प्यार के लिए सात समुद्र पार
कभी कभी महँगा पड़ जाता है
एक का सानिध्य पाने के लिए
देश-परिवार सभी छूट जाता है
जवानी तो जोश में बीत जाती है
लेकिन बुढ़ापा भारी पड़ जाता है
अपनो की यादे सताने लगती है
एकाकीपन भारी लगने लगता
घुट कर उमर बीत जाती है
एक जीवन अपनो के बिना
छोटी आकांक्षायें भी रह जाती है
मन में किसी के साथ बाँटे बिना
उम्र भर तड़पते ही रह जाते है
पाने के लिए अपनो का प्यार
विदेशी धरती पर नहीं मिलता
अपनी धरती का सच्चा प्यार
जब यादों की गांठे खुलती है
गली दोस्तो की यादें आती है
दिल में सिर्फ यादे ही बची रहती है
जिन्दगी घिसे सिक्के सी लगती है।
(पिट्टसबर्ग,अमेरिका में एक वृद्ध दम्पती से मिल कर, मुझे जो कुछ अनुभव हुवा,उसी को मैंने शब्द दिए हैं )
[ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]