Friday, November 12, 2010

मोरियो,



 
सतरंगी पांख्याँ वालो,    
                                    रंग - रंगीलो  मोरियो  
 शीश किलंगी घंणी  सोवणी,
                                       प्यारो लागे मोरियो। 


पंख  फैलावै  छतरी ताणै,
                                        घूमर घाले  मोरियो  
    मैह आव जद बोलण लागे,
                                           पैको- पैको मोरियो।  


   चोंच   मार कर नाड़ उठावे,
                                              दाना चुगतो मोरियो 
     काचर  खा  कर पांख गिरावे,
                                              चोमासा में मोरियो। 


      साँझ ढल्यां पीपल के ऊपर,
                                                  जाकर बैठे मोरियो  
     पंछीङा में घणो  सोवणों,    
                                                   रास्ट्र पक्षी यो मोरियो।    

              
                                                                                             

कोलकत्ता
१२ नवम्बर, 2010
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, November 8, 2010

एक बादली (राजस्थानी कविता )


                                    


बणी काजली एक बादली
दूर खेत रे मायं जी
पुरवाई री पून चालगी
रिमझिम मैह बरसावे जी

बेलां री जोड़ी ने लेकर
छैल खेत में चाल्यो जी
मीठी बाणी मरवण बोले
छेलो तेजो गावेजी 

        कोयल गावे,बुलबुल फुदके       
मोरयों छतरी ताणे जी 
पंछीङा गाछां पर बैठ्या
मधरा गीत सुनावे जी 

काची-काची कोंपल फूटी
धरती रो रंग निखरयो जी 
हरियल बूंटा  लेहरां लेव
मरवण करे निनाण जी

अलगोजा खेता में बाज्या
गौरी कजली गावेजी 
बिजल्यां चिमके, बिरखा बरसे
लाटण री रूत आई जी 

मैह मोकळो अबकी बरस्यो
घणे चाव धरती जोती
ओबरियो अबकै भरस्यां
मिज्याजण गौरी बोली

गुंवार मोठ के फल्यां लागगी
सीट्या कूं-कूं लाग्यो जी 
काचर,बोर,मतीरा पाक्या
                           चुनड़ सिट्टा मोरे जी                          
                            
            पीला-पीला बोर मोकळ             
  लाग्या झाड़ी ऊपर जी 
        मठ काचरिया मीठा-मीठा        
   खावण री रुत आईजी   

भर कटोरो  छाछ-राबड़ी
मरवण भातो ल्याईजी
बाजरी री रोटी ऊपर
गंवार फली रो सागजी 

खोल छाक जिमावण लागी
मेहँदी वाला हाथां  जी 
   ढोळो गास्यो भूल गयो    
निरख चाँद सो मुखड़ोजी। 


कोलकत्ता
८ नवम्बर, 2010
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Tuesday, October 26, 2010

चाँदनी रात


चाँदनी रात में
तुम छत पर खड़ी
अपने बालों को संवार रही थी। 

मैं पढ़ रहा था
लेकिन नजर बार -बार
तुम्हारी तरफ उठ रही थी। 

तुमने मोनालिसा की तरह
मुस्करा कर पूछा -
क्या देख रहे हो ?

मैंने कहा -तुम्हारी शोख अदाओं को
जिन्हें देख सितारे भी
मदहोश हो जाते हैं।

और चाँदनी भी शरमा कर
अपना मुँह  बादलों में
छिपा लेती है। 

मेरी तो बात ही क्या है 
आज तो चाँद भी तुमको देखने
जमीन पर आना चाहता है।

तुमने  लज्जाकर
दोनों हाथों  से  अपने
मुँह को ढाँप लिया। 

मानो मेरी
बात को सहज ही
स्वीकार कर लिया। 


कोलकत्ता
२५  अक्टुम्बर, २०१० 
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Saturday, October 23, 2010

पिया मिलन री रुत आई





मालण करदे म्हारा सोला सिणंगार  ऐ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |


चंपा रे फूलारो  बणवादे म्हारो गजरो ऐ,
चोटी तो गुथंवादे बेला  फुल  री ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

नौलख तारा सें जङवा  दे म्हारी कांचली  ऐ,
टूकी तो  लगवादे सूरज - चाँद री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

 इंद्रधणक के रँगा में  रंगवादे म्हारी  चुनडी  ऐ,
गोटा में लगवादे आभा बिजली री ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री  |


कजरारे बादल को सरवादे म्हारे काजलियो  ऐ,
टिक्की तो लगवादे धूजी नखत  री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

चन्द्र -किरण को बनवादे म्हारो चुड़लो ऐ,
सूरज की किरणा सूं नोलख  हार री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |


कोलकत्ता
२२ अक्टुम्बर,२०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Friday, October 1, 2010

स्पर्श



शिशु के बदन पर माँ
के हाथ का ममतामयी स्पर्श

प्रणय बेला में नववधू
के हाथ का रोमांच भरा स्पर्श

पेड़ो पर झूलती लताओं
का आलिंगनपूर्ण स्पर्श

पहाड़ो पर मंडराते बादलों
का प्यार भरा स्पर्श

हँसती खिलखिलाती नदी  का
 सागर में समर्पण  का स्पर्श

गुलशन  में गुनगुनाते भंवरों  
का फूलों  से  मधुमय स्पर्श

मानसरोवर  के स्वर्णिम कमलों  पर
 तुहिन कणों का स्पर्श

दुनिया के कोमलतम
     स्पर्श की कहानी कहते हैं। 

कोलकत्ता
१ अक्टुम्बर, २०१०
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Wednesday, September 22, 2010

बुजुर्गों कि शिक्षा




बड़े बुजर्गों ने बताया कि
परिवार के साथ रहो
अकेले मत रहो 

अकेले रहते हो तो
रात को घर से
बाहर मत रहो 

बाहर रहना
 ही पड़े तो जल्दी
 लोट आवो 

ज्यादा दिन बाहर
रहने से परिवार
बिखर जाता है 

लेकिन उसने
बुजुर्गो की सिख पर
ध्यान नहीं दिया

बाहर जाने लगा
कई दिनों बाद घर
आने लगा

एक दिन वही हुवा
जो बुजर्गों ने कहा था
आज घर बिखर गया था

पड़ोसियों  ने बताया
"वो" किसी के साथ
भाग गई

गहने कपड़े भी ले गई
बैंक बैलेंस भी साफ़ कर गई
छोड़ गई एक अदद सूना मकान

अब वंहा घर नहीं था
सूना मकान था
और साथ में था
उम्र भर का पछतावा। 



कोलकत्ता
२२ सितम्बर, २०१०

Saturday, September 11, 2010

वाह रे कलकता





यह    कैसा  है  कलकत्ता                       
         मेरी समझ में नहीं आता ,
माँ   काली का   कलकत्ता                    
        बड़ा   विचित्र है   कलकत्ता I


हाथीबगान में हाथी नहीं              
              बागबाजार में  बाग  नहीं,
बहुबजार    में  बहु   नहीं             
             फूलबगान में फूल   नहीं  I


        राजाकटरा में राजा  नहीं                  
               पार्क   सर्कस  में सर्कस  नहीं,
प्रिंसेस  घाट  पर प्रिंसेस नहीं          
                    बाबुघाट   पर  बाबू  नहीं  I 


    निम्बूतला में निम्बू  नहीं                 
               बादामतला में बादाम नही,
मछुवा बजार में मछुवा नहीं           
                 दरजीपाड़ा  में  दरजी नहीं  I


 बैठक खाना में बैठक नहीं             
               बैलगछिया  में  बैल नहीं,
घासबगान  में घास  नहीं              
                    बाँसतल्ला  में बाँस नहीं  I  


        यह   कैसा     है  कलकत्ता                    
               मेरी   समझ में नहीं आता,
 माँ  काली   का  कलकत्ता             
                बड़ा  अजब   हैं   कलकत्ता I

कोलकत्ता
११ सितम्बर, २०१०
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, September 7, 2010

घर



ईंट,सीमेंट
   और गारे से   
 मकान तो बन जाता है
  लेकिन घर नहीं बनता है 


घर बनाने के लिए
चाहिए प्रेम रूपी सीमेंट
विश्वाश रूपी ईंट और
त्याग रूपी गारा 

इनमे से अगर एक भी
कमजोर हो जाये तो
घर बिखरने में
    देर नहीं लगती।     

कोलकत्ता
६ सितम्बर, २०१०

Wednesday, September 1, 2010

प्रकृति के रंग






टेढ़ी -मेढ़ी  कुछ खीँच लकीरे,
कृष्णा ने एक चित्र बनाया |

चित्र    देख   मैंने    जब  पूछा,
   उसने मुझको   यो समझाया |

  लाल रंग    जहाँ    बिखरा था,    
उसने उसको     भोर बताया |

 काला   रंग जँहा  छितरा   था   
उसको  काजल कोर बताया  |

  हरा रंग    धरती का आँचल,    
   पेड़ो    को उसने दिखलाया |    

नीला      रंग जँहा फैला  था, 
उसको गंगा जल   बतलाया  |

गायों  को चरते दिखलाया, 
 चिड़ियों को उड़ते  दिखलाया  ।

टेढ़ी -मेढ़ी  कुछ खीँच लकीरे,
कृष्णा ने एक चित्र बनाया |


कोलकत्ता 
१ सितम्बर, २०१०


(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


Monday, August 30, 2010

अभिलाषा




आईने में अपना
चेहरा तो सभी देखते हैं,
लेकिन मै जब आईना देखूँ और
चेहरा तुम्हारा साथ दिखे तो जानूँ। 


मयखाने में जाकर
मदहोश तो सभी होते हैं,
तुम मेरी अधखुली आँखों  में
 मदहोश होकर दिखाओ तो जानूँ। 


चमन में
  खिलती कली पर तो
 सभी नग्मे गुनगुनाते हैं,
तुम मेरे नाजुक लबों पर कोई गीत
लिख कर गुनगुनाओ तो जानूँ। 


गुलशन  में खुशबू
तो सभी फूल बिखेरते हैं,
तुम मेरी जिन्दगी में प्यार की  
खुशबू  बिखेर कर दिखावो तो जानूँ  |


दिन के उजाले में
तो सभी साथ चलते हैं,
अंधकार में दीप जलाकर तुम
मेरे साथ चल कर दिखावो तो जानूँ। 

यौवन तो चढ़ता सूरज है
ढलती उम्र में जब तम छाये और
तुम पूनम का चाँद बन कर
आओ तो जानूँ।

कोलकाता
३० अगस्त, २०१०  

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Saturday, August 28, 2010

बुढापा का स्वागत करो I

उम्र अब  ढलने  लगी
दस्तक बुढ़ापा देने लगा 
बीते  समय को भूल कर
                     तुम वक्त से समझौता करो
                          बुढापे का स्वागत  करो।                                                    

हुक्म चलाना छोड कर
हुक्म मानना सीखो अब
बच्चे जो  कुछ  करना चाहे
                        तुम उनकी हाँ में  हाँ करो
                           बुढापे का स्वागत  करो।

रुख समय का देख कर
अपने आप को बदलो अब 
शांत भाव से रहना सीखो
                                 गुस्सा करना बंद करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।

सब्जी गले या बिजली जले
दूध जले या पंखा चले
होने दो जो कुछ होता है
                                टोका  - टोकी   बंद करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।


कौन सुनेगा कहा तुम्हारा
किसके पास समय है अब
प्रभु सेवा में  मन लगाकर
                                चुप रहना स्वीकार करो
                                बुढापे का स्वागत  करो।



कोलकत्ता
२८  अगस्त, २०१० 
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )



Tuesday, August 24, 2010

जुदाई




दूर तक साथ चलना था
राहे - सफ़र में हमें,
पल भर भी दूर रहना 
गँवारा नहीं था हमें। 

लगता था एक- दूजे के लिए
ही बने थे हम,
आज वो सारे कसमें -वादे
भूल गये हम।

सौ जन्मों तक साथ निभाने
का वादा किया था हमने,
अपने घर को स्वर्ग बनाने का
 सोचा था हमने।

कल्पना के गुलसन में अनेक
फूल  खिलाये थे हमने,
आज मधुमास को पतझड़ में
बदल लिया हमने। 

 अपनी ही बातो पर
रोज अड़ते रहे हम,
एक दूसरे की बातो  को
रोज काटते रहे हम।

 अपने-अपने स्वाभिमान
को रोज टकराते रहे हम,
एक दूसरे के दिल में
नहीं रह सके हम। 

छोटी - छोटी  बातो  ने
जुदा कर दिया हमको,
मन इतने बदल जायेंगे
मालूम नहीं था हमको।

कभी अपने ही रास्ते पर
फूल बिछाये थे हमने,
आज उसी चमन में
काँटे बिछा लिए हमने।

  खंजर से नहीं बातो से ही  
दिल  टूटे गए  थे  हमारे,
जीवन   के  सारे ख्वाब
चकनाचूर हो गये थे हमारे।

 नहीं संभव अब हम  फिर
इस जीवन में साथ रहेंगे,
एक आसमा के नीचे रह कर 
भी हम अंजान  बन रहेंगे।

कोलकाता
२४  अगस्त, २०१०
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Thursday, August 5, 2010

दोस्ती



        माँ की ममता सी होती  है दोस्ती                   
              भाई के सहारे सी होती है दोस्ती,
बहन के प्यार सी होता  है दोस्ती         
                लाजबाब रिश्ता होता है दोस्ती  |

सागर से भी गहरी होती है दोस्ती          .
            जल से  भी शीतल होती है  दोस्ती
    फूलों से भी कोमल होती है दोस्ती               
               हवाओं का संगीत होती है दोस्ती |

     कड़ी धूप में तरुवर होती  है दोस्ती             
             मरुभूमि में निर्झर होती है दोस्ती
चाँद की  चाँदनी होती  है दोस्ती             
               उजाले कि किरण होती है दोस्ती  |

अरमानों  का आइना होती है दोस्ती           
           जीने का एक अंदाज होती है दोस्ती
     उदास चहरे की मुस्कान होती है दोस्ती           
        जीवन का सहारा होती है दोस्ती |



कोलकत्ता
५ अगस्त, २०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, July 26, 2010

उड़ जाये चिड़िया फुर्र




मुर्गा    बांग    लगाये   उससे
पहले   चिड़िया   उठ    जाती,
सूरज   के   उगने   से   पहले
आकर   मुझे   जगा     जाती,
बैठ मुंडेर के ऊपर -उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

  चीं -चीं  कर  आँगन में  आती   
घर में सबके   मन  को भाती,
फुदक फुदक कर  उडती  जाती
बड़े    मजे   से    गाना    गाती,
चुग्गा ले थोडा सा उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

 जंगल - जंगल उड़   उड़  जाती   
मुँह में  तिनका  दबा  के  लाती,
  लगा- लगा कर एक एक तिनका
अपना  सुन्दर   नीड़    बनाती,  
नन्ही नन्ही आँख नचा -उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

खेतों -खलिहानों   में    जाती
चुन -चुन करके  दाना  लाती,
ची-चीं  करते  निज बच्चो  के
डाल चोंच  में  चुग्गा  खिलाती,
सुना के लोरी बच्चो को - उड़ जाये चिड़िया फुर्र  |

दिन भर चिड़िया उडती रहती
थकने  का वो  नाम  न   लेती,
हमें  सीख    वो दे   कर जाती
श्रम  करके   चढ़  जावो  चोटी,
 लक्ष्य आसमां का देकर - उड़ जाये चिड़िया फुर्र |



गीता भवन
२५  जुलाई ,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Friday, July 23, 2010

मेरी रामायण का राम



मै एक नयी
रामायण का अंकन करूँगा
जो एक आदर्श
रामायण
होगी 

मेरा राम सूर्पनखा का
  नाक काटने के लिए 
  भाई लक्ष्मण को
    नहीं भेजेगा 

मेरा राम सीता के कहने पर
  स्वर्ण मृग को मारने 
  नहीं जायेगा

मेरा राम सुग्रीव से मित्रता
  करने  के लिए कपट से
  बाली का वध
 नहीं करेगा 

मेरा राम अशोक वाटिका से
सीता को लाकर उसकी
उसकी अग्नि परीक्षा
नहीं लेगा

मेरा राम रजक के कहने से
  आसन्न-प्रसवा  सीता को
 वन में छोड़ने नहीं
 भेजेगा 

मेरा राम चारो भाइयो के
 साथ सरयू में जाकर 
  समाधि नहीं
 लेगा

मेरी रामायण का राम एक
आदर्श मानवीय मूल्यों
 का धारक राम
होगा।



कोलकाता
२३ जुलाई,२०१०

Wednesday, July 21, 2010

रैलियाँ

 


कोलकाता और रैलियाँ  
दोनों का चोली-दामन
का साथ है। 

कोलकाता है तो रैलियाँ हैं,
रैलियाँ है तो समझो ये
कोलकात है। 

यहां कोई भी कभी भी
रैली निकाल
लेता है। 

 रैलियाँ का बड़ा आयोजन
राजनैतिक पार्टियां
 करती हैं। 

इनकी  रैलियाँ कोलकाता  का
 चक्का जाम करने में
 सक्षम होती हैं।

  स्त्रियों के गोद में बच्चे,
   पुरुषो के टकते थैले,
     हाथो में झंडे,
      पहचान है इन रैलियों की।

महानगर की सडकों पर
अजगर की तरह सरकती है
ये रैलियाँ।

इनके पीछेपीछे
चलती रहती हैं

सायरन बजाती एम्बुलेंस 
जिसमे कोई मरणासन्न
रोगी सोया रहता है।

घंटी बजाती दमकल
 जिसे कहीं लगी हुयी आग को
 बुझाने पहुचना है। 

प्रसूता जिसे अविलम्ब
सहायता के लिए
अस्पताल पहुंचना है।

लेकिन रैलियों की भीड़
इन सबकी नहीं
सुनती।

वो गला फाड़-फाड़
कर  नारे लगाती
 रहती है।

जिनका अर्थ वो
 स्वयं भी नहीं
जानती है।

   .इन्कलाब जिंदाबाद
        जिंदाबाद  जिंदाबाद !



कोलकत्ता
८ सितम्बर,  २०१०


(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, July 20, 2010

अन्तर


तुलसीदास जी
अपनी पत्नी से
बहुत प्रेम करते थे

लेकिन पत्नी के
व्यंग बाणों से आहत हो
घर छोड़ जंगल में चले गये 

निर्वासित जीवन जी कर 
उन्होंने रामचरित मानस
जैसा काब्य लिखा

मै भी
अपनी पत्नी से
बहुत प्रेम करता हूँ

लेकिन पत्नी के
व्यंग बाणों से कभी
विचलित नहीं होता हूँ

वो चाहे जितना भी डांटे
मै अपने कान पर जूं तक
नहीं रेंगने देता हूँ

आराम से घर में बैठ कर 
चाय की चुस्कियों के साथ
कविता रुपी  काब्य
लिखता रहता हूँ।


गीता  भवन  
२० जुलाई , २०१०                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              

Saturday, July 17, 2010

भक्तगण



गर्मियों की शाम
स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश)
गंगा का तट
पानी में नहाते
भक्तगण। 

ठंडी-ठंडी हँवाए
शांत गंगा जल
घाटो पर ध्यान लगाते
भक्तगण। 

गीता भवन का घाट
श्री गौरी संकर जी के
सानिध्य में 
शिव महिमा स्त्रोत्र का
 पाठ करते
भक्तगण। 

परमार्थ निकेतन का घाट
मुनि श्री चिन्मया नन्द जी के
सानिध्य में
गंगा आरती करते
भक्तगण। 

वानप्रस्थ आश्रम
श्री मुरारी बापू के
सानिध्य में
भागवत कथा का
रसपान करते
भक्तगण। 

श्री वेद निकेतन धाम
  विश्व गुरूजी के
सानिध्य में
हठयोग का 
 प्रशिक्षण लेते   
भक्तगण। 

आध्यात्मिक भक्ति -भाव
के सानिध्य में
गंगा में दीपक
अर्पित करते 
कितने अच्छे लगते हैं
भक्तगण। 



गीता भवन
१६ जुलाई, 2010
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, July 13, 2010

भेड़ चाल


भेड़ गर्मिंयो में  
लू के थपेड़े खा कर
जलती देह पर ऊन उगाती हैं। 

सर्दियों में खुद
 ठंडी हवाओ के थपेड़े
सहती रहती है।

लेकिन अपनी
ऊन दूसरो को कम्बल
 बनाने के लिए दे देती है। 

इंसान आज तक
भेड़ चाल के नाम पर
 कटाक्ष ही करता आया है। 

 क्या उसने कभी
 भेड़ के इस त्याग को भी
  समझ ने की चेष्टा की है ?
    
गीता भवन
१२ जुलाई,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )                                                                          


Friday, June 25, 2010

बचपन

o


बारह बर्ष की  
बाली उम्र में जब
खेलने-कूदने,पढने लिखने
 और मौज मस्ती के दिन थे
 उस समय ससुराल में पाँव रखा |


घूँघट में रहना
कम बोलना,ज्यादा सुनना
मुस्कुराना और सहना
सब कुछ सीखा |


गृहस्थी को संभाला
बच्चो को पढाया लिखाया
बहुओ और पोते पोतियों को
संभालते सँभालते
शैशव और यौवन दोनों बीत गये |


हाथो में मेहंदी लगाते-लगाते
बालो में मेहंदी लगाने के
दिन आ गये |


आज वो
अपने पोते पोतियों
के साथ बैठ कर
अपने बचपन को
फिर से जीने लगी है । 


डेंगा-पानी का खेल
गुड्डा -गुड्डियो का खेल
बरफ के गोले के लिए मचलना
बारिस की रिमझिम में भीगना |

 ये सब
सुनाते-सुनाते
उसके चहरे पर एक बार फिर
बारह वर्ष वाली बाली उम्र की
हँसी  लौट  आती है  | 

सुजानगढ़  
२५ जून, २०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Thursday, June 17, 2010

चन्दा मामा



चन्दा मामा आओ ना
साथ मुझे ले जाओ ना 
     बादल के घोड़े पर चढ़ कर
     मुझे घुमा कर लाओ ना। 

तारों के संग आँख मिचोली
मै खेल कर आवूंगा
     आसमान में ऊपर जाकर
     सारे जग को देखूंगा। 

रात चाँदनी में नाचूँगा
गीत ख़ुशी के  गाऊँगा 
     वापिस आते एक दुल्हनिया
     परी देश से लाऊँगा। 


सुजानगढ़
१७ जून,२०१०

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


Wednesday, June 16, 2010

भिखारिन




विक्टोरिया में
मोर्निंग वाक करके
हम शर्माजी की
दुकान पर  पहुँचे।

सुबह के नाश्ते में
गर्म जलेबी और
समोसों के साथ
चाय का घूँट लेने लगे। 

तभी एक दुबली पतली
काया वाली औरत
एक कटी-फटी धोती में
हमारे सामने आकर
खड़ी हो गई।

वह कभी खुद को
कभी अपने अधमरे
बच्चे को ढकने का
प्रयास कर रही थी।  

टुकुर-टुकुर हमारी
तरफ देख रही थी
उसकी आँखों में एक
याचना थी। 

हमारे में कोई बोला 
कितनी बेशर्म है
सामने छाती पर
आकर खड़ी हो गई। 

हमने उसकी तरफ
तिरस्कार भाव से देखा
हटाने के लिए बचा-खुचा
उसकी तरफ बढ़ा दिया।

बच्चे को गोदी में
बैठा कर वो उसे प्यार से
माथे पर हाथ फेर कर
खिलाने लगी। 

हमने महसूस किया 
बच्चे को खिलाती हुयी वो
हमारी तरफ तृप्ति के भाव 
से देखने लगी। 



कोलकता
६ जून,२०१०

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, June 15, 2010

बरखा आई .


घनघोर घटा काली घिर आई,
बहने     लगी   हवा   पुरवाई,
बादल  में   बिजली चमकाई,
मतवाली बरखा  ऋतु  आई,
                                छम छमा छम बरखा आई|

झम-झम कर बूंदे  छहराई,
सोंधी खुशबू  माटी से  आई,
भीग चुनरिया तन लपटाई,
महक  उठी  देह   महुआइ',.
                                छम छमा छम बरखा आई|

अमृतघट  प़ी धरती मुस्काई,
कोयल  ने मीठी तान सुनाई,
झूला  झूल   रही   तरुनाई,  
मीत  मिलन  की  बेला आई,
                                  छम छमा छम बरखा आई|

मेंढ़क ने  मेघ मल्हार लगाई,
इन्द्रधनुसी  छटा     लहराई.
मिटी    उमस  पवन  ठंडाई,
मतवाली बरखा ऋतु आई.
                                  छम छमा   छम बरखा आई|

पिहु पिहु पपिहा  ने धुन गाई,
कजली  खेतो  में लगी सुनाई,
मस्तानी      वर्षा     ऋतु  आई
झूम बदरिया घिर  घिर आई,
                                   छम  छमा  छम  बरखा आई|
सुजानगढ़
१५ जून,2010

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, June 7, 2010

आशाएं




रख भरोसा प्रभु चरणों में,           
              हमको  आगे बढ़ना है। 
जीवन  के  हर एक   पल को        
              हमें  ख़ुशी से जीना  है। 


राहें सीधी हो या टेढ़ी,                
               हँसना है मुस्काना है। 
संकट तो आते-जाते हैं,             
             इनसे क्या घबराना है। 


हिम्मत के बल आगे बढ़,             
       जीवन में खुशिया लानी हैं। 
आशाओं  के दीप जला कर ,       
                 रोशन राहें   करनी है। 


चाहे जितनी  हो बाधायें,              
               हमको चलते जाना है। 
दुःख से ही  सुख आता है,           
          जीवन का यही तराना है। 


जीते हैं मरने वाले ही,               
             दिल में यह विश्वास  रखें।  
हार गए तो भी क्या होगा,         
             दिल में जय की आश  रखें। 

सुजानगढ़
७ जून, २०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Thursday, June 3, 2010

मतीरो


धोरां री धरती रो मेवो
मीठो गटक मतीरो। 

हरी- हरी बेलां पर लागे            
                      जाणै पन्ना जड़िया।          
           धोरा मांई  गुड-गुड ज्यावै                  
                   ज्यूँ अमरित रा घड़िया।        
           
फोड़ मतीरो खुपरी खावे,                  
         लागे अमरित सो मीठो। 
     गरमी का तपता मौसम में,               
             ओ करे कालजो ठंडो। 

कुचर-कुचर ने खुपरी खावे,             
             मिसरी ज्यूँ  मीठो पाणी। 
भूख मिटावे -प्यास बुझावे,           
            गंगा जल  सो ठंडो पांणी। 


सुजानगढ़
३ जून,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, May 31, 2010

ननिहाल



मई महीना  आते ही              
गर्मी जब बढ जाती है |
नानी के घर  जाने की              
जल्दी हमें सताती  है ||

लम्बी छुट्टी  होते ही  सब        
      नानी के घर जाते है|
नानी के संग चौपाटी में            
    भेल-पूरी हम खाते हैं ||

नानी दिन भर हम सबको             
           खेल अनेक खिलाती है|
जूहू बीच  पर  पुचका खाने           
            साथ   हमें ले जाती है ||

मामी मेरी प्यारी-प्यारी           
             देती गुडिया   नई- नई|
इसीलिए लगती हैं हमको          
               प्यारी-प्यारी   मुंबई ||

छुट्टिया  खत्म होते ही           
           वापिस घर आजाते हैं|
अगली छुटी में  आयेंगे           
           नानी को कह  आते हैं||



सुजानगढ़
३१  मई, २०१०


(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Monday, May 24, 2010

ना बाबा ना

                                                                                                                                                                                                                                                                                                      




बुरा बोलना   बुरा देखना 
  बुरा सोचना  ना बाबा ना  | 

कभी लड़ना  कभी झगड़ना
शोर मचाना  ना बाबा ना |

झूठ  बोलना   चोरी करना
  नक़ल करना ना बाबा  ना |

गन्दा रहना, स्नान न करना
मैले  कपड़े  ना बाबा ना |

आँख में आँसू   नाक पे गुस्सा
मुँह से गाली  ना बाबा ना |

व्यर्थ घूमना  गप्प मारना
काम  न करना  ना बाबा ना  | 



सुजानगढ़
२४ मई, २०१०

Saturday, May 15, 2010

कौवे का श्राद्ध




एक कौवे ने
अपने पूर्वजो का
श्राद्ध कर्म करने का
मन बनाया। 

 मंदिर वाले पेड़ के
 पंडित कौवे को
श्राद्ध कर्म करने के लिए
 बुलाया। 


विधि-विधानुसार
पंडित कौवे ने एक पिंड
बनवाया और पीपल के पेड़
के नीचे  रखवाया। 

एक बूढा
 भिखारी उधर से निकला
 उसने पिंड को देखा
और खा लिया। 

पेड़ से कोवा
चिल्लाया - श्राद्ध पूर्ण हुवा
अभ्यागत ने भोजन
 ग्रहण कर लिया। 

सभी कौओं ने 
आसमान की तरफ देखा
श्रद्धा से उनकी आँखों से 
अश्रु टपक पड़े। 


सुजानगढ़                                                                                                                                          
14 मई, 2010                                                                                                                                         

                                     ( यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )