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Saturday, January 17, 2015

तुम याद आओगी

    गंगा दशहरा पर हम हरिद्वार जाते थे साथ-साथ
अब कभी हरिद्वार जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

          दुनियाँ को घूम कर देखा था हम ने साथ-साथ
            अब कभी घूमने जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

छुट्टियों में गांव घूमने जाते थे हम साथ-साथ
अब कभी गाँव जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

पिछले सावन खेत में भीगे थे हम साथ-साथ
 अब जब  खेत जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

शादी की स्वर्ण-जयंती मनाई थी साथ-साथ
अगली साल गिरह पर तुम याद आओगी।

जीवन के राह-सफर में हम चले थे साथ-साथ
  अब जीवन की सुनी राहों में तुम याद आओगी।



  [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]