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Wednesday, October 22, 2014

तुम संगदिल हो बेदिल नहीं



आज मैंने सूरज से पूछा--
रोज सुबह वो तुम्हें
अर्ध्ये दिया करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
सूरज ने कहा -वो अच्छी है
और चला गया पहाड़ों के पीछे।

आज मैंने चाँद से पूछा--
तुम्हें देख-देख वो रोज
अपनी पोते-पोतियों को लोरियाँ
सुनाया करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
चाँद ने कहा - वो अच्छी है
और चला गया बादलों के पीछे।

आज मैंने हवाओं से पूछा--
तुम रोज उसके आँचल से
खेला करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
हवाओं ने कहा - वो अच्छी है
और चली गई पेड़ों से गुनगुनाने।

आज मैंने बादलों से पूछा--
तुम तो उसके पास से आते हो
आज मुझे बताओ
वो कैसी है ?
बादलों ने कहा - वो अच्छी है
और चले गए आकाश को चूमने।

मैंने सबसे कहा-
तब मुझे भी ले चलो
उस के पास
कोई भी तैयार नहीं हुवा
मुझे ले चलने तुम्हारे पास

मैंने तारों की पंचायत में
फ़रियाद लगाईं
चांदनी से सिफारिश करवाई
जंगल, पहाड़, नदियां से
प्रार्थना की
लेकिन कोई सुनाई नहीं हुई

मुझे पता है
तुम मेरे बिना
खुश रह ही नहीं सकती
तुम संगदिल हो बेदिल नहीं।




                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]