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Friday, August 8, 2014

फिर याद तुम्हारी आई







तुमसे बिछुड़े हुए
एक महीना हो गया लेकिन 
मन आज भी नहीं मान रहा 

सोचा जैसे ही घर पहुचुँगा 
तुम सदा की भाँति मुझे 
दरवाजे पर मुस्कराती मिलोगी

और कहोगी-
हाथ मुँह धो कर 
कपड़े बदल लीजिए 
आज मैंने आपकी पसंद का
खाना बनाया है

गुंवार फली और
काचरे की सब्जी के साथ
बाजरे की रोटी और गुड़ 

आपको दोपहर में 
चाय के साथ केक पसंद है 
मैने कल शाम को ही 
केक बना लिया था

पाईनेपल और 
हेलेपिनो मंगा रखा है 
शाम को बना दूंगी पिज्जा

काश ! ऐसा ही होता 
लेकिन तुम तो इतनी दूर 
चली गई कि मैं आवाज भी दूंगा
तो वो भी लौट आएगी

तुम्हारा हाथ
पकड़ने के लिए 
हाथ बढ़ाऊंगा तो वो भी 
खाली हथेली लौट आएगी।



                                                       
                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]

फरीदाबाद
६ अगस्त, २०१४