Thursday, July 28, 2016

तुम जो बिछुड़ गई

सुनी यादों के जंगल में, खाली मेरा जीवन है  
गीत अधूरे रह गए मेरे, तुम जो बिछुड़ गई।

                                                          मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राहें हैं                                                            जिंदगी अब दर्द बन गई, तुम जो बिछुड़ गई।

दर्दीले गीतों को देकर,अलविदा तुम कह गई 
यादें अब तड़पाती मुझको, तुम जो बिछुड़ गई।

साथ जियेंगे साथ मरेगें, हमने कसमें खाई थी
जीवन ही वीरान हो गया,तुम जो बिछुड़ गई।

सपने मेरे सपने रह गए,ऑंखें हैं अब भरी-भरी
टूट पड़ा है पहाड़ दुःखों का,तुम जो बिछुड़ गई।

अब न कोई संगी-साथी, राहों में जो साथ चले
जीवन-पथ में रहा अकेला, तुम जो बिछुड़ गई।

किससे मन की बात करूँ,संग तुम्हारा रहा नहीं
कैसे अब दिल को बहलाऊँ, तुम जो बिछुड़ गई।








प्रार्थना

प्रभु !
हमें भक्ति दो 
हमें शक्ति दो 
हमें अपने चरणों में 
आसक्ति दो। 

शक्ति नहीं हममे इतनी 
गुण आपके गा पाए 
है अज्ञानी बालक हम सब 
प्रभु चरणों में शीश नवाए। 

मोह-बंधन की काट बेड़ियां 
जीवन पथ आलोकित कर दो 
कर पाएं हम दर्शन निश दिन 
ऐसी दृस्टि हमें दे दो।  

अंतर्मन का हरो अन्धेरा 
मन में ज्ञान की गंगा बहादो 
कर्तव्य का बोध हमें हो 
ऐसा पावन मन बनादो। 


Saturday, July 23, 2016

एक दिन साथ-साथ

एक दिन हम
गीता भवन के घाट पर
गंगा में नहाएंगे साथ-साथ

गंगा बदरीनाथ से आगे
गंगोत्री से निकलती है
हम इसे जानते हैं और
न भी जानते तो भी क्या
साथ-साथ नहाना तो हमें
अच्छा ही लगेगा

नहाने के बाद
करेंगे पूजा गंगा की और
चलेंगे नाश्ता करने गीता भवन की
मिठाई की दुकान पर

शाम का खाना हम
चोटिवाले के यहाँ खाएंगे
आइसक्रीम खाने चलेंगे
नौका में बैठ मुनि की रेती

लौटते समय
राम झूला पर खिलाएंगे
चने बंदरों को
आटे की गोलियां डालेंगे
मछलियों को

बालूघाट पर
खोदेंगे गीली,नरम रेत
और निकालेंगे गंगा का स्रोता

घर लौटते समय
तुम देना अपना हाथ मेरे हाथ में
उड़ेलना ह्रदय का थोड़ा सा  प्यार।



Tuesday, July 19, 2016

याद तुम्हारी गीत बन गई

फ्रेम में जड़ी तुम्हारी
तस्वीर देख कर सोचता हूँ
आज भी दमक रही होगी 
तुम्हारे भाल पर लाल बिंदिया

कन्धों पर लहरा रहे होंगे 
सुनहरे रेशमी बाल 
चहरे पर फूट रहा होगा 
हँसी का झरना

चमक रही होगी मद भरी आँखें
झेंप रही होगी थोड़ी सी पलकें
देह से फुट रही होगी 
संदली सौरभ 

बह रही होगी मन में  
मिलन की उमंगे 
बौरा रही होगी प्रीत चितवन 
गूंज रहा होगा रोम-रोम में
प्यार का अनहद नाद

मेरे मन में आज भी थिरकती है
आषाढ की बारिश में उपजे
तालछापर के मोथियों की
जड़ों सी मीठी तुम्हारी यादें।







Monday, July 18, 2016

विछोह का दर्द

तुम्हारे विछोह के बाद
अब मुझे कुछ भी
अच्छा नहीं लगता

खाने बैठता हूँ तो
दाल पनीली लगती है
सब्जियाँ बेस्वाद लगती है
कोई मिलने आता है तो
मुलाकातें बेगानी लगती है

दिन अनमना और
रातें पहाड़ लगती है
अब नहीं मिलता सुकून
आसमान में चमकते चाँद से

बरामदे में बैठ अब
अकेले मन नहीं करता
चाय पीने का
पार्क में जाकर अब
अकेले मन नहीं करता
घूमने का

विंध्य से लेकर हिमालय तक
गंगा से लेकर वोल्गा तक
न जाने कितने पहाड़ और नदियाँ
तुम्हारे संग जीवन में पार की
लेकिन आज तुम्हारे
विछोह के इस दर्द को पार पाना
मेरे लिए भारी हो गया।