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Monday, March 2, 2015

जिंदगी को जी लिया था

आठ महीने हो गए तुमसे बिछुड़े हुए                                                                                                               नहीं लगता कि इस जीवन में
तुम से फिर कभी मिल सकूँगा 

कितनी हसीन थी हमारी जिंदगी
रिमझिम बरसता सावन  
रंग-गंध वाला बसंत
फूलों वाली चैती हवाए
कितना कुछ जीया हमने साथ-साथ 

चाँदी सी मोहक अदाएं
चन्दन सा आकर्षण
दीप सी दमकती आभा
कोयल सी आवाज
कितना कुछ था तुम्हारे पास मुझे देने

तुम मेरे लिए ईश्वर के किसी
आशीर्वाद से कम नहीं थी
जिन्ह लम्हों में तुम मेरे साथ थी
मैंने तो उसी में जिंदगी को जी लिया था



                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]

कोलकाता
६ मार्च, २०१५