Friday, February 26, 2016

तुमने कहा था

एक बार
तुमने मुझ से कहा था-
जब मैं चिर निंद्रा में लीन हो जाँउ
तो तुम यह मत सोचना कि
मैं तुमसे दूर चली जाऊँगी।

मुझे पाने के लिए
तुम आसमान की तरफ मत ताकना
अपने दिल के भीतर झाँकना
मैं तुम्हें वहीं मिल जाऊँगी
मैं कहीं भी चली जाऊँ
तुम्हारे दिल में सदा
बसी रहूँगी।

आज तन्हाई की बेला में
जब मैंने तुम्हें याद किया
आँखे बंद करते ही
मैंने तुम्हें अपने दिल में बैठे पाया
क्योंकि तुमने कहा था-
मैं तुम्हारे दिल में सदा
बसी रहूँगी।






Friday, February 12, 2016

जिंदगी को हँस कर जीना सीखो

जिंदगी को हँस कर जीना सीखो
दुःखियों को गले लगाना सीखो
यदि जीवन सुख से जीना है तो
जीवन को सत्कर्म में लगाना सीखो

मन प्रभु में समर्पित करना सीखो
परोपकार का जीवन जीना सीखो
यदि जीवन को सफल बनाना है तो
हर धर्म का आदर करना सीखो।

ईर्ष्या,द्वेष,घृणा को मिटाना सीखो
मन में करुणा भाव जगाना सीखो
यदि धरा को स्वर्ग बनाना है तो
आपस में मिल-झूल रहना सीखो

नदियों को स्वच्छ रखना सीखो
पेड़ों-वनस्पतियों को बचाना सीखो
यदि स्वस्थ-निरोग रहना है तो 
पर्यावरण को संरक्षण देना सीखो।  




Thursday, February 11, 2016

मेरे जीवन का बसंत

जब तक
तुम साथ थी
बसंत आने पर
फूल ही नहीं खिलते थे
खिल जाते थे हमारे दिल भी

गुनगुनाती थी साँसें
मचलते थे नयन
छा जाती थी मादकता
बसंती बयार कर देती थी
हमारे दिलों को सरोबोर
अपनी महक से

बहती तोआज भी है
बसंती बयार
ले आती है मादकता भी
किसी न किसी अमराई से
करा देती है बसंत के
आगमन का आभास

लद जाता है
पलाश भी फूलों से
झरने लगती है मंजरी
भी आम्र कुंजों में
ओढ़ लेती है धरा भी
धानी चुनर सरसों से

लेकिन मेरे जीवन के बसंत पर
अब कोहरा छा गया
धुंध की चादर ने ढक दिया
मदनोत्सव को
सदा-सदा के लिए

सब कुछ जीवन का
चला गया तुम्हारे संग
रह गया केवल पतझड़
जीवन के संग।






Tuesday, February 9, 2016

अब के बिछुड़े फिर न मिलेंगे

लहर सरीखा घुलना-मिलना,अपना रहता था
हवा सरीखा बहते रहना,अपना जीवन था
पलक झपकते छलिया सी,तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने
बिच राह ऐसे बिछुड़ेंगे
यह नहीं सोचा था मैंने। 

बार-बार मिलना जैसे,उत्सव लगता था
मीठे-मीठे बोल तुम्हारे,अमृत लगता था
गाते-गाते जीवन गीत, तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने   
  फासले ऐसे भी होंगे
यह नहीं सोचा था मैंने। 

भोला-भोला रूप तुम्हारा,परियों से भी प्यारा था
नथ-चूड़ी और पायल से,खनकता आँगन सारा था
जाने कैसी हवा चली, तुम तो चली गई

ऐसा नहीं चाहा था मैंने   
मुस्कानें मुझसे रूठेगी
 यह नहीं सोचा था मैंने।  

साँसों का निश्वास तुम्हारा, चन्दन जूही सुवास था
आँखों में खिलता रहता, प्यार भरा मधुमास था
मुस्कानें हो गई पराई, तुम जो चली गई 

ऐसा नहीं चाहा था मैंने 
अब के बिछुड़े फिर न मिलेंगे        
यह नहीं सोचा था मैंने।





लहर सरीखा घुलना-मिलना, अपना रहता था
हवा सरीखा बहते रहना, अपना जीवन था
पलक झपकते छलिया सी, तुम तो चली गई
ऐसा नहीं चाहा था मैंने
राहे-सफर में ऐसे बिछुड़ेंगे
यह नहीं सोचा था मैंने

बार-बार मिलना तुमसे, उत्सव लगता था
मीठे-मीठे बोल तुम्हारे, अमृत लगता था
गाते-गाते जीवन गीत, तुम तो चली गई
ऐसा नहीं चाहा था मैंने
फासले ऐसे भी होंगे
यह नहीं सोचा था मैंने

भोला-भोला रूप तुम्हारा, परियों से भी प्यारा था
नथ-चूड़ी और पायल से,खनकता सारा आँगन था
जाने कैसी हवा चली, तुम तो चली गई
ऐसा नहीं चाहा था मैंने
मुस्कानें मुझसे रूठेगी
यह नहीं सोचा था मैंने

साँसों का निश्वास तुम्हारा, चन्दन जूही सुवास था
आँखों का आकाश घोलता, रंगों का मधुमास था
मुस्कानें हो गई पराई, तुम जो चली गई 
ऐसा नहीं चाहा था मैंने 
अब के बिछुड़े फिर न मिलेंगे
यह नहीं सोचा था मैंने। 









Saturday, February 6, 2016

बच्चे खो रहें हैं बचपन

बच्चे खो रहें हैं अपना बचपन
अब वो नहीं खेलने जाते
मैदानों में, पार्कों में, गलियों में,

अब वो देखने नहीं जाते
दशहरे, नागपंचमी, गणगौर
के मेले में

अब वो नहीं खेलते
गिल्ली डंडा, खोखो या कबड्डी
आपस में मिल-झूल कर

अब वो नहीं सुनते
नानी-दादी से किस्से-कहानियाँ
उनके पास बैठ कर

वो उलझ गए हैं
हंगामा, पोगो और टैलेंट हंट
के मायाजाल में

सिमट गया है उनका बचपन
टैब, मोबाइल और कम्प्यूटर
की स्क्रीन में

हरे-भरे मैदानों में दौड़ते
बच्चों को देखना लगता है अब
सपना ही रह जाएगा

तितलियों के पीछे दौड़ता
बचपन देखना लगता है अब
बीते जमाने की बात रह जाएगा।