Wednesday, March 18, 2015

विरह ही है प्रेम का अनन्त

जब तक तुम साथ थी
मेरी हर शाम
खुशबुओं से नहाई होती थी 

कहकहों और
मुस्कराहटों के बीच
चाय की चुस्कियाँ चलती थी 

लेकिन आज
तुम्हारी यादों के चंद सिक्के
कुल जमा पूँजी रह गई है मेरे पास 

जैसे ही शाम फैलाती है
क्षितिज पर मटमैली चादर
मेरे मन पर छाने लगती है निराशा

धुँधलका खिड़की से झाँक 
चटकाने लगता है 
विरह के दर्द की कली-कली

खामोश रात में
बंद पलकों से तलासता हूँ
अतीत की धुंध में तुम्हारी यादें 

करता हूँ प्रयास
तुम्हारी यादों के संग 
रम जाने का

दूर खिड़की में
टिमटिमाती रोशनी देख
सोचता हूँ शायद विरह ही है
प्रेम का अनन्त।


[ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Friday, March 13, 2015

घूँघट की आड़ में




घूँघट की आड़ में
तुम्हारा मुस्कराना
बारिश के मौसम में
छत पर भीगना
तुम्हारी यादें

गुदगुदाती रातों में 
शरारत भरी मुस्कराहटें 
पायल वाले पांवों की
खनकती आहटें
तुम्हारी यादें

चंचल चितवन की 
शोखभरी अदाएं
मखमली पलकों पर
बिखरी-बिखरी जुल्फें
तुम्हारी यादें

शबनम से होंठ
झील सी गहरी आँखें
फूल सी मुस्कराहट
नाज़नीन से अंदाज
तुम्हारी यादें

दिन और महीने बीत गए
लेकिन नहीं मानता हिया
आज भी समेटता रहता है
बिखरी फ़िज़ाओं से
तुम्हारी यादें।  



                                                    [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]

Wednesday, March 4, 2015

मुझे तुम याद आई

 सतरंगी बौछारें लेकर, रंगीली होली आई 
बासंती वसुंधरा देख,  मुझे तुम याद आई।

                                                      रंग, अबीर और गुलाल, उड़ाती होली आई 
                                                     होली के रंग -चंग देख, मुझे तुम याद आई।                                         

प्रेम रंग की भर पिचकारी, लेकर होली आई
कोयल की मल्हार सुन, मुझे  तुम याद आई।
        

                                                       हूरियारों की टोली, जब रंग ले कर आई
                                                       हाथों में गुलाल देख, मुझे तुम याद आई।

राग-रंग और चुहलबाजी, लेकर होली आई 
फिजा में  बिखरे रंग देख, मुझे तुम याद आई।

                                                    सात  रंग और सात स्वर,  लेकर होली आई
                                                   रंग भरी पिचकारी देख, मुझे तुम याद आई।


 [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]





Monday, March 2, 2015

जिंदगी को जी लिया था

आठ महीने हो गए तुमसे बिछुड़े हुए                                                                                                               नहीं लगता कि इस जीवन में
तुम से फिर कभी मिल सकूँगा 

कितनी हसीन थी हमारी जिंदगी
रिमझिम बरसता सावन  
रंग-गंध वाला बसंत
फूलों वाली चैती हवाए
कितना कुछ जीया हमने साथ-साथ 

चाँदी सी मोहक अदाएं
चन्दन सा आकर्षण
दीप सी दमकती आभा
कोयल सी आवाज
कितना कुछ था तुम्हारे पास मुझे देने

तुम मेरे लिए ईश्वर के किसी
आशीर्वाद से कम नहीं थी
जिन्ह लम्हों में तुम मेरे साथ थी
मैंने तो उसी में जिंदगी को जी लिया था



                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]

कोलकाता
६ मार्च, २०१५











Sunday, March 1, 2015

बच्चे नहीं खेलते खिलौनों से

बच्चों को आजकल हम
खिलौनों से नहीं खिलाते
और न उन्हें गुड्डा-गुड्डी से
खेलना सिखाते

दबा देते हैं हम
बस्तों के बोझ तले
उनके मासूम बचपन को
किलकारियां और किल्लोले
भेंट हो जाती है स्कूलों को

खिलने से पहले ही
मुरझा जाता है बचपन
बसंत में भी पतझड़ सा
लगने लगता है बचपन

दिन-रात पढनी पड़ती है 
कोर्स की किताबें  
चाट जानी पड़ती है 
दीमकों की तरह किताबें 

बचपन बित जाता है 
रटते हुए किताबों को 
वो नहीं देख पाता 
बचपन के विहानों को।