Wednesday, September 30, 2015

सच्चाई की कीमत

जब
मैंने तुमसे पूछा
तुमने
वही कहा
जो मैंने पूछा

जब
तुम से
पुछा गया
जो मैंने सूना
तब
तुमने वो नहीं कहा
जो मैंने सूना

इस
कहने सुनने में
शायद इसी तरह
जिंदगी निकल जाए

काश! तुम
सच्चाई की कीमत
समझो
तो जिंदगी को
जीने का
एक नया अर्थ
मिल जाए। 

Thursday, September 17, 2015

यादों की छाँव में

तुम्हारे बिना
गुजर गया एक साल
यह एक साल मुझे कईं
सदियों से भी बड़ा लगा

यदि मैं तुम्हें कहूँ कि
मेरा एक-एक दिन
पहाड़ जैसा गुजरा
तो भी तुम इसे पुरे सच का
एक हिस्सा भर समझना

पूरा सच तो
मैं ही जानता हूँ कि कैसे
गुजरा है मेरा एक साल
तुम्हारे बिना

बहुत गहराई से
महसूस किया है मैंने
विछोह के दर्द को
इन दिनों में

बार-बार
मन में उमड़ आती है
तुम्हारे साथ बिताए
संग सफर की यादें

भटकता रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति के जंगल में
जहाँ मिलने आती है
मुझसे तुम्हारी यादें। 




                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Thursday, September 10, 2015

आज भी याद आती है

जिंदगी के राहे-सफर में, तुम मुझे छोड़ चली गई
तुम्हारी प्यार भरी मुस्कान,आज भी याद आती है।

                                                        तुम्हारा दर्पण सा रुप, ओ चन्दन महकती देह  
                                                        संगमरमरी बाहों की, आज भी याद आती है।

तुम्हारा अनन्त प्रेम ओ प्यार भरा स्नेह स्पर्श 
कंचन सी काया की, आज भी याद आती है।                                        
                                                                                  
                                                      
                                                      तुम्हारी पायल की रुनझुन, ओ बिच्छियों की खनक                                                               कोयल सी मीठी आवाज की, आज भी याद आती है।       
                                                 
तुम्हारे मेहंदी लगे हाथ, ओ काजल लगे नैन  
लहराती जुल्फों की, आज भी  याद आती है।                        
                                                   
                                                            तुम्हारी प्यार भरी बातें ओ शोख भरी अदाऐं
                                                             हिरनी सी आँखों की, आज भी याद आती है।



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]





Tuesday, September 8, 2015

जिंदगी की कीमत

सन्मार्ग ७ सितम्बर,२०१५
पृष्ठ संख्या ८
भारवाहन-सवारी गाड़ी की
टक्कर, ६ मरे, ८ जख्मी

मामा के घर से दूध लेकर
लौट रहे युवक की ह्त्या,
पुरानी रंजिस को लेकर
महिला की ह्त्या

जौनपुर जेल में संघर्ष
३ लोग घायल,
यमुना एक्सप्रेस वे पर दुर्घटना
३ की मौत, ५ अन्य घायल

किशोरी से सामूहिक बलात्कार,
बेटी की बलि देने वाला
किसान गिरफ्तार

तालाब में नहाने गए
२ छात्र डूबे,
बदमाश ने सिपाही को
मारी गोली

अधिवक्ता ने की आत्महत्या,
ऑटोरिक्शा में ट्रक की टक्कर
२ महिलाओं समेत ४ मरे

पटना में युवक ने की आत्महत्या,
ट्रक नदी में गिरा चालक की मौत

ठाणे में दही हांडी उत्सव में
गिरने से मौत,
दो बहनों की जल कर मौत

टंकी में डूबने से २ सगे
भाइयों की मौत,
गोरखपुर में मस्तिस्क ज्वर से
३ बच्चों की मौत

चाय के गर्म घूंट के साथ
मैं सहजता से निगल लेता हूँ
इन खबरों को
मन ही मन खुश हो लेता हूँ कि
इन में मैं नहीं था

डूबने वाले लडके में
मेरा पप्पू नहीं था,
बलात्कार की शिकार
किशोरी मेरी बेटी नहीं थी

लेकिन
आखिर कब तक
हम सब लाचारगी और
बेबसी का जीवन जीते रहेंगे

किस दिन वक्त
भर सकेगा एक लम्बी सांस
एक सुन्दर संसार की कल्पना में।









Monday, September 7, 2015

आयशा का बचपन

कहाँ से सीखी इतनी बातें
कहाँ से लाई  यह सौगातें

बातें करती झटपट-झटपट
दौड़ी आती पटपट-पटपट

घंटी बजते ही गेट खोलती
दादा आए है सबको कहती

भरी शरारत आँखें मटकाती
मुझको तिरछी नजर दिखाती

कैसा देखो बचपन भैया
घर में नाचै ताता थैया।

Wednesday, September 2, 2015

वो आज सपनें में आई

जिसकी एक झलक पाने को            
मेरी आँखें तरस गई
उसके आते ही आँगन में       
प्रीत रेशमी बिखर गई 
वो आज सपनें में आई। 

मन के सुने अँधियारें में
उसने दीपक राग जलाई  
मधुर छुवन की मीठी यादें   
   उसने आकर के महकाई      
     वो आज सपनें में आई।  

   मन मयूर नाचा मेरा
     आँखें मेरी भर आई
   रात सुहानी कर दी उसने       
रजनीगंधा बन आई
    वो आज सपनें में आई। 

तारे डूबे एक-एक कर
      पूरब में लाली छाई 
फिर मिलने आउंगी तुमसे     
   वादा कर वो चली गई
वो आज सपने में आई। 

                                                                                                        

[ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]