़िया
गंगा जी से जल भर चले रे काँवड़िया
मार्ग दुर्गम नंगे पाँव चले रे काँवड़िया
गंगा जल शंकर के चढ़ाये रे काँवड़िया,बम बम बोले रे काँवड़िया।

भोले के भंग का प्रसाद चढ़ाई रे काँवड़िया
ठंडी छाया बैठ थकान मिटाये रे काँवड़िया
राम की रसोई का प्रसाद पाये रे काँवड़िया
व्रत को सतभाव निभाये रे काँवड़िया,बम बम बोले रे काँवड़िया।

रख कंधे पर कांवड़ चले रे काँवड़िया
धुप बरसात की चिंता ना करे रे काँवड़िया
दुर्गम राह को फूल समझ चले रे काँवड़िया
राहे डगर में मस्ती से झूमें रे काँवड़िया, बम बम बोले रे काँवड़िया।

अनेक नगर ग्राम से आये रे काँवड़िया
एक रंग एक रूप बन चले रे काँवड़िया
राग-द्वेस मोह-मान छोड़ चले रे काँवड़िया
दर्शन की आश लिए चले रे काँवड़िया, बम बम बोले रे काँवड़िया।






Monday, August 1, 2016

बाल कविता

नटखट मेरा कृष्णा भैया
दिन भर करता धम्मक धैया। 

पूजा दीदी बड़ी सयानी 
लेकिन करती है मनमानी। 

राधा दीदी प्यारी-प्यारी 
बाते करती न्यारी-न्यारी। 

राहुल भैया को भाता आम
बात है कोई इसमें खास।

अभि भैया सबसे प्यारा
है सबके नैनो का तारा।

गौरव भैया एक सितारा
मुझको लगता सबसे प्यारा। 

सबसे अच्छी मेरी नानी 
रोज सुनाए मुझे कहानी। 

देखो माँ है कितनी अच्छी 
मुझे सिखाती बाते अच्छी। 

मैं मम्मी की प्यारी बिटिया 
नाचा करती ता-ता-थैया। 


Thursday, July 28, 2016

तुम जो बिछुड़ गई

मधुवन  ही  वीरान  हो गया,      तु जो चली गई 
अश्क मेरी आँखों से ढलते, तुम जो बिछुड़ गई।

                                                          मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राह हुई                                                              जिंदगी अब दर्द बन गई, तुम जो बिछुड़ गई।

खाली-खाली मन रहता, एक उदासी गहरी छाई
यादें अब तड़पाती मुझको, तुम जो बिछुड़ गई।

साथ जियेंगे साथ मरेंगे, हमने कसमें थी खाई 
गीत  अधूरे रह गए मेरे,  तुम जो बिछुड़ गई।

सपने मेरे सपने रह गए,ऑंखें हैं अब भरी-भरी
टूट पड़ा है पहाड़ दुःखों का,तुम जो बिछुड़ गई।

अब मरे संग साथ चले, ऐसा साथी  कोई नहीं  
जीवन-पथ में रहा अकेला, तुम जो बिछुड़ गई।

किससे मन की बात कहूँ, साथ तुम्हारा रहा नहीं
कैसे अब दिल को बहलाऊँ, तुम जो बिछुड़ गई।




                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




प्रार्थना

प्रभु !
हमें भक्ति दो 
हमें शक्ति दो 
हमें अपने चरणों में 
आसक्ति दो। 

शक्ति नहीं हममे इतनी 
गुण आपके गा पाए 
है अज्ञानी बालक हम सब 
प्रभु चरणों में शीश नवाए। 

मोह-बंधन की काट बेड़ियां 
जीवन पथ आलोकित कर दो 
कर पाएं हम दर्शन निश दिन 
ऐसी दृस्टि हमें दे दो।  

अंतर्मन का हरो अन्धेरा 
मन में ज्ञान की गंगा बहादो 
कर्तव्य का बोध हमें हो 
ऐसा पावन मन बनादो। 


Saturday, July 23, 2016

एक दिन साथ-साथ

एक दिन हम
गीता भवन के घाट पर
गंगा में नहाने चलेंगे साथ-साथ

नहाने के बाद
करेंगे पूजा गंगा की और
चलेंगे नाश्ता करने
गीता भवन की
मिठाई की दुकान पर

शाम का खाना हम
चोटिवाले के यहाँ खाएंगे
आइसक्रीम खाने चलेंगे
नौका में बैठ मुनि की रेती

लौटते समय
राम झूला पर खिलाएंगे
चने बंदरों को
आटे की गोलियां डालेंगे
मछलियों को

बालूघाट पर बैठ कर
सुनेंगे कल-कल करती
गंगा की स्वर लहरी को

लौटते समय तुम देना
अपना हाथ मेरे हाथ में
और फिर इठला कर चलना
मेरे संग में।



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]

Tuesday, July 19, 2016

याद तुम्हारी गीत बन गई

फ्रेम में जड़ी तुम्हारी
तस्वीर देख कर सोचता हूँ
आज भी दमक रही होगी 
तुम्हारे भाल पर लाल बिंदिया

कन्धों पर लहरा रहे होंगे 
सुनहरे रेशमी बाल 
चहरे पर फूट रहा होगा 
हँसी का झरना

चमक रही होगी मद भरी आँखें
झेंप रही होगी थोड़ी सी पलकें
देह से फुट रही होगी 
संदली सौरभ 

बह रही होगी मन में  
मिलन की उमंग
बौरा रही होगी प्रीत चितवन 
गूंज रहा होगा रोम-रोम में
प्यार का अनहद नाद

मेरे मन में आज भी
थिरकती है तुम्हारी यादें
महसूस करता हूँ
तुम्हारी खुशबु को
तुम्हारे अहसास को।



                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Monday, July 18, 2016

विछोह का दर्द

तुम्हारे विछोह के बाद
अब मुझे कुछ भी
अच्छा नहीं लगता

खाने बैठता हूँ तो
दाल पनीली लगती है
सब्जियाँ बेस्वाद लगती है

कोई मिलने आता है तो
मुलाकातें बेगानी लगती है
दिन अनमना और
रातें पहाड़ लगती है

नहीं करता मन अब
बरामदे में बैठ चाय पीने का
पार्क में जाकर अकेले
घूम आने का

विंध्य से लेकर हिमालय तक
गंगा से लेकर वोल्गा तक
न जाने कितने पहाड़ और नदियाँ
तुम्हारे संग जीवन में पार की

लेकिन आज
तुम्हारे विछोह के दर्द को
पार पाना मेरे लिए
भारी हो गया।


  ( यह कविता "कुछ अनकही ***"में छप गई है। )








Thursday, June 30, 2016

सांझ सुहानी ढल गई

मन का आँगन सूना हो गया,जीवन वैभव चला गया
सुख गया है उर का निर्झर, सहपथिक भी चला गया।

साथ रह गयी यादें केवल, उजले पल सब चले गए 
खुशियां निकल गई जीवन से,सुन्दर सपने टूट गए।

याद तुम्हारी आती रहती, दिल तड़पता रातों में
मेरे मन की पीड़ा का अब, दर्द झलकता आँखों में।

रीत गया संगीत प्यार का, रुठ गई कविता मन की
यादों में अब शेष रह गई, सुधियां चन्दन के वन की।

बीत गया सुखमय जीवन,अन्तस् पीड़ा भर आई
  आँखों में अश्रु भर आए, याद तुम्हारी जब आई।

गीत अधूरे रह गए मेरे, मन की मृदुल कल्पना खोई  
जीवन पथ पर चलते-चलते, सांझ सुहानी ढल गई।






                                           [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]










Thursday, June 23, 2016

बुढ़ापा

तुम्हारे जाते ही
बिना निमंत्रण के
आहिस्ता-आहिस्ता
हौले-हौले मेहमान बन
आ धमका मेरे पास बुढ़ापा

ढलने लगा चमकता तन
टूटने लगा मजबूत मन
डिगने लगा आत्मविश्वास
अवांछित होने का अहसास
कराने लगा बुढ़ापा

घुटनों में दर्द
आँखों में धुंधलापन
कानों से ऊँचा सुनाई देना
दाँतों का एक-एक कर विदा होना
अंग-प्रत्यंग पर अपना असर
दिखाने लगा बुढ़ापा

अपनों से ही
बात करने के लिए तरस जाना
चुप रह कर ही सब कुछ सुनना
एक खालीपन का अहसास
कराने लगा बुढ़ापा

मेहमान आते है
दो-पांच दिन ठहर कर
चले जाते हैं

लेकिन यह तो इतना ढीठ है कि
अब जाने का नाम तक नहीं लेता
अब तो मेरे तन के साथ ही
जायेगा बुढ़ापा।



  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]






Monday, June 13, 2016

छोड़ मुझे तुम चली गई

     मेरे जीवन की राहों में
 बहार बन कर तुम आई,          
   मेरे जीवन के सागर में              
लहर-लहर पर तुम छाई।

   प्रीत तुम्हारी अमृत जैसी                                                    
  गंगा जल सी सदा बही,                                            
अधरों की मुस्कान तुम्हारी                                                    
 मेरे संग में सदा रही।                                           

   साँझ ढली मेरे जीवन में
    बिच राह तुम छोड़ गई,
साथ चले थे राह-सफर में
 अब राहे सुनसान हो गई।

सुख की सारी सुन्दर बातें                                                        
मेरे जीवन से निकल गई                                                      
 सूनापन है बिना तुम्हारे                                                     
 सारी खुशियाँ चली गई।                                                    

      रिश्ते सब अंजान हो गए
        जब से तुम परधाम गई,
अब न मिलेंगे किसी मोड़ पर
        छोड़ मुझे तुम चली गई।
       

     
     
                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Monday, June 6, 2016

महाप्रयाण

६ जुलाई २०१४
असाढ शुक्ल पक्ष नवंमी 
रविवार का वह मनहूस दिन
जब तुमने महाप्रयाण किया

उस दिन से मेरी जिंदगी
कभी ख़त्म न होने वाली
एक अमावस की रात
बन कर रह गयी

आसमान में
लाखों तारे आज भी
टिमटिमा रहे हैं लेकिन
मेरे जीवन में अब
पूनम का चाँद
कभी नहीं चमकेगा। 

पूजा के दादी जी

मैंने पूजा से कहा-
सुबह के नौ बज रहे हैं
अब उठ जाओ
सारी रात पढ़ती रहती हो
आँखें खराब हो जाएगी

पूजा ने करवट बदलते हुए कहा-
दादाजी आप भी कैसे उठा रहे हैं
दादी जी की तरह
वो प्यारा सा गीत गाकर उठाइए ना
"म्हारी पोती बेगी सोवै
मोड़ी उठे रेकारो मत दीज्यो जी" *

मैंने कहा-
मुझसे नहीं गया जाता
तुम्हारी दादी की तरह गीत
कहाँ से लाऊँ मैं वैसी सुरीली राग

मेरा गला भर आया
आँखें डबडबा आई
मैंने आँखों को अँगुलियों से दबाया
कहीं आँखो में आये आँसूं
पूजा पर न टपक पड़े।


*बेटी जब ससुराल जाती है तो राजस्थानी भाषा में एक गीत गया जाता है, ये उसी के बोल है।  इस गीत में ससुराल पक्ष से निवेदन किया जाता है कि -- हमारी बेटी जल्दी सोती है और देर से उठती है ,आप उसे कुछ भी मत कहना। पूजा के दादी जी उसे यह गीत सुना कर ही उठाया करती थी।

Thursday, May 26, 2016

करना पानी में हिल्लोल

गंगा की लहरें
टकरा रही है मेरे पैरों से
चल रही है ठंडी-ठंडी बयार
मन को मोह रहा है लहरों का संगीत

फूलों के डोंगें
तैर रहे हैं लहरों पर
झिमिला रही है दीपक की बाती
बह रही है कल-कल करती गंगा 

दूरागत तीर्थ-यात्री उतर रहे हैं
सम्भल -सम्भल कर
डगमगाती नौकाओं से

खेल रही है मछलियाँ
दौड़ रही है एक दूजे के पीछे
उछलती हुई पानी में

आओ हम भी करे
मछलियों की तरह कल्लोल
तुम भी कूदना छपाक से
करना पानी में हिल्लोल।



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]




Saturday, May 21, 2016

एक चाय की प्याली

बच्चे एक-एक कर
घर से बाहर जा रहे हैं
अपना भविष्य संवारने
अच्छे कॉलेजों में पढाई करने

दो साल हो गए
अभिषेक को वैलोर गए
एक बार मिला था
इन दो सालों में

पूजा अमेरिका जा रही है
अभी बारहवीं ही तो पास की है
९६.३%मार्क्स लेकर

गौरव और राधिका को
आज बैंगलोर ले कर गए है
वहाँ पढ़ाई अच्छी होती है

बच्चे सारे बिछुड़ रहे हैं
अब वो नहीं खेलेंगे मेरे साथ
नहीं पूछेंगे मुझसे आ कर कोई बात

उनकी स्मृतियाँ मन में संजोए
मेरी उँगलियाँ चलती रहेगी कंप्यूटर पर
आँखें जमी रहेगी स्क्रीन पर
कोई आ कर रख देगा बगल में
एक चाय की प्याली।



Friday, May 20, 2016

खुशियाँ खो गई खँडहरों में

उजड़ गया मेरा चमन
लूट गयी मेरी बहारें
मुरझा गई प्यार की कली
फूल बन गए अंगारें

मिल गया अनन्त
विछोह का दर्द
साथ रह गया केवल
यादों का अथाह समुद्र

कुछ समय के लिए
आई थी जीवन में बहार
लेकिन अब तो जिन्दगी भर
पतझड़ ही बनेगा कहार

अब सिर उठाने को
न भोर है न सूरज है
और न सिर छिपाने को
शाम है न चाँद है

घसीटता रहूंगा 
जिंदगी के सलीब को 
बना कर सहारा 
तुम्हारी यादों को। 



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]

Thursday, May 19, 2016

अब तुम्हारी याद में

राह सफर में साथी छुटा, अब जीना तन्हाई में  
आँखों से अश्रु जल बहता, अब तुम्हारी याद में।     

 दुःख मेरा क्या बतलाऊँ,दिल रोता है रातों में  
खोया-खोया मन रहता है,अब तुम्हारी याद में।

गर्मी हो या सर्दी हो, क्या बसंत और क्या सावन
हर मौसम लगता है पतझड़, अब तुम्हारी याद में।

एक तुम्हारे प्यार बिना, नीरस फीका यह जीवन
पीली पड़ गई खुशियाँ सारी,अब तुम्हारी याद में।


जब से तुम बिछुड़ी मुझसे, नींद खो गई रातों में 
दिल धड़कता रहता मेरा, अब तुम्हारी याद में।   

मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राहें हैं
मन रहता है सूना-सूना, अब तुम्हारी याद में।




                                             [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]


Tuesday, May 17, 2016

अब गीत नहीं लिख पाउँगा

बिना तुम्हारे मेरा मन
बेचैनी से अकुलाएगा
याद तुम्हारी आएगी 
नयन नीर भर जाएगा 
इस जीवन में तुमको मैं
भूल कभी नहीं पाउँगा, अब गीत नहीं लिख पाउँगा। 

संध्या की लाली जब 
दूर क्षितिज पर छाएगी 
चरवाहें घर को लौटेंगे 
सांध्य रागिनी गाएगी 
मैं बैठा चुपचाप सुनूंगा 
साथ नहीं दे पाउँगा, अब गीत नहीं लिख पाउँगा। 

होली के आने की बेला 
शोर मचेगा गलियों में 
धूम मचेगी रंग उड़ेगा 
एक बार फिर आँगन में
याद तुम्हारी साथ लिए 
मैं सपनों में खो जाउँगा,अब गीत नहीं लिख पाउँगा। 

काले-कजरारे बादल 
जब आसमान में छाएंगे 
बरखा बरसेगी चहुँ ओर 
नृत्य मयूर दिखलाएंगे 
तुम से मिलने की चाह लिए
दिल को कैसे समझाऊँगा,अब गीत नहीं लिख पाउँगा। 




                                                    [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]





Saturday, May 7, 2016

तेरी याद दिलाए रे


फागुन मस्त बयार चली, याद तुम्हारी आए रे
सरसों ने भी ली अंगड़ाई, पोर-पोर महकाए रे।

बाजे ढोल, मृदंग,चंग, आज फिर होली आई रे
   कौन आएगा अब बाहों में,नयन नीर बरसाए रे। 


बिना तुम्हारे कैसे मनाऊं, मैं होली त्यौहार रे                                                                                                    
खो गई मेरी हँसी ठिठोली, कैसे खेलु होली रे।  

सब के संग रंग-पिचकारी, सबके हाथ गुलाल रे 
     मैं किस के संग खेलु होली, मेरी झोली खाली रे।     

याद तुम्हारी मुझको आए, कौन अबीर लगाए रे
बिना तुम्हारे मेरे कपड़े, रह गए कोरे के कोरे रे। 


फागुन आया रंग-रंगीला, मन मेरा अकुलाए रे
  हलवा,गुजिया और मिठाई, तेरी याद दिलाए रे।

पिचकारी संग रंग उड़त है, हाथों उड़े गुलाल रे
हर कोने मैं तुमको ढूंढूं, घर आँगन चौबारा  रे।



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है ]



Friday, April 29, 2016

नाईट कल्ब

बहु देख रही है
फैशन मैगजीन में अपने लिए
लेटेस्ट डिजाइन किया हुआ परिधान
उसे अपने आप को साबित करना है
किटी पार्टी की सहेलियों के बिच में

चौंका देना चाहती है वह सबको
शादी की साल गिरह की पार्टी
शहर के महंगे नाईट कल्ब में देकर
उसे दिखना है अपना वजूद
फ्रेंड सर्कल के बिच में

शराब के टकराते जाम
धुऐं के उठते गुब्बार
नाचती बार बालाओं के बिच
उसे दिखाना है अपने आप को मॉडर्न
सोसाइटी के बिच में

आश्वस्त होती है
मेरी कविता यह सब देख कर
तुलसी की जगह कैक्टस
रोपने के दिन आ गए हैं  बिच में।





Wednesday, April 27, 2016

दीवाली और तुम्हारी यादें

दिवाली है आज
बहुएं-बेटे दीप जला कर
कर रहे हैं घर में रोशनी

पोते-पोतियाँ
रंग-बिरंगें कपड़े पहन
जला रहे हैं आतिशबाजी

बहुऐं सजा रही है
खाने की थाली
ढ़ेर सारे पकवानों के संग

मगर आज तुम नहीं हो
कौन करेगा मनुहार 
कि थोड़ा तो और लो

कौन पूछेगा कि
कैसा बना है हलवा ?
कैसा उगटा है
कांजी बड़े का पानी ?

मेरी दीवाली तो तब होती
जब तुम मेरे साथ होती
बिना तुम्हारे क्या दिवाली
और क्या अब होली ?


कोलकाता
३० अक्टुम्बर,२०१६


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]


सुबह का सपना

लोग कहते हैं
सुबह का सपना
सच होता है

आज मैंने तुम्हें
सुबह के सपने में
देखा

एक संदली सुगंध
फ़ैल गई थी चहुँ
ओर

मेरे दिल का चमन
खिल उठा था
तुम्हें देख

एक अजीब सा
सुकून था
तुम्हारे चहरे पर

सदा की भांति
चमक रही थी
तुम्हारी आँखें

हँसते - हँसते तुम
कर रही थी
मुझसे बातें

अचानक चार बजे
घड़ी का अलार्म
बज उठा

आँखें खुल गई
नींद उचट गई
सपना टूट गया

काश ! लोगो का कहना
सच हो जाए
आज मेरा भी
सुबह का सपना
सच हो जाए।



  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Friday, April 15, 2016

धर कूंचा धर मंजलां रै (राजस्थानी कविता)

बाळू म्हारी सोने री खान रै
इरो घणो करां म्है गुमान रै
आतो धोरा री मुसकान रै
निपजै मीठा बोर मतीरा रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु  बाजरियाँ लहरावे रै
काचर लौट-पौट हो ज्यावै रै
आतो कोसा-कोस बै ज्यावै रै
जद चाळै बायरो झिणो रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळू मैहके बिरखा मांई रै
जद भरयो भादवो गाजे रै
आतो घणी सोवणी लागै रै 
जद चौमासे खैती निपजै रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु उंदाळे री रमझोळ रै
चालै आंध्यां घणी खेंखाती रै
आतो पसरै कोसां कोस रै
भर दै घर आंगणा गौर रै 
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।





Thursday, April 14, 2016

बेदर्द जिंदगी

मेरे पास अब केवल तुम्हारी यादें बची हैं
अब मैं यादों के सहारे ही जिए जा रहा हूँ।

मेरी जान तो तुम्हारे संग  ही  निकल गई
अब तो बस जिंदगी को घसीटे जा रहा हूँ।

शोक सागर पर खड़ा कर दिया तुमने मुझे
अब तो मन में कसक लिए जिए जा रहा हूँ।

 तुम्हारे बिना विरान हो गई मेरी जिंदगी
   अब तो हर सांस में दर्द जिए जा रहा हूँ।

जीवन तो वही था जो तुम्हारे संग जीया
अब तो रातें तारे गिन-गिन काट रहा हूँ।

मैं भूल गया प्यार भरे गीतों को लिखना     


 अब तो दर्द भरे गीत ही लिखे जा रहा हूँ।      
                                        

   [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]


इन्तजार में

आज फिर गया था
फरीदाबाद वाले घर
दरवाजे पर पहुंचा तो सोचा
तुम सदा की भांति
सामने आओगी
लेकिन तुम नहीं आई

सीधा तुम्हारे कमरे में गया
लेकिन तुम नहीं थी वहाँ भी
खाली मन से कमरे-दर-कमरे
ढूंढता रहा तुम्हें

मन में लगता रहा कि
किसी न किसी कमरे से
तुम अभी निकल आओगी

सामने आकर
मुझे अचानक पूछोगी
कैसे हैं आप

मैं तुम्हारी आवाज की
गहराई में डूबा
निहारता रहूंगा तुम्हें

अब यह मैं नहीं कहूंगा
काश ऐसा होता
वैसा होता।







Friday, April 8, 2016

माँ का आशीर्वाद

आज से ठीक चार महीने पहले
घर में खुशियों का माहौल था
किसी का भी पाँव जमीं पर
नहीं टिक रहा था।

मम्मी-पापा की शादी की
गोल्डन जुबली मनाई थी
सबने साथ मिल कर
ढेरों खुशियाँ बाँटी थी।

लेकिन आज लगता है जैसे
जीवन में सब कुछ थम गया है
जीवन की राह में एक
पूर्ण विराम लग गया है।

अचानक मम्मी हम सब को 
अकेले छोड़ कर चली गई
अपनी ईह लीला समाप्त कर
ईश्वर में विलीन हो गई। 

अब तो लगता है बिना मम्मी
के घर जैसे वीरान हो गया है
खुशियों से भरे जीवन में
वृजपात हो गया है। 

किससे जाकर कहूँ कि मम्मी
तुम्हारी बहुत याद आती है
हर पल तुम्हारी यादें
आँखों से अश्रु बहाती है।

लेकिन हमें पूर्ण विश्वास है 
मम्मी आज भी हमारे साथ है 
वो हमारे जीवन का
पथ-प्रदर्शन कर रही है। 

जब तक मम्मी का
आशीर्वाद हमारे साथ है
जीवन खुशियों से भरा रहेगा
ऐसा हम सब का विश्वाश है।


फरीदाबाद
२० सितम्बर,२०१४

लेखक - मनीष कांकाणी

Friday, March 25, 2016

समा जाओ मेरी बाहों में

सरसों झूम रही है खेतों में
आम्र मंजरी महक उठी है बागों में            
 अनुरागी भंवरा ढूंढ़ रहा कलियों को          
कोयलियां कुक रही है कुंजों में       

       मुस्करा कर ऋतुराज 
भर रहा बसंत को बाहों में 
     रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
          बाग़ और बगीचों में  
     
           बसंती चादर ओढ़
   सरसों झूम उठी है खेतों में     
    लताऐं कर रही पेड़ों का आलिंगन                
  गौरैया फुदक रही है आँगन में         

          लौट आओ तुम भी
              मदमाते बसंत की बहारों में              
     आकर एक बार फिर से
        समा जाओ मेरी बाँहों में।     



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Monday, March 7, 2016

सब बिछुड़ गए है

सिर्फ तुम्ही नहीं गई हो
मेरे जीवन से
बल्कि
दिल का चैन
मुस्कराते नयन
खिलखिलाती हँसी
दरवाजे की गाय
आँगन की चिड़िया
घर का आइना
रसोई की खुशबू
प्यार का संबोधन
भोर का सूरज
सब बिछुड़ गए है
मेरे जीवन से
तुम्हारे जाने के बाद।



Saturday, March 5, 2016

जिन्दगी वही थी

जिस समय को हमने
एक दूजे के साथ जिया
जिन्दगी वही थी

भले ही उन लम्हों को
हमने हँसते हुए बिताया
या एक दूजे की बाँहों में जिया
लेकिन जिन्दगी वही थी

भले ही उन क्षणों को
हमने हाथों में हाथ डाले बिताया
या आँखों में आँखें डाले जिया
लेकिन जिन्दगी वही थी

भले ही उस वक्त को
हमने उलझी अलकों को
सुलझाने में बिताया
या एक दूजे के पहलू में जिया
लेकिन जिन्दगी वही थी

उगते सूरज के साथ
चमकते चाँद के साथ
टूटते तारों के साथ
जो पल हमने साथ-साथ जिये
असल में जिन्दगी वही थी।



  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Friday, February 26, 2016

तुमने कहा था

एक बार तुमने मुझ से कहा था-
जब मैं चिर निंद्रा में
विलीन हो जाँउगी
तो यह मत समझ लेना कि
मैं तुमसे दूर चली जाऊँगी

मुझे पाने के लिए
अपने दिल के भीतर झाँकना
मैं तुम्हें वहीं मिल जाऊँगी
मैं कहीं भी चली जाऊँ
तुम्हारे दिल में सदा बसी रहूँगी

आज तन्हाई की बेला में
मैंने जैसे ही तुम्हें याद किया
तुम चली आई मेरी यादों में
पलकों को बंद करते ही
तुम समा गई मेरे ख्यालों में

तुमने सच ही कहा था
तुम सदा मेरे दिल में बसी रहोगी
मेरे मन के अदृश्य कोने में
तुम सदा जीवित रहोगी।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]



Friday, February 12, 2016

जिंदगी को हँस कर जीना सीखो

जिंदगी को हँस कर जीना सीखो
दुःखियों को गले लगाना सीखो
यदि जीवन सुख से जीना है तो
जीवन को सत्कर्म में लगाना सीखो

मन प्रभु में समर्पित करना सीखो
परोपकार का जीवन जीना सीखो
यदि जीवन को सफल बनाना है तो
हर धर्म का आदर करना सीखो।

ईर्ष्या,द्वेष,घृणा को मिटाना सीखो
मन में करुणा भाव जगाना सीखो
यदि धरा को स्वर्ग बनाना है तो
आपस में मिल-झूल रहना सीखो

नदियों को स्वच्छ रखना सीखो
पेड़ों-वनस्पतियों को बचाना सीखो
यदि स्वस्थ-निरोग रहना है तो 
पर्यावरण को संरक्षण देना सीखो।  




Thursday, February 11, 2016

मेरे जीवन का बसंत

जब तक
तुम साथ थी
बसंत आने पर
फूल ही नहीं खिलते थे
खिल जाते थे हमारे दिल भी

गुनगुनाती थी साँसें
मचलते थे नयन
छा जाती थी मादकता
बसंती बयार कर देती थी
हमारे दिलों को सरोबोर
अपनी महक से

बहती तोआज भी है
बसंती बयार
ले आती है मादकता भी
किसी न किसी अमराई से
करा देती है चुपके से
बसंत के आगमन का आभास

लद जाता है
पलाश भी फूलों से
झरने लगती है मंजरी
भी आम्र कुंजों में
ओढ़ लेती है धरा भी
धानी चुनर सरसों से

लेकिन मेरा दिल अब
नहीं बहलता
खिले हुए फूलों से
अमराइयों की खुशबू से
कोयलों की कूक से

कोहरा छा गया है
मेरे जीवन के बसंत पर
विरह की चादर ने ढक दिया
बसंतोत्सव को सदा-सदा के लिए

जीवन का सब कुछ
चला गया तुम्हारे ही संग
रह गया केवल पतझड़
अब मेरे जीवन के संग।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है ]




Tuesday, February 9, 2016

अब के बिछुड़े फिर न मिलेंगे

लहर सरीखा घुलना-मिलना,अपना रहता था
हवा सरीखा बहते रहना,अपना जीवन था
पलक झपकते छलिया सी,तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने
बिच राह ऐसे बिछुड़ेंगे
यह नहीं सोचा था मैंने। 

बार-बार मिलना जैसे,उत्सव लगता था
मीठे-मीठे बोल तुम्हारे,अमृत लगता था
गाते-गाते जीवन गीत, तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने   
  फासले ऐसे भी होंगे
यह नहीं सोचा था मैंने। 

भोला-भोला रूप तुम्हारा,परियों से भी प्यारा था
नथ-चूड़ी और पायल से,खनकता आँगन सारा था
जाने कैसी हवा चली, तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने   
मुस्कानें मुझसे रूठेगी
 यह नहीं सोचा था मैंने।  

साँसों का निश्वास तुम्हारा, चन्दन जूही सुवास था
आँखों में खिलता रहता, प्यार भरा मधुमास था
मुस्कानें हो गई पराई, तुम जो चली गई 

ऐसा नहीं चाहा था मैंने 
अब के बिछुड़े फिर न मिलेंगे        
यह नहीं सोचा था मैंने।






                                                 [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Saturday, February 6, 2016

बच्चे खो रहें हैं बचपन

बच्चे खो रहें हैं अपना बचपन
अब वो नहीं खेलने जाते
मैदानों में, पार्कों में, गलियों में,

अब वो देखने नहीं जाते
दशहरे, नागपंचमी, गणगौर
के मेले में

अब वो नहीं खेलते
गिल्ली डंडा, खोखो या कबड्डी
आपस में मिल-झूल कर

अब वो नहीं सुनते
नानी-दादी से किस्से-कहानियाँ
उनके पास बैठ कर

वो उलझ गए हैं
हंगामा, पोगो और टैलेंट हंट
के मायाजाल में

सिमट गया है उनका बचपन
टैब, मोबाइल और कम्प्यूटर
की स्क्रीन में

हरे-भरे मैदानों में दौड़ते
बच्चों को देखना लगता है अब
सपना ही रह जाएगा

तितलियों के पीछे दौड़ता
बचपन देखना लगता है अब
बीते जमाने की बात रह जाएगा।


Wednesday, January 20, 2016

वो नारी थी

मृत पति संग
चिता पर जलाई गई
पांच पतियों समुख
निर्वस्त्र की गई
श्राप देकर पाषाण बनाई गई
वो नारी थी।

अग्नि परीक्षा ली गई
तलाक के तीन शब्द बोल
परित्यक्ता बनाई गई
बोटी-बोटी काट
तंदूर में जलाई गई
वो नारी थी।

पाषाण शीला खण्डों पर
नग्न देह उकेरी गई
जानवरों की भांति
नीलाम की गई
जन्म से पहले
कोख में मारी गई
वो नारी थी।

जलती लकड़ी से दागी गई
मिट्टी के तेल से जलाई गई
डायन कह कर पुकारी गई
वो नारी थी।

उसने प्रतिकार नहीं किया
जुल्मों को सह लिया
आज की नारी जुल्म नहीं सहेगी
वो प्रतिकार करेगी
वो अपनी जिंदगी जिएगी।











Sunday, January 17, 2016

ससुराल

पीहर आने पर
लड़की ढ़ूँढतीं है अपना बचपन
जिसे वो रख कर भूल गई थी
घर के किसी कोने में
अपने गुड्डे गड्डियों के संग

माँ बाप का सानिध्य में
लौट आता है बचपन
घर में फिर से
सुनाई पड़ने लगती है
खिलखिलाहट

पीहर में आकर
वह नहीं करती कोई शिकायत
अपने घर परिवार और
जिंदगी के बारे में

वो जानती है
अब इस घर में बदल गई है
उसकी भूमिका

जैसे सूर्य से अलग हो कर
दूरियाँ बन जाती है
सौरमंडल के ग्रहों में

उसी प्रकार
अब उसे भी चलना होगा
अपनी धुरी पर अपने
परिक्रमा मार्ग में

चंद दिनों बाद
मधुर स्मृतियाँ संजोये
वो लौट आती है अपने घर
अपने पीहर से।









Friday, January 15, 2016

हर नर में नारायण तुम हो।

तन में तुम हो मन में तुम हो
जीवन के हर कण में तुम हो 
मंदिर जाकर क्या होगा जब 
हर नर में नारायण तुम हो।  

तुमसे मिलने पाया जीवन 
लेकिन मुझको लगता बंधन 
जीवन मुक्त करो प्रभु मोरे 
दे दो दर्शन अब दुःख भंजन। 

ध्यान धरूँ प्रभु के चरणों में 
पावुं आनंद प्रभु के चरणों में 
क्या रखा काबा काशी में 
मिले शान्ति प्रभु के चरणों में। 

दिया मुझे उत्तम से उत्तम 
सब कुछ देने में तुम सक्षम 
नहीं चाहिए धन और दौलत
तुम हो मेरे, है क्या यह कम।




सद विचार

धन-दौलत का घमंड ठीक नहीं
आज है कल का कोई ठीक नहीं
दो-चार दिन की इस जिंदगी में
किसीको दुःख पहुँचना ठीक नहीं।

जीवन में अपने कर्मों को सुधारो
जीवन में अपने भावों को सुधारो
केवल तन सजाने से कुछ नहीं होगा
जीवन में अपने चिंतन को सुधारो।

जो समय का सम्मान किया करते हैं
जीवन का आनंद वो ही लिया करते हैं
जीवन में सफलता उन्हीं को मिलती है
जो समय की कीमत पहचाना करते है।

संतोषी सदा सुखी रहा करता है
सदा सुख की नींद सोया करता है
उल्लास आनद भी तभी मिलता है
जब मन में संतोष रहा करता है।


Wednesday, January 13, 2016

मेरा स्वाभिमान

सर्द अँधेरी रात
बर्फीली हवाओं के झोंके
कम्पा देने वाली
ठिठुरी हड्डी सी रात

दिन भर गलियों में
भीख माँगने के उपरान्त
अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ
सड़क किनारे पड़े गट्टर में
ऊंघती औरत

भूख और गरीबी से झुंझते
ठण्ड से ठिठुरते
पुल के निचे सहमे सिमटे
लावारिस बच्चे

टूटे टीन के शेड और
पॉलिथीन के टुकड़ों से बनी
झोंपड़ियों में दुबके
भिखारियों के परिवार

इन्हें देख झकझोरता
स्वाभिमान मुझे
कैसा है यह महानगर
धनी-निर्धन की बदकिस्मत
दीवारों से बंटा हुआ

क्या जागेगा
मानव ह्रदय कभी
उड़ेलेगा सूर्य की तरह प्रकाश
सम्पूर्ण मानव जाति पर
एक सामान

और बनेगा सुन्दर
सद्भावना पूर्ण संसार
एक दिब्य संसार।




बसंत अब

कंकरीट के जंगलों में
प्रदूषण भरे शहरों में
गंधाती संकरी गलियों में
क्या अब कभी बसंत आएगा ?

नजदीकी उद्यान में
कोठी के लॉन में
बंगले के ड्राइंग रूम में
क्या अब कभी बसंत मुस्करायेगा ?

दूरदर्शन के चैनल पर
आकाशवाणी के विशेष कार्यक्रम में
समाचार पत्रों के विशेष स्तम्भ में
काब्य सम्मेलनों के मंच पर
थोड़े समय के लिए उपस्थित होगा बसंत

लगता है बसंत अब
गुजरे जमाने की बात
हो जाने की राह पर है।


Saturday, January 9, 2016

जो दूसरों के दुःख मिटाते रहे

सभी करनी का फल भोगने आते हैं
फल भोग कर वापिस चले जाते हैं
दो दिन के लिए मिलता है  जीवन
फिर भी कहाँ शांति से रह पाते हैं।

कमाने में ही लगे रहते है धन को
नहीं तृप्त कर  पाते कभी  मन को
किसने  समझा जीवन का उद्देस्य
भोगों में जर्जर कर देते हैं तन को।

कुछ तन को सजाने में लगे रहते हैं
कुछ धन को कमाने में लगे रहते हैं
जीवन तो उन्ही का सफल होता है
जो दूसरों के दुःखों को दूर करते हैं।

जो हथेली पर जान ले कर चलते हैं
अमृत की तरह जो जहर को पीते हैं
देश के नाम पर मर मिटने वाले ही
जीवन  में  नाम  अमर कर जाते हैं।


रह गई अब यादें

मोती जैसे उज्जवल दिन थे, स्वप्नील थी सब रातें
चली गई तुम साथ छोड़ कर, रह गई अब यादें।

     स्वर्ग भी स्वीकार नहीं था, उस एक पल के आगे
             जिस पल में था संग तुम्हारा, रहते नैना जागे।

पचास वर्ष तक जवां हुई थी, साथी प्रीत हमारी
पल भर में तुम चली गई, ले कर खुशियाँ सारी।

          विरह तुम्हारा मुझको, नहीं देगा सुख से जीने
           जीवन में दुःख-दर्द के प्याले, मुझको होंगे पीने।

जीवन में अब नहीं दीखता, मुझको कोई किनारा
कोई नहीं अब संगी-साथी, जो मुझ को दे सहारा।

एक बार तुम आ जाओ, मैं जी भर तुम से मिल लूंगा
 आँखों में बैठा कर तुमको, पलकों से बंद कर लूंगा।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]