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Monday, September 19, 2011

कुछ तुम भी करो

मैंने तुम्हे
अंधे की लाठी पकड़ कर
 सड़क पार कराते हुए
देखा है।

मैंने  तुम्हे
 घायल पड़े व्यक्ति को
  अस्पताल पहुंचाते हुए
देखा है।

मैंने तुम्हे 
वृद्धाश्रम में जन्मदिन 
 की खुशियाँ बाँटते हुए
देखा है।

मैंने तुम्हे
 असहाय व्यक्तियों की
 सहायता करते हुए
देखा है।

मैंने तुम्हे
प्यासे राहगीर को
पानी पिलाते हुए
   देखा है।

मैंने तुम्हे
रोते हुए बच्चे को
गोद में लेकर हंसाते हुए
देखा
तुम्हारे जैसा
इन्सान जब दुनिया से जायेगा
लोग अश्रुपूर्ण नेत्रों से बिदा करेंगे।

१८ सितम्बर, २०११
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )