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Monday, December 25, 2017

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं

भूल गया मैं सब रंगरलियाँ
सुख गई खुशियों की बगियाँ
जीवन की झांझर बेला में
पाई मैंने विछोह की पीड़ा

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा। 

लाख बार मन को समझाया
फिर भी मन नहीं भरमाया 
आँखों से अश्रु जल बहता 
कैसे छिपाऊं मन की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा।

डुब गया सूरज खुशियों का
संग-सफर छूटा जीवन का  
तुम तो मुक्त हुई जीवन से
मैंने पाई वियोग की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा।



 ( यह कविता "कुछ अनकही ***"में छप गई है। )