गांव में था
पहचान थी
सदा नाम से
जाना जाता मैं
गांव से निकला
बह गया धारा में
धारा से नदी
नदी से समद्र
समा गया मैं
अफ़सोस
अब महानगर में हूँ
यहाँ होकर भी
नहीं हूँ मैं
अब नाम से नहीं
मकान नम्बर से
जाना जाता हूँ मैं
वापिस
कैसे जाऊँ वहाँ
जहॉं पैदा हुआ मैं।