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Monday, July 18, 2016

विछोह का दर्द

तुम्हारे विछोह के बाद
अब मुझे कुछ भी
अच्छा नहीं लगता

खाने बैठता हूँ तो
दाल पनीली लगती है
सब्जियाँ बेस्वाद लगती है

कोई मिलने आता है तो
मुलाकातें बेगानी लगती है
दिन अनमना और
रातें पहाड़ लगती है

नहीं करता मन अब
बरामदे में बैठ चाय पीने का
पार्क में जाकर अकेले
घूम आने का

विंध्य से लेकर हिमालय तक
गंगा से लेकर वोल्गा तक
न जाने कितने पहाड़ और नदियाँ
तुम्हारे संग जीवन में पार की

लेकिन आज
तुम्हारे विछोह के दर्द को
पार पाना मेरे लिए
भारी हो गया।


  ( यह कविता "कुछ अनकही ***"में छप गई है। )