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Friday, September 16, 2011

अन्तर्यामी प्रभु

 आसमान के
द्वार पर आगंतुको का
रजिस्टर देखते हुए
 उदघोषक ने मेरा नाम पुकारा

मैं जैसे ही
  बैकुंठाधिपति के सामने खड़ा हुवा
चित्रगुप्त मुझसे पूछने लगे

 मैंने कहा प्रभु !
मुझसे क्यों पूछते हो
कर्ता-धर्ता तो सबके आप हो 

मैं तो निमित मात्र हूँ 
कर्णधार और सूत्रधार
तो आप ही हो 
  
आपने ही तो मुझे इस
महानाट्य का
 पात्र बनाया था

लीला तो प्रभु
चारों तरफ आप ही की
चल रही थी

मैं तो
आपके हाथ का
एक उपकरण मात्र था

आपने जो करवाया
वह मैंने किया
    जो बुलवाया वही बोला

   मैंने तो
    नहीं बनाई वासनायें
    नहीं रची कामनायें

यह सब कुछ
है आपका ही दिया
मैंने तो कुछ नहीं किया 
              
मुझे तो इस
नाटक के आदि-अन्त
का भी पता नहीं था

 आप ने ही तो
 गीता में कहा था  
निमित्तमात्र भवः  

  मैंने वही किया
केवल निमित्त मात्र बना
 आपका निर्देशित आचरण प्रभु

अब मुझे
       क्यों इस कठघरे में       
  खड़ा करके पूछ रहें हैं प्रभु ?
    
  यत्कृतं  यत् करिष्यामि तत् सर्वं  न मया कृतम्
त्वया कृतं तु  फलभुक् त्वमेव रघुनंदन।

कोलकत्ता
१६ सितम्बर, २०११



(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )