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Thursday, September 17, 2015

यादों की छाँव में

तुम्हारे बिना
गुजर गया एक साल
यह एक साल मुझे कईं
सदियों से भी बड़ा लगा

यदि मैं तुम्हें कहूँ कि
मेरा एक-एक दिन
पहाड़ जैसा गुजरा
तो भी तुम इसे पुरे सच का
एक हिस्सा भर समझना

पूरा सच तो
मैं ही जानता हूँ कि कैसे
गुजरा है मेरा एक साल
तुम्हारे बिना

बहुत गहराई से
महसूस किया है मैंने
विछोह के दर्द को
इन दिनों में

बार-बार
मन में उमड़ आती है
तुम्हारे साथ बिताए
संग सफर की यादें

भटकता रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति के जंगल में
जहाँ मिलने आती है
मुझसे तुम्हारी यादें। 




                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]