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Wednesday, April 3, 2013

एक नया सफ़र





मेरी शादी की चुन्दड़ी में
लगे सलमे-सितारे अब मेरी
आत्मा में चुभने लगे है।


लग्न और मुहूर्त में
बन्धे ये सारे बन्धन
मुझे अब झूठे लगने लगे है।


मै नहीं भूला सकती
अपनी पीड़ा और अपमान
जो उसने मुझे दिये है।


व्यथित शब्दों
के तीर अब मेरे ध्यैर्य की
आख़िरी सीमा भी लांघ गये है।


मेरा स्वाभिमान भी
अब उसके अंहकार के लिए
खतरा बन गया।


मैंने जितना
समर्पण का भाव रखा
उतना ही वो निष्ठुर बन गया।


मै जीवन संगिनी
या सहभागिनी की जगह
बंदिनी बना दी गयी।


कंकरीट में दबी
पगडण्डी की तरह मेरी
सभी इच्छाए दबादी गयी।


मै अब इस बंधन से
मुक्त होकर अपना नया
जीवन जीना चाहती हूँ।


पुरानी यादो को
अब मै हमेशा के लिए
दफना देना चाहती हूँ।


अपनी शादी की
चुन्दडी को अब मै
उतार देना चाहती हूँ।

 
उसमे लगे
सलमे-सितारे अब मै
उधेड़ देना चाहती हूँ।