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Monday, April 30, 2018

यादों की नाव

मेरी स्मृतियों में
आज भी ताजा है वे दिन
जब ढलती सांझ में
गंगा किनारे बंधी नाव में
जाकर बैठ जाते थे

गंगा की लहरों पर
हिचकोले खाती नाव में
शीतल  हवाओं के झोंके
मन को शकुन देते थे

कितनी बातें करते थे हम
अंत नहीं था बातों का
रात घिर आती लेकिन
बातें खतम नहीं होती थी

गीता भवन के
दरवाजे बंद होने की
घंटी सुन कर ही हम
लौटते थे अपने कमरे में

आज जब भी
तुम्हारी याद आती है
आँखों में उतर आती है गंगा
चल पड़ती है यादों की नाव।



 [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]