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Wednesday, October 9, 2013

पावन गंगा






स्वर्गलोक से भूलोक में चली आई गंगा
कर निनाद पहाड़ों में बहती चली गंगा 

जाति-धर्म से बंधकर नहीं रही गंगा
शीतल-निर्मल जल बहाती चली गंगा

ऋषियों की तपस्थली सदा बनी गंगा
जन-जन के कष्ट हरे ममता मयी गंगा

वसुंधरा को हरित बना बहती रही गंगा
जंगल में सदा मंगल करती  रही गंगा

तीर्थ बने नगर सभी जहाँ से निकली गंगा
जन शैलाब उमड़ पडा संगम बनी  गंगा

बहना ही जीवन जिसका रुकती नहीं गंगा
कागद्विप में आकर सागर में मिली  गंगा

आज अपनी पहचान खो रही है गंगा
अमृत बदला जहर में सूख रही गंगा

मत आहत करो प्रकृति कहती रही गंगा
वरना एक दिन जलजला  लाएगी गंगा।



[ यह कविता "एक नया सफर " पुस्तक में प्रकाशित हो गई है। ]