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Thursday, May 7, 2015

तुम से फिर मिलूंगा

तुम्हारे महाप्रयाण को देख
आँखों से अश्रुओं की
सरिता बहने लगी

साँसें अंदर से
लम्बी और गहरी
निकलने लगी

मैं तुम्हारे मुखमंडल को
दोनों हाथों से सहलाने लगा
काश! तुम कुछ बोलो

अपनी अंतिम बेला में
दो शब्द कहने के लिए
काश ! तुम अपना मुँह खोलो

लेकिन तुम तो
अलविदा की बेला में भी
निस्पृह थी

गर्व से ऊँचा मस्तक
शान्ती से मुंदी आँखें
त्याग की प्रतिमूर्ति
लग रही थी

लेकिन सुकून था मेरे दिल में
कि एक दिन मैं तुम से
फिर मिलूंगा

पता नहीं कहाँ और किस तरह
पर तुम से जरूर मिलूंगा
उस पराजगत में ही सही
लेकिन मिलूंगा।


                                                     [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]