Monday, August 30, 2010

अभिलाषा




आईने में अपना
चेहरा तो सभी देखते हैं,
लेकिन मै जब आईना देखूँ और
चेहरा तुम्हारा साथ दिखे तो जानूँ। 


मयखाने में जाकर
मदहोश तो सभी होते हैं,
तुम मेरी अधखुली आँखों  में
 मदहोश होकर दिखाओ तो जानूँ। 


चमन में
  खिलती कली पर तो
 सभी नग्मे गुनगुनाते हैं,
तुम मेरे नाजुक लबों पर कोई गीत
लिख कर गुनगुनाओ तो जानूँ। 


गुलशन  में खुशबू
तो सभी फूल बिखेरते हैं,
तुम मेरी जिन्दगी में प्यार की  
खुशबू  बिखेर कर दिखावो तो जानूँ  |


दिन के उजाले में
तो सभी साथ चलते हैं,
अंधकार में दीप जलाकर तुम
मेरे साथ चल कर दिखावो तो जानूँ। 

यौवन तो चढ़ता सूरज है
ढलती उम्र में जब तम छाये और
तुम पूनम का चाँद बन कर
आओ तो जानूँ।

कोलकाता
३० अगस्त, २०१०  

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Saturday, August 28, 2010

बुढापा का स्वागत करो I

उम्र अब  ढलने  लगी
दस्तक बुढ़ापा देने लगा 
बीते  समय को भूल कर
                     तुम वक्त से समझौता करो
                          बुढापे का स्वागत  करो।                                                    

हुक्म चलाना छोड कर
हुक्म मानना सीखो अब
बच्चे जो  कुछ  करना चाहे
                        तुम उनकी हाँ में  हाँ करो
                           बुढापे का स्वागत  करो।

रुख समय का देख कर
अपने आप को बदलो अब 
शांत भाव से रहना सीखो
                                 गुस्सा करना बंद करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।

सब्जी गले या बिजली जले
दूध जले या पंखा चले
होने दो जो कुछ होता है
                                टोका  - टोकी   बंद करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।


कौन सुनेगा कहा तुम्हारा
किसके पास समय है अब
प्रभु सेवा में  मन लगाकर
                                चुप रहना स्वीकार करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।



कोलकत्ता
२८  अगस्त, २०१० 
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )



Tuesday, August 24, 2010

जुदाई




दूर तक साथ चलना था
राहे - सफ़र में हमें,
पल भर भी दूर रहना 
गँवारा नहीं था हमें। 

लगता था एक- दूजे के लिए
ही बने थे हम,
आज वो सारे कसमें -वादे
भूल गये हम।

सौ जन्मों तक साथ निभाने
का वादा किया था हमने,
अपने घर को स्वर्ग बनाने का
 सोचा था हमने।

कल्पना के गुलसन में अनेक
फूल  खिलाये थे हमने,
आज मधुमास को पतझड़ में
बदल लिया हमने। 

 अपनी ही बातो पर
रोज अड़ते रहे हम,
एक दूसरे की बातो  को
रोज काटते रहे हम।

 अपने-अपने स्वाभिमान
को रोज टकराते रहे हम,
एक दूसरे के दिल में
नहीं रह सके हम। 

छोटी - छोटी  बातो  ने
जुदा कर दिया हमको,
मन इतने बदल जायेंगे
मालूम नहीं था हमको।

कभी अपने ही रास्ते पर
फूल बिछाये थे हमने,
आज उसी चमन में
काँटे बिछा लिए हमने।

  खंजर से नहीं बातो से ही  
दिल  टूटे गए  थे  हमारे,
जीवन   के  सारे ख्वाब
चकनाचूर हो गये थे हमारे।

 नहीं संभव अब हम  फिर
इस जीवन में साथ रहेंगे,
एक आसमा के नीचे रह कर 
भी हम अंजान  बन रहेंगे।

कोलकाता
२४  अगस्त, २०१०
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Thursday, August 5, 2010

दोस्ती



        माँ की ममता सी होती  है दोस्ती                   
              भाई के सहारे सी होती है दोस्ती,
बहन के प्यार सी होता  है दोस्ती         
                लाजबाब रिश्ता होता है दोस्ती  |

सागर से भी गहरी होती है दोस्ती          .
            जल से  भी शीतल होती है  दोस्ती
    फूलों से भी कोमल होती है दोस्ती               
               हवाओं का संगीत होती है दोस्ती |

     कड़ी धूप में तरुवर होती  है दोस्ती             
             मरुभूमि में निर्झर होती है दोस्ती
चाँद की  चाँदनी होती  है दोस्ती             
               उजाले कि किरण होती है दोस्ती  |

अरमानों  का आइना होती है दोस्ती           
           जीने का एक अंदाज होती है दोस्ती
     उदास चहरे की मुस्कान होती है दोस्ती           
        जीवन का सहारा होती है दोस्ती |



कोलकत्ता
५ अगस्त, २०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )