Friday, July 31, 2015

तुम्हारा मेरा प्रेम

आज अकेला
सुनी संध्या में
उदास मन को बहलाने
खोल बैठा तुम्हारी अलमारी

अचानक शादी की
पचासवीं वर्ष-गाँठ पर पहनी
तुम्हारी साड़ी
मेरे हाथ में आ गयी

साड़ी को छुआ
तो यूं लगा जैसे तुम उसके
रोम-रोम में समाई हुई हो

तुम्हारी देह की
संदिल गंध समा गई
मेरे पोर-पोर में

यूं लगा जैसे अचानक
कहीं से आकर तुमने मुझे
बाँहों में भर लिया हो

मैं अपलक निहारता रहा
तुम्हारी साड़ी को
तुम्हारी कंचन काया की छवि
छाने लगी मेरी आँखों में

चलचित्र की तरह
मन में तिरने लगी तस्वीरें
उस रंग भरी शाम की

सधन हो गया प्रेम
आँखों से बह निकले आँसूं
सारी उदासी बह गई
रह गया केवल तुम्हारा मेरा प्रेम।





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