Sunday, December 30, 2012

सार-सार को गहि रहै


वृद्ध होने के लिए बालो का
सफ़ेद होना जरुरी नहीं है,
मन में निराशा का संचार
होना ही प्रयाप्त है।

जीवन को इस तरह से
जीवो कि हमारा बुढ़ापा
और बच्चों का यौवन
दोनों की गरिमा बनी रहे।

अभिमान और विनम्रता दोनों
का पिता एक है किन्तु माँ दो है
अभिमान की जननी अहं है
विनम्रता की जननी सदाचार है।

रोता तो आसमा भी है
अपनी जमीन के लिए
मगर हम उसे
बरसात समझ लेते है।

पहाड़ो की चोटियाँ भी
पांवों तले आ सकती है,
लेकिन जरुरी है
पहाड़ो के भूगोल से कहीं ज्यादा
हौंसलो का इतिहास पढ़ा जाए।

आजन्म इच्छाऐ मरती नहीं
चाहत बढती जाती है जीने की ....
फिर मोक्ष कैसा। 

अभिमान,
बुद्धि से पहले पैदा होता।

चाँदनी को चाँदनी भी
कह सकते हो
उसे रात कि गोद में सवेरा
भी कह सकते हो।


(मेरी पढ़ी पुस्तको से कुछ वाक्य,जो मेरे दिल को छूने में सक्षम रहे, शायद आप भी पसंद करे।)


सार-सार को गहि लहै












Thursday, December 27, 2012

मानवता बच जायेगी




आकाश के
दिलकश नजारों को
प्रदुषण ने छिन लिया।

रातों की
नींद को ट्रकों की
चिलपों ने छिन लिया।

फलों का
स्वाद फर्टिलाईजर 
ने छिन लिया।

बच्चों  के
बचपन को होमवर्क
ने छिन लिया।

परिवार की
  एकता को महंगाई   
 ने छिन लिया।

दादी की
कहानियों को टी वी
 ने छिन लिया।

पक्षियों के
कलरव को टावरों
ने छिन लिया।

आपसी प्यार को
 अहम् की संकीर्णता
 ने छिन लिया।

दुनिया के अमन
चैन को आतंकवाद
 ने छिन लिया।

देर सवेर सही
 लेकिन यह बात समझ
में आयेगी।

जीतनी जल्दी
समझ में आएगी
मानवता बच जायेगी। 

Sunday, December 16, 2012

जीवन हँसता है


                              


कंही पर बड़े -बड़े भंडारे हो रहे है  
       कँही पर बच्चे भूखे सो रहे  है      
कोई फाइव स्टार में पार्टी दे रहा है    
कोई कचरे के ढेर को बिन रहा है  
                  जीवन फिर भी हँसता है।      

   किसी का घर रोशनी से चमक रहा है           
 किसी का घर आग से जल रहा है   
किसी के यंहा गीत गाये जा रहे है  
किसी के यंहा शोक मनाया जा रहा है       
             जीवन फिर भी हँसता है।  

कोई हवाई जहाज में सफ़र कर रहा है     
     कोई नंगे पांवों चला जा रहा है
कोई वातानुकूल कमरे में सो रहा है
   कोई फुटपाथ पर रात बिता रहा है
                जीवन फिर भी हँसता  है।

  कंही विजयश्री का जस्न हो रहा है
   कंही हार का विशलेषण हो रहा है
कही बर्लिन को एक किया जा रहा  है
 कंही कोसोवो को अलग किया जा रहां है       
                  जीवन फिर भी हँसता है।

       अगर जीवन का आनंद लेना है
          तो हमें  हँसते हुए ही जीना है
       हमें हँसी से मुँह नहीं मोड़ना है
        खुशियाँ से नाता नहीं तोडना है 
             जीवन तो फिर भी हँसता है।

(कहते है कि हँसना भी ध्यान है,हँसते समय मन विचार शून्य हो जाता है और विचार शुन्यता में ध्यान घटित होता है , जिससे ब्रह्मानंद  का सुख मिलता है )

Friday, November 30, 2012

आयशा



आज आयशा आई आँगन में,
ले अनन्त खुशियाँ जीवन में।
किलकारी से गूंजा हर कोना,
  चाँद सा मुखड़ा बड़ा सलोना ।

नन्ही  परी जब से घर आई,
खुशियाँ दो परिवारो में छाई।
गुनगुन करके वो करती बात,
 फुल सी आयशा बनी सौगात। 

नानीजी की गोदी जन्नत बनी,  
नानाजी के होठो मुस्कान खिली।
रुनझुन दादाजी के मन में बसी,
नन्ही  कली  जैसी पलके खुली।

दादीजी के आँचल में सिमटेगी,
लोरियों की तान में खो जायेगी। 
मम्मी- पापा की वो होगी प्यारी,
सब के सपनों की वो राजदुलारी।

मन की खुशियों को कैसे छुपाऊँ,
कैसे आयशा  को गोदी खिलाऊँ।
गोद खिलाने की चाह बहुत  है,
लेकिन  हम तो बैठे दूर बहुत है।

सदा प्रभु का आशीर्वाद रहेगा,
खुशियों से भरा जीवन रहेगा।
चाँद सितारे तुम्हारी उम्र लिखेंगे,
हंसी से गुलसन में फुल खिलेंगे।




आयशा के जन्मदिन की खुशियाँ- प्रेसबिटेरियन हॉस्पिटल (यूपीएमसी), पिट्सबर्ग, अमेरिका मनाते हुए
मनीष - सुशीला - भागीरथ - फ्रांसिस - चार्ली


Wednesday, November 21, 2012

मन में बसी है





जीवन के पैसठवे बसंत में भी
गांव की यादें आज भी
बहुत आती है।

पचास साल हो गए गाँव को छोड़े
लेकिन अभी कल की जैसी
बात लगती है।

याद आता है आज भी गायों का
रम्भाना और बछड़ो का
उछल-कूद मचाना।

सज-धज कर पनिहारिनों का
पानी भरने जाना और
पायल का बजना।

गडरिये का अलगोजा बजाना
गायो के गले में बन्धी
घंटियों का बजना।

सावन की रिमझिम फुहांर में
मेहंदी लगे हाथों का
झूले झुलना।

गर्मियों में घर आये मेहमान को
बाटका भर छाछ -राबड़ी
का पिलाना ।

गाँव की अनेको यादे
आज भी मन में बसी है
मुस्किल है उन्हें भुलाना।








Friday, November 16, 2012

आनन्द और उत्साह





मैं नहीं जानती कि
तुम्हे सुबह के पेपर में
कौन सी खबर चाहिए, 
लेकिन मै जानती हूँ कि
तुम्हे सुबह की चाय में
अदरक जरुर चाहिए।

मैं नहीं जानती कि
देश में बढ़ते घोटाले
कैसे रोके जाने चाहिए,
लेकिन मैं जानती हूँ कि
स्कूल से आने के बाद
बच्चो को क्या चाहिए।

मैं नहीं जानती कि
आरक्षण निति से गरीबो को
कितना लाभ मिलता है,
लेकिन मैं जानती हूँ कि
तुम्हारी माँ को मेरे हाथ का
खाना खाकर आनंद मिलता है।

मैं नहीं जानती कि
बढ़ते राजकोषिये घाटे को
कैसे कम किया जा सकता है,
लेकिन मैं जानती हूँ कि
घर के बजट को कैसे संतुलित
किया जा सकता है।

मैं नही जानती कि अलकायदा 
और तालिबान की धमकी से
अमेरिका की नींद उड़ जाती है,
लेकिन मैं जानती हूँ कि तुम्हारे
बालो में अंगुलियाँ फेरने से
तुम्हे नींद आ जाती है।



















Friday, November 2, 2012

आम





गर्मियों में  आता आम 
सबके मन को भाता आम
कच्चा सबसे पहले आता
चटनी और अचार बनाता।

होता बड़ा रसीला आम
चुसो खाओ ताजा आम
सबको प्यारा लगता आम
सब फलो का राजा आम।

कई प्रकार के होते आम
लंगड़ा और दशेरी  आम
गुलाबखाश और हापुस आम
हेमसागर और फजली आम।

खुशबू इसकी प्यारी होती
इनकी शान निराली होती
पक  जाने पर मीठा होता
इसीलिए वो सबको भाता।


Sunday, October 28, 2012

क्या वह लमहा तुम्हे याद है ?





जब हम गंगा में
माटी के दीपक
प्रवाहित करते और
देखते रहते कि किसका
दीपक आगे निकलता है
क्या वह लमहा तुम्हे याद है ?


जब हम सागर से 
सीपिया चुन-चुन कर 
इकट्ठी करते और
देखते रहते कि किसकी
सीपी से मोती निकलता है
क्या वह लमहा तुम्हे याद है ?


जब हम झील के
किनारे बैठे रहते और 
बादलो की रिमझिम फुहारों में
भीगते हुए तुम कहती 
ये पहाड़ कितने अपने लगते हैं
क्या वह लमहा तुम्हे याद है ?
  

जब हम चाँदनी रात में
छत पर जाकर सोते और
टूटते हुए तारों को देख कर
तुम कहती तारों का टूटना मुझे
अच्छा नहीं लगता
क्या वह लमहा तुम्हे याद है ?



Wednesday, October 24, 2012

फाल का मौसम -पिट्सबर्ग





सुबह धना कोहरा
दिन में हलकी बारिश
शाम को गुलाबी ठण्ड
रात में चमचमाते जुगनू।

परिधान बदलती धरती 
रंग-बिरंगे पेड़ पौधे
दौड़ते हुए हस्ट-पुस्ट
लडके-लड़कियां। 

हरी भरी वादियाँ
और ऊँचे पर्वतों पर
अठखेलियाँ करती
काली घटायें। 

मोनोंगैहेला नदी और
ऐलेगनी का संगम स्थल 
ओहियो के उदगम पर    
मनभावन सूर्योदय।

फाल के मौसम  में
धरती का स्वर्ग
बन जाता है
पिट्सबर्ग।
  

Monday, October 22, 2012

हम किधर जा रहे है ?

आज इन्सान की हँसी
लोप होती जा रही है 
जैसे लोप होती जा रही है
नाना- नानी की कहानियाँ। 

आज इन्सान का प्रेम
लोप होता जा रहा है
जैसे लोप होती जा रही है
चन्दा मामा की कहानियाँ।

आज इन्सान की  करुणा  
लोप होती जा रही है 
जैसे लोप होती जा रही है
परियों की कहानियाँ।

आज इन्सान की शांति
लोप होती जा रही है
जैसे लोप होती जा रही है
राजा-रानी की कहानियाँ।

प्रगतिशील युग की तरफ
जाने के लिए  इस तरह की
सीढियाँ तो नहीं हो सकती
फिर हम किधर जा रहे है ?




Thursday, October 4, 2012

किसी दिन

सावन का महीना होगा
         गाँव का घर होगा
                मिट्टी के आँगन में
                     तुम्हारी पाजेब की रुनझुन
                                       सुनेंगे किसी दिन। 


लहलहाती फसले होंगी
         हवाओं में खुशबू होगी
                  वर्षात में भीगते हुए
                          खेत में साथ-साथ
                                     चलेंगे किसी दिन। 


तारों भरी रात होगी
         चाँद की गोद होगी
                  शबनमी रात में
                           तुम्हारी प्रणय राग
                                    सुनेंगे किसी दिन। 


कश्मीर की वादियाँ होगी
        केशर की क्यारियाँ होगी
                 कमल खिली झील में
                          साथ बैठ कर सैर
                                   करेंगे किसी दिन। 


गोधुली बेला होगी
        आरती का समय होगा
                  पास के मंदिर में जाकर
                        भगवान के सामने दीया
                                जलायेगें किसी दिन।


खुशबू भरी शाम होगी
         तुम मेरे पास होगी
                जुगनू की कलम से
                       तुम्हारे लिए एक कविता
                                   लिखेंगें किसी दिन।


ऊपर खुला आकाश होगा
        निचे अपरिमित जलराशि
                     ठंडी हवाओं के संग
                          साथ बैठ कर नौका विहार
                                           करेंगे किसी दिन।

Wednesday, September 19, 2012

मांडवी


तुलसीदासजी ने रामायण में
मांडवी के त्याग और विरह
वेदना का उल्लेख नहीं किया।

उन्होंने केवल सीता के त्याग
और लक्ष्मण के भ्रातृ प्रेम का
ही प्रमुखता से वर्णन किया। 

मैथली शरण गुप्ता ने भी
साकेत में मांडवी के त्याग
को महत्त्व नहीं दिया।

उन्होंने केवल उर्मिला की
विरह वेदना का ही साकेत
में उल्लेख किया। 

सीता को तो वन में रह कर भी
अपने पति के साथ रहने का
अवसर मिला। 

लेकिन मांडवी को तो अयोध्या
में रह कर भी पति के सामीप्य
का सुख नहीं मिला। 

भरत चौदह साल तक परिवार
से दूर जंगल में पर्ण कुटी
बना कर अकेले रहे। 

फिर मांडवी के त्याग को
सीता के त्याग से कमतर
क्यों आंका गया ?

मांडवी की विरह वेदना को
उर्मिला की विरह वेदना से
कमतर क्यों समझा गया ?

एक दिन फिर कोई
तुलसीदास जन्म लेगा
फिर कोई मैथली शरण आयेगा।

जो मांडवी के दुःख दर्द को
नए आयामो और
नए अर्थों में लिखेगा।





Sunday, September 16, 2012

विसमता



पेट भरते ही पक्षी दाना
छोड़  कर उड़ जाते है
वो भविष्य की नहीं सोचते
केवल वर्तमान में जीते है। 

इंसान वर्तमान में नहीं
भविष्य में जीता है और
आने वाले कल की चिंता
सबसे पहले करता है।

इसी कारण पक्षियों में   
आज भी समानता है
और इन्सानों में अमीर
गरीब जैसी विषमता है। 

मानव को प्रकृती ने
खुले हाथो से दिया है 
सबके लिए सामान
रूप से दिया है। 

काश ! हम सब मिलझुल
कर दुनिया में रह पाते
दुनिया से इस विषमता
को मिटा पाते |

Saturday, September 15, 2012

जीवनदानी




हे जीवनदानी !
तुमको सत-सत
नमन। 

तुम तो अनेक के
जीवन दाता बन कर 
सदा सदा के लिए
अमर हो गए। 

तुमने आँखे देकर 
किसी को दृष्टी दी
अपना दिल देकर 
किसी को धड़कने दी। 

अपने फेफड़े देकर 
किसी को सांसे दी
गुर्दे देकर किसी को
जीवन की आशाएं दी। 

हे महादानी
हे गुप्तदानी

हम सब ऋणी
रहेंगे तुम्हारे 
सदा-सदा के लिए।  

जाओ अब तुम 
महाप्रयाण करो
स्वर्ग में निवास करो |

देखो  सभी देवता
तुम्हारे स्वागत
के लिए खड़े हैं।

अप्सरायें
तुम्हारे लिएफूलों की
वर्षा कर रही है। 

अलविदा महादानी
अलविदा जीवनदानी। 

Thursday, September 6, 2012

मेहनत






चींटी कितनी मेहनत करती
  कितना बड़ा वजन लेजाती,
              ऊपर चढ़ती - निचे गिरती
            लेकिन मंजिल पाकर रहती।

चूहा कितनी मेहनत करता
    छोटे - छोटे हाथ  चलाता,
              ढेंरों मिट्टी खोद निकालता
              कितना सुन्दर घर बनाता।

चिड़िया कितनी मेहनत करती
तिनका -तिनका चुन कर लाती,
                थकने का वो नाम न लेती
               कितना सुन्दर नीड़ बनाती।

मधुमखी कितनी मेहनत करती
  कभी न थकती कभी न रुकती,
                 फूलों से रस ले कर आती
               कितना मीठा शहद बनाती।

Friday, August 31, 2012

पिट्सबर्ग का मौसम





कब सोचा था कि  
अमेरिका के पिट्टसबर्ग में
जाकर रहना पडेगा। 

भाषा और चाल- चलन
को समझना पडेगा
सर्दी-गर्मी को भी सहना पडेगा।  

गर्मियों में होता है यहाँ
पंद्रह घंटों का दिन 
और नौ घंटों की रात।

सड़क पर पैदल चलना पड़े तो
गर्मी करदे बेहाल और देखते ही 
देखते बादल और बरसात।

फाल के मौसम में पेड़-पौधे 
छोड़ देते पुराना आवरण
और धारण करते नया परिधान।

नयी कोपले जब पेड़ो पर
नए रंग में निकलती है
नंदन बन से लगते है बागान।

सर्दियों में जब बर्फ गिरती है
चारो ओर उड़ते है बर्फ के फोहे
पूरा वातावरण ठिठुर जाता है।

सड़क, मकान और पेड पौधे
सब हिम के धवल कणो से
ढक जाते है।

सबसे सुन्दर होता है स्प्रिंग
जब चारों और रंग-बिरंगे
फूल खिलते हैं।

पेड़ फलो से लहलहा उठते है
घाटियां और मैदान फूलो से
ढक जाते है।

धरती पर ऐसा नजारा
बनता है की मन
आनंद से भर जाता है। 

लेकिन पराई जमीन
कितनी भी सुख दायक हो
अपना देश तो याद आता ह




Wednesday, August 29, 2012

गणतंत्र दिवस

छब्बीस जनवरी आई 
खुशियों की बौछारे लाई,
नर नारी मिल गाते गान
मेरा भारत देश महान।
नया जोश और नयी उम्मीदे
लेकर प्रति वर्ष आता यह,
सबका मन पुलकित करदे  
ऐसा पावन रास्ट्र पर्व यह।
आओ जन-गण-मन सत्यमेव जयते दोहराये
वीर शहीदों के नारों से
देश प्रेम की ज्योत जलायें।

अमीर-गरीब का भेद मिटा
जात-पांत को दूर भगाये
हर हाथ को काम मिले
ऐसा अपना देश बनाये।

मिल कर सभी करे प्रयास
दुनिया में हो देश का नाम
विश्व गुरु हम फिर कहलाये
दुनिया फिर से करे सम्मान।


Tuesday, August 28, 2012

सुन्दर रूप तिहारो





बालपने मुख माटी  खाई
मुख में तीनो लोक दिखाया
                 सूखे तंदुल चाव से  खाकर
                  बाल सखा का मान बढ़ाया

मीरा का विष अमृत कीनो
द्रोपद  सूत को चिर बढायो
                  ग्वाल-बल संग धेनु चराई
               गोपियन के संग रास रचायो

इंद्र कोप करयो ब्रज ऊपर
अँगुली पर गोवर्धन धारयो
                    पापी कंस को मार गिरायो
                     कपटी कौरव वंस मिटायो

गीता ज्ञान दियो अर्जुन को
   समर भूमि में बने खेवैया
                      कुँज गली में माखन खायो
                          कालिदेह के नाग नथैया

नाना रूप धरे प्रभु जग में
धरुँ ध्यान इस सूरत से
                            इतनो सुन्दर रूप तिहारो
                            अंखियां हटे नहीं मूरत से।   

भीगने का सुख

सुबह हम सब
विक्टोरिया में घूम रहे थे
अचानक आकाश काले
बदलो से ढक गया।

बिजलिया चमकने लगी
तेज हवाए चलने लगी
सभी बोले जल्दी चलो
मौसम बदल गया।

बाहर आते -आते
वर्षा शुरू हो गयी
भीगते हुए बाहर निकले
देखा मनोज नहीं आया।

सभी भीगते हुए
मनोज का इन्तजार
करने लगे थोड़ी देर बाद
मनोज भी आ गया।

पूछा- कहाँ रह गए थे
हम सब कब से तुम्हारा
इन्तजार कर रहे है
सब कुछ भीग गया।

वो सहज भाव से बोला-
वो छाता लिए खड़ी  थी
मेरा मन उसके छाते के निचे
भीगने का हो गया।

कनखियों से झांकते
नरेन्द्र जी गुनगुना रहे थे
हम थे वो थी और समां रंगीन
मन भी मचल गया।

गीत गाया तुमने






     मेरी अंधियारी राहों में
ज्योति दीप जलाया तुमने
                      बूँद-बूँद में अमृत भर 
                जीवन आश जगाई तुमने

जीवन के सुख-दुःख में
मेरा साथ निभाया तुमने
                    मेरे लिखे प्रेम गीतों को
                 अपने स्वर में गाया तुमने

   मेरी प्रति छाया बन कर
मुझको अंग लगाया तुमने
                      मेरे जीवन के हर रंग में
                      इंद्रधनुष सजाया तुमने

    मेरे चंचल नयनों में
राधा बन कर आई तुम
                     मेरी जीवन की बगियाँ में
                     सावन बन कर बरसी तुम

नाम भगीरथ रख कर भी
मै  ला न सका  गंगाधारा
                         तुम बनी स्वाती की बूँद
                        लेकर सागर से जल खारा ||

ठांइ-ठौंङ (राजस्थानी कविता )

पंछीड़ा
तू कियां सिंझ्या
ढळया पेली
आय'र बैठ जावै
साग्ये रूखंङा माथै
साग्ये डाली माथै 
ठांइ-ठौंङ।                     


कांई
एनाण-सैनाण है 
थार कनै
न कदैइ तू मारग भूल 
नीं तू कदैही भटकै
चाहै बिरखा बरसो
चाहै  बादळा  गरजो
तू  पूग ही ज्यावे पाछो
ठांइ-ठौंङ।                   


म्हें तनै देख;र 
लगाई ही पांख्या
उड़ग्यो आकासा मायं 
छोड़ गाँव,घर,आंगणो
पण आज तांइ
पाछो कोनी पूग सक्यो
ठांइ-ठौंङ। 
                  

आज भी चेतै आवै 
गाँव का खेत
ताजी पुनरा लहरका
अगुण कूवै रो मीठो पाणी 
आज भी फङफङाव है पांख्या 
पुगण ताई 
ठांइ-ठौंङ।                         
                            

पंछीड़ा तू आय
बैठ म्हारै कनै
बताव म्हने भी रासतो
कियाई पाछो पूग जावूँ 
गाँव के घर में                                                  
ठांइ-ठौंङ |         

Monday, August 27, 2012

यादों में गाँव






याद घणेरी आवे म्हाने
परदेशा में गाँव की ।
              भर बाटको छाछ राबड़ी
                   दोपारी में पिवण की।

दूध, दही और कांदा रोटी
घनै चाव से खावै  बठै।
              खीर,चूरमो और खीचड़ो
               देख हियो हुल सावै बठै।

काचर, बोर, काकड़ी मीठी
मीठा गटक मतीरा बठै।
             कैर,सांगरी, मोरण  सिट्टा
               सगला के मन भावै बठै।

सावण भादों बिरखा बरसे  
छमछम नाचै मोर बठै।
               तिजनियाँ हिलमिल गावै
                   मीसरी मघरा गीत बठै।

ऊँचा -ऊँचा धोरा ऊपर
उड़ती सोनल रेत बठै।
                रात चांदनी में अलगोजो
                        टैरे मूमल गीत बठै।

खेत खेत मे धोरा ऊपर
झुंपा- झोंपड़ियाँ बठै।
                  गोट उठै  धुंअै का उँचा
                    टाबर धूम मचावै बठै।

साँझ  पड्या गायां रंभाव
रीड़क काली भैस्यां बठै।
                 घर धिराणी  दही घमौड़
                  माखन भरिया माठ बठै।




युगयुगान्तर तक






चाँद के संग चांदनी
वैसे ही जुड़ा है
मेरे गीतों के संग
तुम्हारा नाम ।

मैंने कविता की
हर पंक्ति और हर छंद
में लिखा है
तुम्हारा नाम।

लोग कहते है
कवि मर जाता है 
लेकिन कविता
अमर रहती है।

एक बार लिखे
गए शब्द पीढ़ियों
यात्रा करने में 
सक्षम होते है।

मेरे ये गीत
कालांतर में जीवित रहेंगे
इनके साथ जुड़ा रहेगा
तुम्हारा नाम।

आनेवाली पीढियां
प्रेम से पढेगी
मेरे गीतों के साथ 
तुम्हारा नाम।

युगयुगान्तर तक
अमर रहेंगे
मेरे गीत
तुम्हारा नाम  |

Friday, August 24, 2012

गाँव की लुगायाँ (राजस्थानी कविता )



भौरानभोर उठती
पीसणो   पीसती
खीचड़ो   कूटती
रोट्या    पोंवती
गाँव की लुगायाँ। 

पूसपालो ल्यावंती
गायाँ  ने  नीरती 
दूध    ने   दुवती
बिलोवणो  करती
गाँव की लुगायाँ। 

बुहारी     काढ़ती
बरतन   मांजती
कपड़ा     धोंवती
टाबर बिलमावती
गाँव की लुगायाँ। 

खेत     जावंती
निनाण करांवती
सीट्या तुड़ावंती
खलो    कढावंती
गाँव की लुगायाँ। 

पाणी ल्यांवती
गोबर    थापती
माथो     बांवती
मेहंदी    मांडती
गाँव की लुगायाँ। 

बरत     करती
भजन   गांवती
पीपल  सींचती
काणी    सुनती
गाँव की लुगायाँ।

तातो जिमावती 
लुखी सूखी खांवती
सगळौ काम
सळटाया पछै सोंवती
गाँव की लुगाँया।


झूम रही है बाजरियाँ (राजस्थानी कविता )




सोनल वरणा धोंरियाँ  पर
मूँग, मोठ लहरावै रे
मोरण, सीटा और मतीरा
मरवण रे मन भावै रे
रे देखो खेता में झूम रही है बाजरियाँ।

सावण बरसे भादवो
मुलके मरुधर माटी रे
बणठण चाली तीजणया
हाथी हौदे तीज रे
रे देखो बागा में झूल रही है कामणियाँ।

होली आवे धूम मचावै
गूंजै फाग धमाल रे
चँग बजावे घीनड़  घाले
उड़े रंग गुलाल रे
रे देखो होली में नाच रही है फागणियाँ।

सरवर बौले सुवटा
बागां बोलै मोर रे
पणघट चाली गौरड़ी
कर सोलह सिंणगार रे
रे देखो पणघट पर बाज रही है पायलियाँ।

बिरखा रे आवण री बेल्या
चिड़ी नहावै रेत रे
आज पावणों आवलो
संदेशो देव काग रे
रे देखो मेड़ी पर बोल रियो है कागलियो।










कृष्णा और बरसात




मैंने  कृष्णा को
भीगा हुवा देख कर पूछा-
बरसात में छत पर
क्यों गए थे  ?

कृष्णा बाल शुलभ
नज़ाकत से बोला -
दादाजी परोपकार का
काम करने गया था 

मैंने आश्चर्य से पूछा -
भला बरसात में छतपर
तुम कौन सा परोपकार का काम
करने गया था ?

जब बरसात में कोई भी
नहीं भीगता तो स्वयं बरसात को
भीगना पड़ता है यही कल आपने
कहानी में बताया था 

आज मै छत पर
जाकर नहीं भीगता तो
स्वयं बरसात को
भीगना पड़ता

कृष्णा आँखे मटकाकर बोला 
और भीगने से बरसात को
सर्दी-जुकाम भी
हो जाता

इसलिए मै छत परचला गया
अब कम से कम  बरसात को
भीगना तो नहीं पड़ेगा
दादाजी। 

और अंत में आँखों मे एक भोली सी
शरारत लेकर वह बोला -
मेरा आज का परोपकार का
काम हो गया न दादाजी ?

गंगा




भगीरथ के  तप प्रताप से
तारण हार बन आई गंगा
                   
                   शिव की जटाओ  में  उतर 
                    कैलाश से निचे आई गंगा

हिम शिखरों को लगा अंग  
बल खाती हुयी आई  गंगा 
                   
                    नदी नालो को लेकर  संग
                    देश की नियंता बनी  गंगा

  अपने पथ को हरित बना
गावों को समृद्ध करे गंगा
                   
                     पान करा अमृत  सा जल
                     सागर से जाय मिले गंगा 

घाटो  पर सुन्दर  तीर्थ बने  
संतो की शरण स्थली गंगा
                 
                  जीवन दायिनी मोक्ष दायिनी 
                       भव सागर पार करे  गंगा
  
अन्तिम साँस थमे तट पर
   बैकुंठ की सीढ़ी बने गंगा
                       
                    दुखियों के दुःख को दूर करे 
                        जीवन  के पाप हरे गंगा।




जीवन रथ की वल्गा

चौबीसों घंटे ओक्सीजन
       मास्क लगाए रखना ,
          औषधियों के डिब्बो से
             हर समय घिरे रहना |

ओक्सिमिटर से सेचुरेशन
    लेवल चेक करते रहना,
      कन्सेंनट्रेटर और सिलेंडर
        को ऐडजस्ट करते रहना। 

दिनचर्या के सभी काम
प्रतिदिन स्वयं करना,
      खाना बनाना,घुमना, योग    
     और प्राणायाम सभी करना।                                                                   

मै आश्चर्य से देखता रहता हूँ
तुम्हारा ध्येर्य और विस्वास 
                   सभी करते है तुम्हारी प्रशंसा
              देख तुम्हारी हिम्मत और साहस।       

    लगता है  तुम्हारे जीवन का
झरना पाताल लोक से बहता है,
                  तुम्हारे जीवन रथ की वल्गा
             स्वयं प्रभु हाथ में थामे रखता है ।
  

Thursday, August 23, 2012

बूम चीक बूम चीक

                                                

         


  बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे
गाड़ी दौड़ी जाए रे
     बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे ।

गाँवौ को ज़ोडे शहरो से
शहरों को नगरों से जोड़े रे
भेद भाव नही इसके मन मे 
सबको साथ ले जाए रे 
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे ।


हर स्टेशन पर रुकती जाए
मंज़िल तक पहुँचाए रे 
हरा रंग का सिग्नल देखे 
सरपट भागी जाए रे 
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे।

घाटी पर्वत नदियाँ झरने 
सबको ये दिखलाए रे
सिटी बजाए शोर मचाए
गाड़ी भागी जाए रे 
    बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे।

काला गोरा मोटा पतला
सबको ये बैठाए रे
बच्चों के मन को भाए
नानी घर ले जाए रे
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे।  

दादाजी का आशीर्वाद






राहुल - अभिषेक

सफलता का पहला  स्वाद
तुमने आज  चखा 
हम सब को तुम पर गर्व है।

यह तो पहली सीढी है 
जिस पर तुमने पाँव रखा है
मंज़िल अभी बहुत दूर है।


अभी तो तुम्हे समुद्र की
अतुल गहराई से मोती
चुन कर लाने है।

नीले आसमान मे पंछी की
तरह उड़ कर आकाश
की उँचाई को मापना है।

जिंदगी के रंगीन
सपनो को जीवन मे
साकार करना है।

दिल के भावो को
सज़ा कर सुंदर गीतों
मे ढालना है।

मेहनत और परिश्रम
के बल तुम्हे अभी बहुत
दूर तलक जाना है।

हमारा आशीर्वाद
सदा तुम्हारे साथ रहेगा
तुम पर प्रभु कृपा बरसेगी ।

तुम्हारी आँखों मे
हर पल सूरज की रोशनी
जगमगाएगी।


तुम्हारे दिल  मे
हर पल  चंद्रमा की शीतलता
छाई रहेगी।

तुम्हारी वाणी मे
हर समय अग्नि का
ओज बसेगा।

तुम्हारे प्राणो मे
हर पल वायु देवता का
वास होगा।


जिंदगी मे सफलता
हर पल तुम्हारे कदम
चूमेग ।

दुनिया एक दिन
तुम्हारा नाम इज़्ज़त के
साथ लेगी ।

ढेर सारी शुभ कामनाओ के साथ

तुम्हारे दादाजी दादीजी
पिट्स बर्ग ( पेनसेलवेनिया )
अमेरिका  ।

गाँव की सर्दी






सर्दियों में जब कभी भी
गाँव की तरफ जाता
गाँव का भोगा बचपन सपने
जैसा सामने आ जाता।


बचपन के वो दिन जब
जाड़े  की सर्दी में ठिठुरते
हम सब बच्चे अल सुबह
बड़ी  माँ के घर चले जाते।


सूरज के सामने वाले
चबूतरे पर कम्बल और
रजाई में दुबक कर सभी
एक साथ बैठ जाते।


"सुरजी बाबा सुरजी बाबा
तावड़ो ही काढ़ थारा
छोरा-छोरी सींया ही मरै"#
की जोर-जोर से रट लगाते।


सूरज की पहली किरण
ज्योंही चबूतरे की दिवाल
पर उतरती हम सभी के 
चहरे खिल उठते।


बड़ी माँ ठंडी मिस्सी रोटी 
पर तेल लगा गरम करती
और हम सबको गरम-गरम
खाने को देती।


अब न वो दिन रहे
न तेल लगी रोटी रही
न देने वाली बड़ी माँ रही
लेकिन यादेँ है आज भी ताज़ी।


# हे सूर्य भगवान धूप निकालो, तुम्हारे बच्चे सर्दी से मर रहे हैं।






Wednesday, August 22, 2012

जुम्मन की स्त्री



आज का युग
विज्ञान और प्रोद्योगिकी में
बहुत आगे बढ़ गया है ।

अन्तरिक्ष में स्टेशन बन गए है
जहाँ वैज्ञानिक रिसर्च करते  हुए
अन्य ग्रहों पर जीवन  की खोज करते है ।

इंटरनेट और मोबाइल ने
दूर संचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी
पूरी दुनिया को एक साथ जोड़ दिया है।

मंगल ग्रह पर रोकेट भेजा जा रहा है
कृत्रिम बादलो से बरसात की जा रही है
समुद्र की तलहटी से तेल निकाला जा रहा है।

द्रुतगामी वायुयान बन गए है
जिनसे कम समय में एक देश से
दुसरे देश आना जाना संभव हो गया है।

लेकिन इन सबसे जुम्मन की स्त्री को
कोई फर्क नहीं पड़ा, उसे तो रोज सड़क के किनारे
बैठ कर भरी दुपहरी में भी गिट्टी ही तोड़ना है।

और ठेकेदार की बुरी नजर से बचते हुए
अपने बच्चे को दूध पिलाने के बहाने
किसी पेड़ की छांव में सुख ढुंढना है।







Tuesday, August 21, 2012

पिट्सबर्ग





पहाड़ों में बसा सुन्दर शहर
तीन नदियों का संगम स्थल
हरे भरे खेत,गोल्फ के मैदान
एवर ग्रीन सिटी - पिट्सबर्ग 

जंगलो में ट्रेकिंग, बाइकिंग ,कैम्पिंग
नदियों में बोटिंग, राफ्टिंग, रोविंग   
केसीनो,बैले थियेटर,कॉफ़ी हाउस
सिटी ऑफ़ इंटरटेनमेंट - पिट्सबर्ग 

सड़कों पर दौड़ती रंगीन गाड़ियाँ
पुटपाथों पर दौड़ते लड़के-लड़कियां
सर्राटे से भागती हुई साईकलें 
रनिंग सिटी - पिट्सबर्ग 

घरों के सामने सुन्दर बगीचे
रंग -बिरंगे खुशबू वाले फूल
चेरी, ऐपरिकोट,स्ट्राबेरी के पेड़
सिटी ऑफ़ फ्लोवर्स- पिट्सबर्ग 

हस्ट-पुष्ट और स्वस्थ नागरिक
चहरों  पर हँसी और मुस्कराहट
परिश्रमी, दयालु  और परोपकारी   
ऐनरजेटिक  सिटी - पिट्सबर्ग    

फुटबाल, होकी, टेनिस के खिलाड़ी  
बेसबाल और गोल्फ के शोकीन
पाईरेट्स-स्टीलर्स-पेंगुइन के मुकाबले
सिटी ऑफ़ चेम्पियनस - पिट्सबर्ग

मेडीसिन और ट्रांसप्लांट सर्जरी में
विश्व में विख्यात यु. पी. ऍम. सी.
टेकनोलोजी में अग्रणी सी. ऍम. यु.
आठ  युनिवर्सिटीज का शहर - पिट्सबर्ग

पहाड़ों पर अनेक किस्म के पेड़  
फूलों से  लदी रंग बिरंगी झाड़ियाँ
फाल में नंदन कानन का सौन्दर्य
अमेरिका का मिनी स्वर्ग - पिट्सबर्ग

आकाश में चांदनी बिखेरता चाँद 
तारों से झिलमिलाती सुनहरी रातें
चारो ओर चमचमाते हुए जुगनू
प्राइड ऑफ अमेरिका  - पिट्सबर्ग ।

Monday, August 20, 2012

पुस्तके







पुस्तको की भी एक
अलग दुनिया होती है
जिसे हम समझ सकते है।

जैसे कुछ पुस्तके ड्राइंग रूम
की शोभा होती है जो हमेशा
ड्राइंग रूम में ही सजी रहती है।

कुछ पुस्तके सजी-संवरी होती है
जिन्हें देख कर एक बार हाथ में
उठाने का मन करता है।

कुछ पुस्तके कालजयी होती है
जिन पर नए नए शोधग्रंथ छपते है
और हम पढ़ते रहते है।

कुछ पुस्तके नीरस होती है
जो केवल सूचनाओं से भरी रहती है
जरुरत के समय हम उन्हें पढ़ते है।

कुछ पुस्तके दुःख-दर्द की गाथाओ
से भरी रहती है जिन्हें पढ़ कर हम
दुःख के सागर में डूब जाते है।

कुछ पुस्तके कब आई और कब
गयी पता भी नहीं चलता
केवल नाम मिलता है।

कुछ पुस्तके शिक्षाप्रद होती है
जिन्हें पढ़ कर ज्ञान मिलता है
जीवन को नयी राह मिलती है।

कुछ पुस्तके भाग्यशाली होती है
जिन्हें विनम्रता के साथ खोला
और आदर के साथ पढ़ा जाता है।

कुछ पुस्तके बड़ी बदनसीब होती है
जिन्हें रटने के काम में लिया जाता है
गुलाब के मुरझाये फुल इन्ही में मिलते है।

कुछ पुस्तको के मधुर शब्द
हमारे होठों पर बैठ जाते है और
हम उन्हें आनंद से गुनगुनाते है ।

कुछ पुस्तके अँधेरे के गर्त में पड़ी
रहती है जिन्हें कभी कोई अन्वेषक
ढूंढ़ कर बाहर निकालता है।

कुछ पुस्तके महान लेखको के द्वारा
लिखी होती है जिन्हें उत्सुकता और
सम्मान के साथ पढ़ा जाता है।

कुछ पुस्तके कालजयी होती है
जो हर वर्ष संवर्धित,संशोधित होकर
नए संस्करण में छप कर आती  है।



























Sunday, August 19, 2012

मरुधर (राजस्थानी कविता )





नावं सुण्या सुख उपजै
   हिवड़े हरख अपार ।
                इस्यो मरुधर देश में
                घणी करे मनवार ।।     


मरुधर सावण सोवणो
      बरस मुसलधार । 
                मरवण ऊबी खेत में
                  गावै राग मल्हार।।


सोनल वरणा धोरिया
    मीसरी मघरा बैर ।
         बाजरी की सौरभ गमकै
             ले-ले मरुधर ल्हैर ।।


पल में निकले तावड़ो 
     पल में ठंडी छांह ।
              इस्या मरुधर देश में
             खेजड़ल्या री छांह ।।


मरुधर साँझ सुहावणी
बाजै झीणी बाळ ।
           बालक घैरै बाछड़या
           गायां लार गुवाल ।।


रिमझिम बरसे भादवो
      छतरी ताने मौर ।
           मरुधर म्हारो सोवणों
           सगला रो सिरमौर ।।


छैला झुमै फाग में
गूंजे राग धमाल ।
           घूमर घालै गोरड्या
              उड़े रंग गुलाल ।।











ट्रांसप्लांट





कोर्डिनेटर ने कहा -
वो हमें फोन करेगी
हमें अपना फ़ोन
चालु रखना  है।

फ़ोन कब करेगी
वो नहीं जानती
लेकिन हमें फ़ोन 
पास में रखना है।

जैसे ही उन्हें हमारे
लिए लंग्ज मिलेंगे,
वे हमें फ़ोन करेंगे
हमें तैयार रहना है।

फ़ोन आने के बाद
खाना-पीना नहीं है
चार घंटे के अन्दर
अस्पताल पहुँचना है ।

हमें हर पल इन्तजार
रहता है उस फ़ोन का,
जैसे चातक को रहता है
बरसात की बूंद का ।

हम आये है पिट्सबर्ग
लंग्ज ट्रांसप्लांट करवाने
इन्तजार करना होगा
ट्रांसप्लांट करवाना होगा ।












अपना बनाना





मै तुम्हारे
नाम का उच्चारण
दुनिया की प्रत्येक भाषा
में करना चाहता हूँ

मै तुम्हारे
एक-एक रोम में
अपने प्यार को मुदित
करना चाहता हूँ

मै तुम्हारे
करुणा, प्रेम और त्याग का
पर्याय दुनिया की प्रत्येक भाषा में
ढूढंना चाहता हूँ

मै  तुम्हे उन
हज़ारो नामों से पुकारना चाहता हूँ
जन्म जन्मान्तर के लिए अपना
बनाना चाहता हूँ

मै फूल की
हर पंखुड़ी पर तुम्हारा नाम
अपने हाथों से लिखना
चाहता हूँ

मै फूल की
खुशबू के साथ-साथ
तुम्हारा नाम पुरी दुनिया में
फैलाना चाहता हूँ।



Friday, August 17, 2012

फैनिल हँसी






माँ की गोद में सोया
बच्चा टुकुर-टुकुर
माँ की तरफ
देख रहा है।

माँ बच्चे के
मुख को देख-देख
मंद-मंद मुस्करा
रही है।

माँ बच्चे को
गुदगुदाती हुयी
हँसाती है एक
फैनिल हँसी।

बच्चे को
हँसता देख माँ के
चहरे पर भी आजाती
प्यारी सी हँसी।

बच्चे की आँख की चमक
माँ के चहरे की दमक
बता रही है दोनों ओर
असीम आनंद की
अनुभूती।













कावड़िये






सावन  महीना आते  ही
सड़को पर दौड़े कावड़िये
               रंग -बिरंगे  कपड़े  पहने
              जय शम्भु बोले कावड़िये
                                बम  बम  बोले कावड़िये।    

फुल  और  मालाओं  से
कावड़ सजाते कावड़िये
              कलशो में भर गंगा जल
              पूजा  करवाते  कावड़िये
                                    बम बम बोले कावड़िये।

कन्धों पर रख कावड़ को
मस्ती में चलते कावड़िये
              मीलो पैदल चल -चल कर
              शिव पूजन करते कावड़िये
                                     बम बम बोले कावड़िये।

मार्ग  के कंकर-पत्थर  से
नहीं घबराते ये कावड़िये
                खून  बहे  चाहे जितना
                नहीं थकते ये कावड़िये
                                  बम बम बोले कावड़िये।

लगा   भोग   शंकर    के
भांग  घोटते    कावड़िये
               खाते-पीते  मस्ती करते
               चलते   जाते    कावड़िये
                                   बम बम बोले कावड़िये।

सुन्दर-सुन्दर शिविरों में
थकान  मिटाते कावड़िये
                हलवा-पुड़ी,खीर-जलेबी
                भोग  लगाते   कावड़िये
                                    बम बम बोले कावड़िये।

अबकी सावन गंगा को
स्वछ  करेंगे  कावड़िये
                     अगले सावन हर हर गंगे
                     फिर   बोलेंगे   कावड़िये
                                       बम बम बोले कावड़िये।















वो पीता है








मै भानु प्रताप से बोला  -
इतनी मत पिया करो
ये मौत की सहेली है
इससे दूर ही रहा करो।

वो बोला -
मै कहाँ ज्यादा पीता हूँ
सिर्फ एक पेग लेता हूँ
दिन भर मस्त रहता हूँ।

मैंने आश्चर्य से पूछा -
फिर क्यों रोज एक
बोतल खरीद कर
लाते हो।

वह एक दार्शनिक
अंदाज  में बोला -
मै तुमको समझाता हूँ
असली माजरा बताता हूँ।

एक पेग पीने के बाद
फिर मै "मै" नहीं रहता
मै तो फिर
"वो"बन जाता हूँ।

फिर मै नहीं पीता
वो पीता है और
मै उसे आराम से
पिलाता  हूँ।

Thursday, August 16, 2012

माँ और बाबूजी

बाबूजी
जब खाना खाने बैठते तब माँ
आसन बिछा कर पाटा लगा देती

बगल में
एक लोटा और गिलास
पानी का भर कर रख देती

बाबूजी
लोटे से हाथ धोकर
शांत भाव से आसन पर बैठ जाते

माँ
थाली में खाना परोस कर
बगल में पंखा झलने बैठ जाती

बाबूजी
मनुहार के साथ खाना खाते हुए
माँ को घर-बाहर की बाते बताते

बाबूजी
खाना खाने के बाद जब  हाथ पौछते
माँ गमछा पकड़ा देती

माँ
जब जूठी थाली उठाती तो उसके चेहरे
पर एक संतोष का भाव होता

माँ
ही समझ पाती उस आनंद को
दुसरा नहीं समझ पाता

आज
भाग दौड़ भरी जिंदगी में कोई इस
आनंद की कल्पना भी नहीं कर सकता।












दुःख और दर्द






अपने दुःख और दर्द को
कम करना है तो दूसरों के
दुःख और दर्द को देखो।

एक दिन किसी सरकारी
अस्पताल के जनरल वार्ड का
चक्कर लगा कर देखो।

तब समझोगे दुःख क्या होता है
कैसे लोग दुःख-दर्द को साहस
और धीरज से झेलते है।

उन तंग गलियों का चक्कर लगाओ
जहाँ ठन्डे चूल्हे पर रखी खाली पतीली
से बच्चो को बहलाते है।

जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर
माँ के सीने से दूध के लिए तब
समझोगे अभाव क्या होता है।

दुनिया में सभी को दुःख होता है
किसी को कम तो किसी को
ज्यादा झेलना पड़ता है।

हमें अपने दुःख-दर्द और अभाव  का
रोना छोड़ कर सामर्थ्यानुसार 
दूसरों का भला करना चाहिए।

जरूरतमंद की सहायता और
बीमार का इलाज कराना चाहिए
धन का सदुपयोग करना चाहिए। 

समन्दर के किनारे






समन्दर के किनारे
देखा लहरें आ रही थी 
किनारे से टकरा कर जा रही थी
जीवन में दुःख-सुख भी तो
इसी तरह से आते-जाते हैं।

समन्दर के किनारे
पड़ी रेत को मुट्ठी में उठाया
देखा कण-कण निकलता जा रहा है
जीवन भी तो इसी तरह क्षण-क्षण
बीतता जा रहा है।  

समन्दर के किनारे
पड़ी सीपियों को देखा जो
अपना अनमोल मोती खो चुकी थी
मानव जीवन भी तो अनमोल है जिसे
हम व्येर्थ में खोते जा रहे हैं। 


मै विचारों में खोया  सोचने लगा 
तभी पीछे से लहर की आवाज आई
मै जीवन की बाजी जीत गयी
समन्दर बोला-अब लौटजा 
तुम्हारी अवधि बीत गयी ।





Monday, August 13, 2012

प्रेसबी की नर्स "रोज "

प्रेसबी की नर्स  "रोज "
मनीष से  बाते कर रही थी
बगल मे खड़ा डॉक्टर
काफ़ी देर से  सुन रहा था

उसने रोज से पूछा -
क्या तुम इसे जानती हो ?
रोज तपाक से बोली -हाँ
यह मेरा छोटा भाई है

मै थोड़ी ज्यादा गौरी हुँ
ये थोड़ा कम गौरा है
लेकिन मै भी अब
इसकी तरह होने लग गयी हूँ

थोड़े दिनो मे
हम दोनो  का रंग
एक जैसा हो जाएगा
फिर तुम नही पूछोगे

और उसी के साथ "रोज"का
चिर परिचित हँसी का
एक जोरदार ठहाका
डॉक्टर झेंप कर हँसने लगा। 

पिट्टसबर्ग की नर्स - निस्वार्थ सेवा

हमें लंग्ज ट्रांसप्लांट के लिए
जांच करवानी थी लेकिन
जांच डिपार्टमेंट आगे का
समय दे रहा था 

मनीष  अपनी तरफ से कोशिश 
कर रहा था लेकिन किसी 
भी तरह से काम बन 
नही रहा था ।

मनीष कुछ चिंतित खड़ा था
उधर से  नर्स "रोज़" आई
उसने  ने पूछा-क्या बात है
कुछ उदास लगता है।

मनीष ने परेसानी बताई
रोज़ बोली चिंता मत करो
मेरा दोस्त इसमें काम करता है।

आधा घंटे बाद रोज़ का मसेज आया
कल सुबह साढ़े छ बजे चले जाना
हमारे आश्चर्य की सीमा नहीं रही ।

रोज़ की नम्रता और निस्वार्थ
सेवा भाव से हम द्रवित हो गये
लेकिन रोज गोड ब्लेस्ड यू कहती रही ।

पिट्टसबर्ग की नर्स

अमेरिका का सबसे बड़ा
मेडिकल सेंटर और
दुनिया का नम्बर वन
ट्रांसप्लाट सर्जरी सेंटर।

"यु पी अम सी" यानी
युनिवर्सिटी ऑफ़
पिट्टस बर्ग
मेडिकल सेंटर।

उसी का एक हॉस्पिटल
"प्रेसवीटेरियन" और
हार्ट कैथ डिपार्टमेन्ट मे
काम करने वाली नर्स "रोज"।

गुलाब की तरह  खिलनेवाली
खिलखिला कर हँसने वाली
डिपार्टमेंट में सबकी प्यारी
जिन्दादिल नर्स "रोज"।

किसी की भी सहायता
करने का अवसर मिलते ही
जैसे मन मयूर नाच उठता
सेवा करके खुश होती "रोज।"

उसकी हँसी का ठहाका पूरे
डीपार्टमेंट मे गूँजता
जब भी हंसती दिल खोल
कर हंसती "रोज' .

हँसते दूसरे भी
लेकिन वो हँसते कम
मुस्कराते ज़्यादा
ठहाका लगाती सिर्फ़ "रोज"

जब भी हँसती बेड पर सोया
बीमार भी मुस्करा उठता   
सबको अपना बनाने वाली
प्यारी नर्स "रोज़" .





कलैंडर नहीं जीवन बदलो





प्रत्येक महीने हम
बदलते रहते है कलैन्डर
लेकिन नही बदलते जीवन

तारीख़े लाल घेरों
मे ही क़ैद रह जाती है
मुट्ठी से बालू  की तरह
खिसक जाता है जीवन

न जाने कितनी
पूनम की राते
दरवाजे की सांकल
बजा कर ही लौट जाती है          

पूरब की बंसन्ती हवाऐ
बिना मन को झकझोङे
ही चली जाती है

चैत की औस-भीगी सुबह
हमारी अंगड़ाई से पहले ही
निकल जाती है

आजकल तो धूप भी
बंद दरवाजों को  देख कर
सीढ़ियों से ही लौट जाती है

जीवन का आनन्द लेना है 
तो प्रकृति से जुड़ना होगा
किसी नौका में बैठ
नदी
की सैर पर जाना होगा 

पहाड़ की ऊँची 
चोटी पर चढ़ना होगा
बादलो की कोख से निकलते

सूर्योदय को देखना होगा 

फुलो पर मंडराते भँवरों
का गुंजन सुनना होगा 
डूबते हुए सूर्यास्त का
नजारा देखना होगा

यदि जीवन का सच्चा आनंद लेना है 
तो कलैण्डर नहीं जीवन को
भी बदलना होगा।

Sunday, August 12, 2012

जूते की पहचान




रास्ते की ठोकरों को  झेलता रहा जूता 
 पाँवों    को  ठोकर से बचाता रहा जूता,
                                                                           सर्दी हो या गर्मी, बसंत हो  या बरसात 
                                                                              हर  मौसम मे साथ निभाता रहा जूता ।

 
रेगिस्तान की बालू मे झुलस्ता रहा जूता
 पहाड़ों के पत्थरो से देह रगङता रहा जूता,
                                                                               सियाचीन की ठंडक मे मुस्तेद  रहा जूता 
                                                                                हर जगह पाँवों का रक्षक बनता रहा जूता। 

 
रैस   के   मैदान   मे   दौङता रहा जूता
खेल   के मैदान   मे  खेलता रहा जूता,
                                                                             जंग   के   मैदान   मे  लड़ता रहा जूता
                                                                               पाँवों   को   हिम्मत बँधाता रहा   जूता ।


जंगलो   की   खाक  छानता  रहा जूता
 रास्तों  का  भूगोल   लिखता रहा जूता, 
                                                                              पैरो  के पसीने   को   चखता रहा जूता 
                                                                                 घर के  दरवाजे  पर   पड़ा   रहा   जूता ।

 
र्हिमालय की  चोटी को लाँघ आया जूता
अंटार्टिका की बर्फ  को चूम आया जूता,  
                                                                                    चाँद  तक   का सफर कर  आया जूता
                                                                                  फिर भी  नाम रोशन नही कर पाया जूता। 

  
   इन्सान की कामयाबी मे साथ रहा जूता 
           होली पर गले का हार बनता रहा जूता,     
                                                                                 जब से नेताओ  के  सिर पड़ने लगा जूता 
                                                                                   तभी से अपनी पहचान   बना पाया जूता।