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Thursday, October 13, 2011

बसंत



बसंत गावों में
आज भी आता है और
पूरे सबाब के साथ आता है  

सरसों आज भी गदराती है
आम  के पेड़ आज भी बौरातें हैं
बागों में कोयल आज भी गाती है

भंवरें आज भी गुनगुनाते  हैं
मोर बागो में आज  भी नाचते हैं   
पलास आज भी दहकता है

बसंत गावों में आज भी
पुरे सबाब के साथ आता है  
लेकिन महानगरों में बसंत
अब इन रंगों में नहीं आता है

कंकरीट के जंगल
बनने के बाद बसंत यहाँ
अब केवल बसंत पंचमी  के
दिन ही आता है

और शाम होते-होते    
रिक्शा खींचते-खींचते 
पसीने से तर-बतर  मंगलू की  
चरमराती छाती से
धौंकनी की तरह निकलती 
गरम-साँसों में मुरझा जाता है। 


कोलकत्ता
१४ अक्टुम्बर, 2011

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )