Monday, December 28, 2015

तकिया भीगता रहा रात भर

पलकों में यादें तरसाती रही रात भर                                                                                            
        नयनों में आस ललसाती रही रात भर  
             विरह में मन तड़पता रहा रात भर  
        यादों में करवटें बदलता रहा रात भर।   
                                                                                        
                                                            राहों में पलकें बिछाता रहा रात भर     
                                                           टूटते ख़्वाबो को सजाता रहा रात भर 
                                                           दर्द भरे नग्में  गुनगुनाता रहा रात भर 
                                                          आरजू का दिया जलाता रहा रात भर। 

  काटों की सेज पर सोता रहा रात भर 
  आसमान में तारे गिनता रहा रात भर 
  बिखरे अरमान समेटता रहा रात भर 
तन्हाई के गीत गुनगुनाता रहा रात भर। 
     

                                                               मिलन का इन्तजार करता रहा रात भर      
                                                               टूटती सांसो को संभालता रहा रात भर        
                                                               यादों से दिल को बहलाता रहा रात भर         
                                                                सिर निचे तकिया भीगता रहा रात भर।                                                                                    
 
   
 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]


Monday, November 2, 2015

तुम्हारी चंचल यादें

बड़ी चंचल है तुम्हारी यादें
    वक्त-बेवक्त,गाहे-बे-गाहे
जब होती मर्जी चली आती है    

 न मन के द्वार पर दस्तक देती  
 न दिल को हरकारा भेजती
 न दिमाग की कॉल बेल बजाती        

        न सुबह-शाम देखती
          न रात-दिन देखती
   पलक झपकते ही चली आती है           

 न कोई आने का अंदेशा
             न कोई सन्देशा
         न ही कोई इशारा

   आती है अचानक ऐसे
   जैसे खामोश झील में
डाल दिया हो किसी ने कंकड़        

जैसे कान्हा के मन्दिर में
           अचानक किसी ने
         बजा दी हो घंटियाँ  
          
  तुम्हारी चंचल यादों की   
      भीनी-भीनी खुशबु
   छा जाती है दिलो दिमाग में।         


 [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]





Saturday, October 31, 2015

तुम्हारी धरोहर



सारी दुनियाँ
जब सो जाती है
तब मैं खो जाता हूँ
सपनों की गोद में

तुम्हारी यादों के संग
पल-पल गुजरती रातों में
मैं जोड़ता  रहता हूँ
यादों की लड़ियों को

बचपन में तुम्हारा
दुल्हन बन गांव आना
मेरा कॉलेज में पढ़ कर
छुट्टियों में घर आना

लड़ना-झगड़ना
प्यार मोहब्बत
बच्चों का होना
बहुओं का आना

पोते-पोतियों से
आँगन खिलखिलाना
कितना कुछ जीया हमने
इस जीवन में साथ-साथ

ये यादें
धरोहर है तुम्हारी
और जीवन की नाव को
खेने की अब पूंजी है मेरी।



  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]


Wednesday, October 28, 2015

पश्मीना

एक दम
खाटी पश्मीना
जिसे खरीदा था तुमने
कश्मीर से

नेफ्थलीन
की गोलियों के संग
सहेज कर रखती थी तुम
बड़े जतन से

कितने चाव से
पहनती थी तुम
सोहणा लगता था
तुम्हारे बदन से

बड़ा ही नरम
और मुलायम
लगा कर रखती थी
तुम बदन से

कश्मीरी बाला लगती
पहन कर पश्मीना
जैसे ढका हो गुलबदन
फूलों से

मैं जब कहता
लगालो काला टीका
शरमा जाती तुम
ढाँप लेती चेहरा
हाथों से।



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]






Monday, October 26, 2015

मैंने तुमसे प्रेम किया

मैंने तुमसे प्रेम किया 
तुमने मुझ से प्रेम किया 
हम दोनों ने एक दूजे से 
प्रेम किया

मैंने सौगात में तुम्हें
एक नदी दी 
तुमने मुझे पूरा समुद्र
दे दिया

मैंने सौगात में तुम्हें
कुछ तारे दिए 
तूमने मुझे पूरा आकाश 
दे दिया 

मैंने सौगात में तुम्हें
कुछ दिशाएं दी 
तुमने मुझे पूरा ब्रमांड 
दे दिया। 

मैंने सौगात में तुम्हें 
चंद बूंदे दी 
तुमने मुझे पूरा सावन 
दे दिया। 

आज तुम 
क्यों इतनी दूर जा कर 
बस गई हो 
मेरी निगाहों से 

अब मुझे 
हर बार तुम से मिलना 
पड़ता है 

दिल की राहों से 



Thursday, October 15, 2015

यही है संसार

पिता ने
पौध को माली की
तरह से पाल पोस कर
बड़ा किया था

कल्पना की थी
ठंडी छाँव और मीठे
फलों की

पेड़ों की
धमनियों में डाला था
अपना रक्त और जड़ों में
सींचा था अपना पसीना

लेकिन पेड़ों के
बड़े होते ही उनकी साँसों में
बहने लगी जमाने की हवा

अब पेड़ों की छाँव
वहाँ नहीं पड़ती जहाँ
पिता बैठते है

मीठे फलों की जगह
चखना पड़ता है
कडुवे फलों का स्वाद

जब तब
लगती है मन को ठेस
सिमटते रहते हैं पिता

लाचार
हो जाता है बुढ़ापा
जवान बेटो के आगे

मन दुःखता है
पर कह नहीं सकते
किसी को

याद आती है
जीवन-संगिनी
जो चली गई परलोक

घर के एक
कोने में गुमसुम बैठे
बतियातें हैं उससे और कहते हैं
पगली! यही है संसार।

उभर आता है
एक तारा आकाश में
सिहर उठता  है बेबशी पर।

















Friday, October 9, 2015

आयशा रंग भरती है

आयशा रंग भरती है
सूरज-चाँद,हवाई जहाज में
दिखाती है मुझे
नन्हें हाथों की कला देख
खुश होता हूँ मैं

पकाती है नन्हें बर्तनों में
अदरक वाली चाय
कम चीनी वाली कॉफी
लाकार देती है मुझे
तृप्त होता हूँ मैं

पहनती है साड़ी
माँ के दुपट्टे की बना कर
लगा कर घूँघट
दिखाती है मुझे
शर्माता हूँ मैं

कहती है मुझे
नारायण-नारायण
जय श्रीकृष्णा
सोने को जाते समय
लाड से अटपटा सा
बोलता  हूँ मैं।





Wednesday, October 7, 2015

तुम जो चली गई

मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राहें हैं                                                                                              
जिंदगी अब दर्द बन गई, तुम जो चली गई।

साथ जियेंगे साथ मरेगें, हमने कसमें खाई थी
पचास वर्ष के संग-सफर में, तुम जो चली गई।

जीवन मेरा रीता-रीता,ऑंखें हैं अब भरी-भरी
टूट पड़ा है पहाड़ दुःखों का,तुम जो चली गई।

नहीं काटे कटती है रात, सुख रहा है मेरा गात 
अँखियाँ नीर बहाती रहती, तुम जो चली गई।

अंत समय पास नहीं था, सदा रहेगा इसका दुःख
दिल में मेरे रह कर भी, बिना मिले तुम चली गई।

किससे मन की बात कहूँ ,साथ तुम्हारा रहा नहीं
उमड़ पड़ी है दुःख की नदियाँ, तुम जो चली गई।





                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Friday, October 2, 2015

सोच की सीमा

मैं जीना चाहती हूँ
उम्र का हर गुजरता लम्हा
अब केवल तुम्हारे साथ

लेकिन अब तुम्हारे पास
वक्त कहाँ है मेरे लिए
तुम तो अब इसे खुदगर्जी
की संज्ञा देने लग गए

तुम्हारा दिन तो
ऑफिस में बीतता है
शामें मीटिंग में ढलती है
देर रात पार्टियां चलती है

जब घर आते हो
अखबार,टी०वीo और
मोबाइल से घिर जाते हो

मेरे बात करने से पहले ही
राह में खड़ी हो जाती है
ये सारी सौतनें

अगर मेरा बस चलता
तो बंद कर देती अखबार
बेन कर देती टीo वीo के  प्रोग्राम
और मृत्यु दंड दे देती मोबाइल के
आविष्कारक को

मैं जानती हूँ
खुदगर्जी की पराकाष्ठा है यह
अपने से आगे नहीं सोच पाने का
एक मात्र स्वार्थ

पर मैं क्या करूँ
मेरे सोच की सीमा भी तो
तुम्हारे पास आकर
समाप्त हो जाती है।





Thursday, October 1, 2015

जन्म-जन्म का साथ हमारा

  मेरी जीवन की बगिया में
कोयल बन कर तुम चहकी,
   मेरे जीवन  की  राहों  में
सौरभ बन कर तुम महकी।

    मेरा भाग्य संवारा तुमने                                                 
    बादल बन कर छायां की,                                                 
    नया सवेरा आया  तुमसे                                                 
        खुशियों की  बरसाते की।                                                    

       मेरे ह्रदय की रानी बन        
       राज किया तुमने रानी,  
       मेरे मन  मंदिर में बैठी 
     मेरी सौन्दर्यमयी रमणी।    

      सोने जैसे दिन थे अपने                                                           
       चाँदी जैसी प्यारी रातें,                                                           
     सारी-सारी राते जगकर                                                           
        करते हम मन की बातें।                                                            

       कैसे करदु विस्मृत मन से   
        करुणा-प्रेम रूप तिहारा,
      सौ जन्मों का बंधन है यह   
     जन्म-जन्म का साथ हमारा।        


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]
















Wednesday, September 30, 2015

सच्चाई की कीमत

जब
मैंने तुमसे पूछा
तुमने
वही कहा
जो मैंने पूछा

जब
तुम से
पुछा गया
जो मैंने सूना
तब
तुमने वो नहीं कहा
जो मैंने सूना

इस
कहने सुनने में
शायद इसी तरह
जिंदगी निकल जाए

काश! तुम
सच्चाई की कीमत
समझो
तो जिंदगी को
जीने का
एक नया अर्थ
मिल जाए। 

Thursday, September 17, 2015

यादों की छाँव में

तुम्हारे बिना
गुजर गया एक साल
यह एक साल मुझे कईं
सदियों से भी बड़ा लगा

यदि मैं तुम्हें कहूँ कि
मेरा एक-एक दिन
पहाड़ जैसा गुजरा
तो भी तुम इसे पुरे सच का
एक हिस्सा भर समझना

पूरा सच तो
मैं ही जानता हूँ कि कैसे
गुजरा है मेरा एक साल
तुम्हारे बिना

बहुत गहराई से
महसूस किया है मैंने
विछोह के दर्द को
इन दिनों में

बार-बार
मन में उमड़ आती है
तुम्हारे साथ बिताए
संग सफर की यादें

भटकता रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति के जंगल में
जहाँ मिलने आती है
मुझसे तुम्हारी यादें। 




                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Thursday, September 10, 2015

आज भी याद आती है

जिंदगी के राहे-सफर में, तुम मुझे छोड़ चली गई
तुम्हारी प्यार भरी मुस्कान,आज भी याद आती है।

                                                        तुम्हारा दर्पण सा रुप, ओ चन्दन महकती देह  
                                                        संगमरमरी बाहों की, आज भी याद आती है।

तुम्हारा अनन्त प्रेम ओ प्यार भरा स्नेह स्पर्श 
कंचन सी काया की, आज भी याद आती है।                                        
                                                                                  
                                                      
                                                      तुम्हारी पायल की रुनझुन, ओ बिच्छियों की खनक                                                               कोयल सी मीठी आवाज की, आज भी याद आती है।       
                                                 
तुम्हारे मेहंदी लगे हाथ, ओ काजल लगे नैन  
लहराती जुल्फों की, आज भी  याद आती है।                        
                                                   
                                                            तुम्हारी प्यार भरी बातें ओ शोख भरी अदाऐं
                                                             हिरनी सी आँखों की, आज भी याद आती है।



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]





Tuesday, September 8, 2015

जिंदगी की कीमत

सन्मार्ग ७ सितम्बर,२०१५
पृष्ठ संख्या ८
भारवाहन-सवारी गाड़ी की
टक्कर, ६ मरे, ८ जख्मी

मामा के घर से दूध लेकर
लौट रहे युवक की ह्त्या,
पुरानी रंजिस को लेकर
महिला की ह्त्या

जौनपुर जेल में संघर्ष
३ लोग घायल,
यमुना एक्सप्रेस वे पर दुर्घटना
३ की मौत, ५ अन्य घायल

किशोरी से सामूहिक बलात्कार,
बेटी की बलि देने वाला
किसान गिरफ्तार

तालाब में नहाने गए
२ छात्र डूबे,
बदमाश ने सिपाही को
मारी गोली

अधिवक्ता ने की आत्महत्या,
ऑटोरिक्शा में ट्रक की टक्कर
२ महिलाओं समेत ४ मरे

पटना में युवक ने की आत्महत्या,
ट्रक नदी में गिरा चालक की मौत

ठाणे में दही हांडी उत्सव में
गिरने से मौत,
दो बहनों की जल कर मौत

टंकी में डूबने से २ सगे
भाइयों की मौत,
गोरखपुर में मस्तिस्क ज्वर से
३ बच्चों की मौत

चाय के गर्म घूंट के साथ
मैं सहजता से निगल लेता हूँ
इन खबरों को
मन ही मन खुश हो लेता हूँ कि
इन में मैं नहीं था

डूबने वाले लडके में
मेरा पप्पू नहीं था,
बलात्कार की शिकार
किशोरी मेरी बेटी नहीं थी

लेकिन
आखिर कब तक
हम सब लाचारगी और
बेबसी का जीवन जीते रहेंगे

किस दिन वक्त
भर सकेगा एक लम्बी सांस
एक सुन्दर संसार की कल्पना में।









Monday, September 7, 2015

आयशा का बचपन

कहाँ से सीखी इतनी बातें
कहाँ से लाई  यह सौगातें

बातें करती झटपट-झटपट
दौड़ी आती पटपट-पटपट

घंटी बजते ही गेट खोलती
दादा आए है सबको कहती

भरी शरारत आँखें मटकाती
मुझको तिरछी नजर दिखाती

कैसा देखो बचपन भैया
घर में नाचै ताता थैया।

Wednesday, September 2, 2015

वो आज सपनें में आई

जिसकी एक झलक पाने को            
मेरी आँखें तरस गई
उसके आते ही आँगन में       
प्रीत रेशमी बिखर गई 
वो आज सपनें में आई। 

मन के सुने अँधियारें में
उसने दीपक राग जलाई  
मधुर छुवन की मीठी यादें   
   उसने आकर के महकाई      
     वो आज सपनें में आई।  

   मन मयूर नाचा मेरा
     आँखें मेरी भर आई
   रात सुहानी कर दी उसने       
रजनीगंधा बन आई
    वो आज सपनें में आई। 

तारे डूबे एक-एक कर
      पूरब में लाली छाई 
फिर मिलने आउंगी तुमसे     
   वादा कर वो चली गई
वो आज सपने में आई। 

                                                                                                        

[ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]



Monday, August 31, 2015

रंग भरे जिन्दगी में

तुमसे बिछुड़ मेरी प्रीत टूट गई जिन्दगी से         
तुम आओ तो फिर से नेह जगे जिन्दगी में।    

पतझड़ का मौसम छा गया मेरी जिन्दगी में    
     तुम आओ तो फिर से बसंत खिले ज़िन्दगी में।            

 सम्भाल रखें हैं मैंने टूटी माला के मनके        
तुम आओ तो फिर से सजाए जिन्दगी में।                        

                                               मुझे हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या होगा
                                               अगर तुम्हारा  साथ नहीं मिले जिन्दगी में।         

  मुझे और कुछ नहीं चाहिए इस जिन्दगी में                                                                                                  
अगर तुम फिर से हमसफ़र बनो जिन्दगी में।            

    मेरी ये कविताए बंदनवार है प्रतीक्षा की       
   तुम आओ तो फिर से रंग भरे जिन्दगी में।  



                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]



Friday, August 21, 2015

एक पेड़ जरूर लगाना

घर चाहे जैसा भी बनाना
लेकिन उसमे एक कोना
दिल खोल कर हँसने के लिए
जरूर रखना

सूरज की रोशनी
और चाँद की चाँदनी
घर में झाँक सके उतनी
खिड़की खोल कर
जरूर रखना

रात को
चाँद सितारों का
नजारा देख सको उसके लिए
घर में एक खुली छत
जरूर रखना

सुख-दुःख में
दो बात कर सको उसके लिए
घर के बगल में एक पड़ोस
जरूर रखना

शाम को चिड़ियों की
चहचाहट सुन सको उसके लिए
घर के सामने एक पेड़
जरूर लगाना।

सुख गया नैनों का पानी

 ओ सावन के कारे मेघा,जाकर देना उसको पाती   
बेटे-बहुएँ याद कर रहे, याद कर रही पोती रानी।         

                         बच्चे दादी-दादी करते, बहता नयनों से पानी               
        अब उनको गोदी में लेकर ,कौन सुनाए रोज कहानी।      

मीठी-मीठी लौरी गाकर, पोती रोज सुलाया करती                                                                                           परियों की बातें बतलाती, बात नहीं है बहुत पुरानी।                                                                                                        
        दरवाजे पर गुड़ खाने को, आ जाती है धौली-काली         
             कहना उसको याद कर रही,अंगना की तुलसी रानी।             

शाम ढले मंदिर की घण्टी,प्रभु की महिमा जब गाती                                                                                          कहना उसको याद कर रही, घर की दीया ओ बाती।                                                                                                            
       मेरे सुख-दुःख की तुम,मत करना कोई भी बात     
             रोते-रोते सूख गया है, अब मेरे नयनों का पानी।         

 

 यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है ]

Thursday, August 20, 2015

अनुभूति

मेज के सामने बैठा
निस्पंद झांक रहा हूँ
मैं अतीत में

मेरे मानस पटल पर
उतरने लगी है
तुम्हारी यादें

उभरने लगी हैं तस्वीरें
बल्कि पूरा का पूरा
परिदृश्य

बालों को गर्दन के पीछे
समेटती तुम खड़ी हो
मेरे पास

तुम्हारे बदन की
संदली सुगंध
फ़ैल रही है कमरे में

अपनी गर्दन पर
महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी
साँसों का गुदगुदा स्पर्श

तुम पढ़ रही हो मेरी लिखी 
कविता की एक-एक पंक्ति
और कह रही हो 
वाह! वाह ! वाह !

सब कुछ
पहले जैसा ही 
स्मरण हो रहा है आज  

लेकिन मेरा बढ़ा हाथ
नहीं छू पा रहा है
तुम्हारा गात।




                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]







Wednesday, August 12, 2015

दही बड़े

दही बड़े भई दही बड़े
खाए उसको बड़े बड़े

सबसे पहले बड़ा बनाओ
उसके ऊपर दही लगाओ
इमली की चटनी बनवाओ
बड़े प्यार से उसे सजाओ

जब खाने को मन ललचाये
मुंह में जब पानी भर आये
लगा के लाइन हुओ खड़े
खाओ मिल कर छोटे बड़े

दही बड़े भई दही बड़े
खाए उसको बड़े बड़े।

Tuesday, August 11, 2015

तुम भी कहीं भीगती होगी

मेरे आस-पास
भीगी-भीगी है सुबह-शाम
बादल आज भी आए हैं
बरसाने पानी

पिछले तीन दिनों से
नहीं निकल रहा सूरज 
खिड़की पर हल्की धूप 
कभी-कभार
टपक पड़ती है भूल से 

शहर तो वैसा ही है 
पहले की तरह 
सड़के और गलियाँ
बन गई है ताल-तलैया
गाड़ियाँ रेंग रही है सडको पर 

भीगी हवाएं जब भी
तन से टकराती है
तुम्हारी कोमल छुअन की
मीठी यादें ताजा कर जाती है

गीली आँखों में
उमड़ पड़ते हैं यादों के बादल
मेरे आँखों के बादल से
तुम भी कहीं भीगती होगी।




                                             [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Friday, August 7, 2015

मन जब खोया रहता है

मन जब-जब खोया रहता है
चैत की चाँदनी सा सुख देती
तुम्हारी यादें

तन्हाईयाँ जब रुलाती है
जीवन का सम्बल बनती
तुम्हारी यादें

दुःख के बादल जब गहराते
दीप्त तारे सी चमकती
तुम्हारी यादें 

तन्हा दिल जब पुकारता
रात रानी सी गमकती  
तुम्हारी यादें

कितना कुछ जीता है मुझमें
अनमोल सौगातें हैं  
तुम्हारी यादें

लौट आओ एक बार
फिर उसी तरह
जिस तरह मुड़-मुड़ कर
लौट आती है तुम्हारी यादें।



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]










Friday, July 31, 2015

तुम्हारी यादें - हाइकु

यादें गरजे
सावन की घटा सी
आँखें बरसे।

यादों का पंछी
मन के पिंजरे में
फड़फड़ाए।

सावन झूमा
यादों ने गाठें खोली
तड़फे जिया।

पहली वर्षा
संग-संग भीगना
तुम्हारी यादें।

बिना रोए ही
बहे आँखों से आँसूं
तुम्हारी यादें।

दिल में बसी
आँसुओं में ढलती
तुम्हारी यादें।

छलक आती
पलकों से बदली
तुम्हारी यादें।

सहेज रखी
मन के अल्बम में
तुम्हारी यादें।


  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]


दिल के झरोखे में

आज अकेला
सुनी संध्या में
उदास मन को बहलाने
झांकने लगा तुम्हारी
अलमारी में

अचानक शादी की
पचासवीं वर्ष-गाँठ पर पहनी
तुम्हारी साड़ी
आ गयी मेरे हाथ में

साड़ी को छुआ
तो लगा जैसे तुम समाई हो
उसके रोम-रोम में

तुम्हारी देह की
संदिल गंध समा गई
मेरे पोर-पोर में

लगा जैसे अचानक
कहीं से आकर तुमने मुझे
भर लिया हो बाँहों में

मैं अपलक निहारता रहा
तुम्हारी साड़ी को
तुम्हारी कंचन काया की छवि
छाने लगी मेरी यादों में

चलचित्र की तरह
उस रंग भरी शाम की
तस्वीरें तिरने लगी मेरी आँखों में

आँखों से बहने लगे अश्रु
सारी उदासी बह गई
रह गया केवल तुम्हारा मेरा प्रेम
दिल के झरोखे में।


  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]






Saturday, July 25, 2015

मजा नहीं आता

जीवन के राहे -सफर में बिछुड़ गई हमसफ़र
भीगे नयनों से अब रास्ता भी नजर नहीं आता।        
       
                                                 
                                                        यूँ तो चमन में बहुत से फूल खिले हैं मगर              
                               मेरी चाहत का फूल अब नजर नहीं आता।                    

तुम से बिछुड़ कर दिल का सुकून खो दिया                                                                                                     लोग कहते हैं इस दर्द का मरहम नहीं आता।                                                                                                                                                                                                
          दिन ढलते ही जलने लगते हैं यादों के दीप
            अब तो रात में सुहाना सपना भी नहीं आता।
                     
    संसार  में भरे  पड़े हैं सुन्दर से सुन्दर नज़ारे                                                                                                    मगर तुम्हारा बांकापन अब नजर नहीं आता।                                                                                                          
                    जीवन में छा गए हैं तन्हाई और ग़मों के अँधेरे         
           सांसे चलती है मगर जीने का मजा नहीं आता।


[ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]

Friday, July 24, 2015

हेत हबोळा खावै जी (राजस्थानी कविता)

घाटा-पोटा बिरखा बरसै
बिजल्या चमकै जोर जी
खड़ी खेत में कामण भीजै
हिचक्यां आवै जोर जी।

हुळक-हुळक ने हिवड़ो रोवै
पीव बसै परदेशां जी
ऊँचा मंगरा जाय उडिकै
मेड़या काग उड़ावै जी।

झुमझुम कर झोला खावै
खेत खड्यो हरियाळो जी
उन्याळा में तपे तावड़ो
तनड़ो पड़ग्यो कालो जी।

सावण तीज सुहाणी आई
पिवजी घरां पधारया जी
घूँघट माइं मुळक कामण
हेत हबोळा खावै जी ।




Thursday, July 23, 2015

अब कहूँ तो भी क्या ?

जीवन के सफर में हम दोनों संग-संग चले                                  
तुम चली गई छोड़ कर, अब कहूँ तो भी क्या ?       

           तुम तो अब आओगी नहीं मेरे संग में हँसने       
       मैं हँस कर जमाने को दिखाऊँ, तो भी क्या  ?

ढलती उम्र में बेसहारा कर चली गई तुम                                                                                                         
बिखर गए सारे अरमान, कहूँ तो भी क्या ?

      अश्क आँखों से ढलते रहते हैं दिन-रात
       बिखर गई जिंदगी, अब कहूँ तो भी क्या ?

मेरा बहारों भरा गुलसन वीरान हो गया   
आँखों से बरसता है सावन, कहूँ तो भी क्या ?            

मैं प्रतीक्षा करता रहा तुम्हारे लौट आने की
 तुम नहीं आई लौट कर,अब कहूँ तो भी क्या ?


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Tuesday, July 21, 2015

पहले वाली बात नहीं

 सब कुछ है पर तुम नहीं 
जीवन में सुख चैन नही
दिन कटता रीता-रीता 
सपनों वाली रात नहीं।

ठाट-बाट छूटा जीवन से 
 होठों पर मुस्कान नहीं
जीवन की सुध-बुध भुला  
काया का भी साथ नहीं।

आँखों में हैं रात गुजरती
 प्यार भरे दिन रहे नहीं 
जीवन फिर से हरा बने
अब ऐसी बरसात नहीं।

मौजो के दिन बीत गए
सुख के सागर रहे नहीं
 दर्द भरा है मेरा जीवन 
  पहले वाली बात नहीं।




                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]





Monday, July 13, 2015

एक बार फिर से

रिमझिम फुहारों में
मन भीगना चाहता है
तुम्हारे संग-संग
एक बार फिर से

धरती की उठती महक में
मन भरना चाहता है
तुम्हें अपनी बाहों में
एक बार फिर से

भीगी घास पर
मन दौड़ना चाहता है
तुम्हारे संग-संग
एक बार फिर से

सावन की बरखा में
मन झूमना चाहता है
तुम्हारे संग-संग
एक बार फिर से

बसंती बहारों में
मन खेलना चाहता है
होली तुम्हारे संग-संग
एक बार फिर से

मेरे प्यार की पनाहों में
हो सके तो लौट आओ
एक बार फिर से।



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Thursday, July 9, 2015

भैया मुझको पढ़ना है

भैया मुझको पढ़ना है
ए.बी.सी.डी लिखना है
रोज सवेरे साथ तुम्हारे
मुझको स्कूल जाना है।

कॉपी,पेंसिल लाकर दो
मुझको भी तो लिखना है
टिफिन बॉक्स तैयार करो
लंच साथ ले जाना है

इंटरवेल में खाना मुझको
साथ तुम्हारे  खाना है
छुट्टी की घंटी बजने पर
वापिस घर को आना है।



 

Friday, July 3, 2015

धौरां वाला देश (राजस्थानी कविता)

सावण लाग्यो भादवो जी
कोई बरसण लाग्यो मेह
खेता बोल मोरिया
कोई चौमासा रो नेह
चालो सगळा सागै चाला
मरुधर वाला देश
भाई भतीजा सागै लेकर
धौरां वाला देश।

बाजरी री नूंवी कूंपळा
गीत मिलण रा गावै
आपाने आयोड़ा देख
हिवड़ै हरख मनावै
चालो सगळा सागै चाला
मरुधर वाला देश
बहु-बेटियाँ सागै लेकर
धौरां वाला देश।

हनुमान जी रा दरसण करस्यां
सालासर में जाय
श्याम धणी ने घणौ मनास्यां
जाकर खाटू मांय
चालो सगळा सागै चाला
मरुधर वाला देश
कुटुम्ब-कबीलो सागै लेकर
धौरां वाला देश।

झुंझुनू में रानी सती के
जाकर धौक लगास्यां
डूंगर वाला बालाजी के
दाल-चुरमो खास्यां
चालो सगळा सागै चाला
मरुधर वाला देश
बेन-भाणज्या सागै लेकर
धौंरा वाला देश।









Wednesday, July 1, 2015

जीवन में हमसफ़र चाहिए

 बिन हमदम के जीवन सूना 
 मुस्किल है बिन साथी जीना 
 जैसे मछली को नीर चाहिए 
  जीवन में हमसफ़र चाहिए। 

                                   दोनों का है सम्बन्ध सलोना    
                                    एक दूजे  बिन जीवन सूना  
जैसे मोती को चमक चाहिए                                                        
     जीवन में हमसफ़र चाहिए।                                                         

 दुःख-सुख दोनों साथ निभाते    
  हँस-हँस कर के जीवन जीते   
     जैसे सागर को तट चाहिए   
    जीवन में हमसफ़र चाहिए।  
           
संग सफर से जीवन महके                                                     
         पतझड़ में भी सावन चहके                                                              
         जैसे रजनी को चाँद चाहिए                                                              
          जीवन में हमसफ़र चाहिए।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]                                                           
 




Tuesday, June 30, 2015

मन की पीर

तुम जीवन के
राहे -सफर में मुझे
अकेला छोड़ कर चली गई

तुमने यह भी नहीं सोचा कि
कल सुबह कौन पिलाएगा मुझे
अदरक वाली चाय

कौन बनाएगा मेरे लिए
केर-सांगरी का साग और
मीठी आंच पर रोटी

कौन खिलायेगा 
दुपहर में चाय के साथ
मीठी-मीठी केक और पेस्ट्री

कौन घुमायेगा
मेरे बालों में अपनी
नरम-नरम अंगुलियाँ

कौन फंसेगा
मेरे संग जीवन की
शतरंजी चालों में

बिना तुम्हारे 
कैसे पूरी कर पाउँगा 
जीवन की अधूरी कविता को 

कैसे भूल पाउँगा
तुम्हारे संग देखे
जीवन के ख़्वाबों को। 


                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Saturday, June 27, 2015

अपनी विरासत

गाँवों में लोग आज भी
देते है सूर्य को अर्द्ध और
सिंचते हैं तुलसी को जल

आज भी वहाँ पड़ते हैं
सावन के झूले और
गूंजते हैं कजरी के बोल

औरते रखती है चौथ का
व्रत और करती है
निर्जला एकादसी

भोरा न भोर उठ
करती है ठन्डे पानी से स्नान
रखती है व्रत कार्तिक मासी

दिवाली में गोबर से
निपती घर,हिरमच गेरू से
मांडती है रंगोली

होली में बच्चे-बुड्ढे
हो जाते एक और लगा रंग
खेलते होली

कुत्ते को कौर,गाय को रोटी
आए भिखारी को ठंडी बासी
नहीं जाने देते किसी को खाली हाथ

गांव आज भी
संजोए हुए हैं अपनी विरासत
बटाते हैं दुःख सुख में एक दूजे का हाथ।









 

Thursday, June 25, 2015

मानसून

कलकत्ते में
मानसून आ गया
सुबह से लगातार वर्षा
हो रही है

वर्षात में अकेले
कुछ करने का मन
नहीं कर रहा

सोचता हूँ
कमरें में बैठ कर
खिड़की से टपकती
बूंदों का अहसास करूँ

अलमारी से
एलबम निकालूँ
तुम्हारे चित्रों को देखूँ
और तुम्हे प्यार करूँ।





Friday, June 19, 2015

तुम अगर आओ तो

तुम अगर आओ तो
आज भीगने चले
बारीश की बौछारों में

तुम अगर आओ तो
आज संग-संग दौड़े
हँसती हरियाली में

तुम अगर आओ तो
आज बाग में घूमने चले
भौंरों के गुंजारों में

तुम अगर आओ तो
आज प्यार बरसाए
चमकती चांदनी में

तुम अगर आओ तो
आज मिलन गीत गाऐं
बासंती हवाओं में

तुम अगर आओ तो
आज झूलों पर झूले
सावन की बहारों में। 


  [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]


Tuesday, June 16, 2015

आज भी बसी हो मेरी यादों में

कौन कहता है
कि तुम चली गई
तुम तो आज भी बसी हो
मेरी यादों में

मेरी साँसों में
मेरे दिल में और
अब तो तुम आने लगी हो
मेरी बातों में

दो साल से
तुम्ही तो छाई हुई हो
मेरी कविताओं में

अगले जन्म में
तुम फिर मिलना
मुहब्बत का फूल लिए
हाथों में

मेरे जैसा दीवाना
भला कहाँ मिलेगा तुम्हें
इस बेगानी दुनियां में।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]




मैं क्या करूँ।

जब तक तुम साथ थी दिल में अरमान थे
बिना तुम्हारे जीवन उजड़ गया मैं क्या करूँ

जीवन में कौन किसी का दर्द बाँटने बैठता है
सुख-दुःख जीवन में आते जाते है मैं क्या करूँ।

तुम्हारी हर अदा पर मुस्करानें की आदत थी
अब उन यादों में दिल रोता है मैं क्या करूँ।

समय की धूल आंधी की तरह उड़ जाती है
अब नहीं दीखता तम्हारा चेहरा मैं क्या करूँ।


बिना तुम्हारे मैं कैसे जीवन नैया पार करूँ 

किसी किताब में नहीं लिखा मैं क्या करूँ।




Monday, June 15, 2015

मोहब्बत की डोर

जैसे हवा
रहती है हर जगह
वैसे ही अब तुम रहती हो

हवा दिखाई नहीं देती
लेकिन अपने होने का
अहसास करा देती है

कभी दरवाजे को
हल्का सा थपथपा कर
तो कभी पेड़ की पत्तियों को
धीरे से सरसरा कर

तुम भी हवा की तरह
थिरकती रहती हो
मेरे चहुँ ओर

कभी निकल जाती हो
बगल से छू कर
तो कभी बिखर जाती  हो
खुशबू बन कर

दिल खिल जाता है
हो जाता है दिप-दिप
लगता है झूमने
तुम्हारी खुशबू में डूब कर

सन्दली हवाओं के
धागों से आज भी बंधी है
हमारी मोहब्बत की डोर।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]















Friday, June 12, 2015

प्यार भरे पैगामों में

एक दिन तुमने कहा था--
मुहब्बत कब मरी है,
वह तो मरने के बाद भी
अमर रही है

सदियाँ गुजर गई
लेकिन ताजमहल में
मोहब्बत आज भी ज़िंदा है
हीर-रांझा, लैला-मजनू का प्यार
दुनियाँ में आज भी अमर है

आज जब भी
मैं तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ
मुझे सर्दियों की गुनगुनी धूप सा
दिल में अहसास होता है

मैं खो जाता हूँ
तुम्हारे गुलाबी नरम सपनों में
रुबरु कराती है तुम्हारी यादें
जैसे तुम बसी हो मेरे दिल में

तुम आज भी जीवित हो
मेरे मन के किसी अदृश्य कोने में
सितारों पर लिखे प्यार भरे पैगामों में

तुमने ठीक ही कहा था
मोहब्बत कब मरी है
वह तो मरने के बाद भी
सदा अमर रही है।




                                                 [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]














Wednesday, June 10, 2015

लुक मिंचणी रो खेल (राजस्थानी कविता)

जिंदगानी रै मेळै में
थूं मांड राख्यो है म्हारै सागै
लुक मिंचणी रो खेल

जुगां जुगां स्यूं
आज तांई थूं खेलती आई
म्हारै सागै बाळपणै रो खेल

आज तांई थूं लुकै
अर म्हैं थनै बावळा दांई
ढूंढतो रेवूं

पण थूं फेर कौनी मिलै
म्हैं थनै आखी जिंदगानी
ढूंढतो रेवूं

थूं खेल-खेल में
सारो माँड्योड़ो खेल
छोड़ ज्यावै

म्हैं देखतो रै ज्याऊं
अर थूं चाणचक फुर्र स्यु
उड़ ज्यावै

थूं कद तांई खैलेली
म्हारी जिंदगानी में
ओ खेल

कद तांई म्हैं
थनै ढुंढतो रेवूंळा
अर खेळतो रेवूंला खेल।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]


Monday, June 8, 2015

आयशा का धमाल

राजा से ल्याई हाथी घोड़े
रानी ने चूमा मेरा गाल
हीरों का मुकुट पहनाया
मैंने रखा उसे संभाल।

चन्दा से ल्याई दूध मलाई
परियों से ल्याई प्यारी चाल
इंद्र धनुष का हार बनाया
मैनें रखा उसे संभाल।

सागर से चुन मोती ल्याई
मछली से मैंने पूछा हाल
सबका प्यार मुझे मिला
मैंने रखा उसे संभाल।


Saturday, May 30, 2015

म्हारी काळजा री कौर कठै गई (राजस्थानी कविता )

आभा उड़ती कुरजा सागै
तू भेजती संदेशो
काळजै री कोरां मांय थारै
झबकती ओळूं'री बिजलियाँ
वा मोत्यां मूंघी मूळक कठै गई 
म्हारी काळजा री कौर कठै गई। 


मेड़ी चढ़ हरख अर उमाव सूं उडीकती
दरवाजै री औट स्यूं गैळ मांय झाँकती
म्हनै देख'र हरख पळकतो
थारै हाथा री चूड़ियाँ री झणकार में
वा हरख-उमाव आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई।


डागळा सूं तू उड़ावंती काला काग
हैत भरिया हीयै स्यूं गांवती अमीणा गीत
आखी रैंण करती हर'रा बिड़द बखाण 
दीवळा रै च्यानण लिखती हैत'रा संदेसा
वा हैत-प्रीत री डोर आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]






देखो कैसा भूकम्प आ गया

अंदर में चट्टाने खिसक गई
धरती ऊपर तक थरथरा गई
हजारों को ज़िंदा दफना दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

ऐतिहासिक  धरोहरें ढह गई
अट्टालिकाएं चुर - चूर हो गई
घरों को मिट्टी में मिला दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

विनाश का चक्र घूम गया
हजारों को कंगाल बना गया
हर कोई स्तब्ध रह गया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

प्रकृति का गुस्सा बोल रहा
पर्यावरण बचाओ कह रहा
रुस्ट है धरा यह बता दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।







Monday, May 11, 2015

कुछ अनकही ....


गुलमोहर की छाँव तले
मैं आज लिखने बैठा
   कुछ अनकही .... 

चमकते जुगनू
दिखाते रहे प्रेम-भाव 
       लिखने कुछ अनकही .... 

चाँद की चाँदनी 
छिटकती रही रात भर 
      लिखते कुछ अनकही .... 

नन्हें सितारे 
बिखेरते रहे दूधिया रोशनी 
          लिखने कुछ अनकही ....     

समूची कायनात 
 दे रही थी साथ
             लिखने कुछ अनकही ....    

मैं हथेली पर
नाम लिखता रहा
बातें याद करता रहा
   जो रह गई कुछ अनकही ...

















Thursday, May 7, 2015

तुम से फिर मिलूंगा

तुम्हारे महाप्रयाण को देख
आँखों से अश्रुओं की
सरिता बहने लगी

साँसें अंदर से
लम्बी और गहरी
निकलने लगी

मैं तुम्हारे मुखमंडल को
दोनों हाथों से सहलाने लगा
काश! तुम कुछ बोलो

अपनी अंतिम बेला में
दो शब्द कहने के लिए
काश ! तुम अपना मुँह खोलो

लेकिन तुम तो
अलविदा की बेला में भी
निस्पृह थी

गर्व से ऊँचा मस्तक
शान्ती से मुंदी आँखें
त्याग की प्रतिमूर्ति
लग रही थी

लेकिन सुकून था मेरे दिल में
कि एक दिन मैं तुम से
फिर मिलूंगा

पता नहीं कहाँ और किस तरह
पर तुम से जरूर मिलूंगा
उस पराजगत में ही सही
लेकिन मिलूंगा।


                                                     [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Tuesday, May 5, 2015

शर्मशार हो रही है मानवता

अफगानिस्तान  के
सुदूर पहाड़ी इलाको में
अमरीकी द्रोण बरपा रहें हैं कहर

आकाश की तरफ देखते हुए
अपने खण्डर बने घर में
आँचल में छिपाए बच्चे की माँ
सोचती है काश भगवान ही
उसकी कोई मदद कर देता

पर यहाँ तो आकाश से ही
आग बरस रही है
चारों ओर सुनाई दे रहा है
आहतो का क्रन्दन
बिखरे पड़े है क्षत- वीक्षत
शरीरों के लोथड़े

कोई नहीं बचा है बाकी
जलते घरों और
सड़ती लाशों के बीच
शर्मशार हो रही है मानवता।







Monday, May 4, 2015

जीवन के सुख-चैन चले गए

जीना तो अब केवल एक मज़बूरी रह गई                           
प्यार भरे दिन तो तुम्हारे संग ही चले गए।                                            

                                                             जीवन के उपवन में अब कोई बहार नहीं रही
                                                             मोहब्बतें - इजहार तो तुम्हारे संग ही चले गए।

बेपनाह बातें और मुलाकाते, यादें बन रह गई 
रूप,रस,गंध,स्पर्श तो तुम्हारे संग ही चले गए। 
      
                                                            अब तो केवल यादों के संग गुजर रही है जिंदगी 
                                                             चापल्य और उन्माद तो तुम्हारे संग ही चले गए।   
                                                                                            
अब तो रातों में सुख की नींद भी नहीं आती
सुनहरे ख्वाब तो सारे तुम्हारे संग ही चले गए। 

                                                                  
                                              तन्हाई के दर्द को सहने  मैं अकेला रह गया                      
                                                             जीवन के सुख -चैन तो तुम्हारे संग ही चले गए।      
 

[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]