Sunday, March 1, 2015

बच्चे नहीं खेलते खिलौनों से

बच्चों को आजकल हम
खिलौनों से नहीं खिलाते
और न उन्हें गुड्डा-गुड्डी से
खेलना सिखाते

दबा देते हैं हम
बस्तों के बोझ तले
उनके मासूम बचपन को
किलकारियां और किल्लोले
भेंट हो जाती है स्कूलों को

खिलने से पहले ही
मुरझा जाता है बचपन
बसंत में भी पतझड़ सा
लगने लगता है बचपन

दिन-रात पढनी पड़ती है 
कोर्स की किताबें  
चाट जानी पड़ती है 
दीमकों की तरह किताबें 

बचपन बित जाता है 
रटते हुए किताबों को 
वो नहीं देख पाता 
बचपन के विहानों को। 













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