Monday, July 26, 2010

उड़ जाये चिड़िया फुर्र




मुर्गा    बांग    लगाये   उससे
पहले   चिड़िया   उठ    जाती,
सूरज   के   उगने   से   पहले
आकर   मुझे   जगा     जाती,
बैठ मुंडेर के ऊपर -उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

  चीं -चीं  कर  आँगन में  आती   
घर में सबके   मन  को भाती,
फुदक फुदक कर  उडती  जाती
बड़े    मजे   से    गाना    गाती,
चुग्गा ले थोडा सा उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

 जंगल - जंगल उड़   उड़  जाती   
मुँह में  तिनका  दबा  के  लाती,
  लगा- लगा कर एक एक तिनका
अपना  सुन्दर   नीड़    बनाती,  
नन्ही नन्ही आँख नचा -उड़ जाये चिड़िया फुर्र |

खेतों -खलिहानों   में    जाती
चुन -चुन करके  दाना  लाती,
ची-चीं  करते  निज बच्चो  के
डाल चोंच  में  चुग्गा  खिलाती,
सुना के लोरी बच्चो को - उड़ जाये चिड़िया फुर्र  |

दिन भर चिड़िया उडती रहती
थकने  का वो  नाम  न   लेती,
हमें  सीख    वो दे   कर जाती
श्रम  करके   चढ़  जावो  चोटी,
 लक्ष्य आसमां का देकर - उड़ जाये चिड़िया फुर्र |



गीता भवन
२५  जुलाई ,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Friday, July 23, 2010

मेरी रामायण का राम



मै एक नयी
रामायण का अंकन करूँगा
जो एक आदर्श
रामायण
होगी 

मेरा राम सूर्पनखा का
  नाक काटने के लिए 
  भाई लक्ष्मण को
    नहीं भेजेगा 

मेरा राम सीता के कहने पर
  स्वर्ण मृग को मारने 
  नहीं जायेगा

मेरा राम सुग्रीव से मित्रता
  करने  के लिए कपट से
  बाली का वध
 नहीं करेगा 

मेरा राम अशोक वाटिका से
सीता को लाकर उसकी
उसकी अग्नि परीक्षा
नहीं लेगा

मेरा राम रजक के कहने से
  आसन्न-प्रसवा  सीता को
 वन में छोड़ने नहीं
 भेजेगा 

मेरा राम चारो भाइयो के
 साथ सरयू में जाकर 
  समाधि नहीं
 लेगा

मेरी रामायण का राम एक
आदर्श मानवीय मूल्यों
 का धारक राम
होगा।



कोलकाता
२३ जुलाई,२०१०

Wednesday, July 21, 2010

रैलियाँ

 


कोलकाता और रैलियाँ  
दोनों का चोली-दामन
का साथ है। 

कोलकाता है तो रैलियाँ हैं,
रैलियाँ है तो समझो ये
कोलकात है। 

यहां कोई भी कभी भी
रैली निकाल
लेता है। 

 रैलियाँ का बड़ा आयोजन
राजनैतिक पार्टियां
 करती हैं। 

इनकी  रैलियाँ कोलकाता  का
 चक्का जाम करने में
 सक्षम होती हैं।

  स्त्रियों के गोद में बच्चे,
   पुरुषो के टकते थैले,
     हाथो में झंडे,
      पहचान है इन रैलियों की।

महानगर की सडकों पर
अजगर की तरह सरकती है
ये रैलियाँ।

इनके पीछेपीछे
चलती रहती हैं

सायरन बजाती एम्बुलेंस 
जिसमे कोई मरणासन्न
रोगी सोया रहता है।

घंटी बजाती दमकल
 जिसे कहीं लगी हुयी आग को
 बुझाने पहुचना है। 

प्रसूता जिसे अविलम्ब
सहायता के लिए
अस्पताल पहुंचना है।

लेकिन रैलियों की भीड़
इन सबकी नहीं
सुनती।

वो गला फाड़-फाड़
कर  नारे लगाती
 रहती है।

जिनका अर्थ वो
 स्वयं भी नहीं
जानती है।

   .इन्कलाब जिंदाबाद
        जिंदाबाद  जिंदाबाद !



कोलकत्ता
८ सितम्बर,  २०१०


(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, July 20, 2010

अन्तर


तुलसीदास जी
अपनी पत्नी से
बहुत प्रेम करते थे

लेकिन पत्नी के
व्यंग बाणों से आहत हो
घर छोड़ जंगल में चले गये 

निर्वासित जीवन जी कर 
उन्होंने रामचरित मानस
जैसा काब्य लिखा

मै भी
अपनी पत्नी से
बहुत प्रेम करता हूँ

लेकिन पत्नी के
व्यंग बाणों से कभी
विचलित नहीं होता हूँ

वो चाहे जितना भी डांटे
मै अपने कान पर जूं तक
नहीं रेंगने देता हूँ

आराम से घर में बैठ कर 
चाय की चुस्कियों के साथ
कविता रुपी  काब्य
लिखता रहता हूँ।


गीता  भवन  
२० जुलाई , २०१०                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              

Saturday, July 17, 2010

भक्तगण



गर्मियों की शाम
स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश)
गंगा का तट
पानी में नहाते
भक्तगण। 

ठंडी-ठंडी हँवाए
शांत गंगा जल
घाटो पर ध्यान लगाते
भक्तगण। 

गीता भवन का घाट
श्री गौरी संकर जी के
सानिध्य में 
शिव महिमा स्त्रोत्र का
 पाठ करते
भक्तगण। 

परमार्थ निकेतन का घाट
मुनि श्री चिन्मया नन्द जी के
सानिध्य में
गंगा आरती करते
भक्तगण। 

वानप्रस्थ आश्रम
श्री मुरारी बापू के
सानिध्य में
भागवत कथा का
रसपान करते
भक्तगण। 

श्री वेद निकेतन धाम
  विश्व गुरूजी के
सानिध्य में
हठयोग का 
 प्रशिक्षण लेते   
भक्तगण। 

आध्यात्मिक भक्ति -भाव
के सानिध्य में
गंगा में दीपक
अर्पित करते 
कितने अच्छे लगते हैं
भक्तगण। 



गीता भवन
१६ जुलाई, 2010
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, July 13, 2010

भेड़ चाल


भेड़ गर्मिंयो में  
लू के थपेड़े खा कर
जलती देह पर ऊन उगाती हैं। 

सर्दियों में खुद
 ठंडी हवाओ के थपेड़े
सहती रहती है।

लेकिन अपनी
ऊन दूसरो को कम्बल
 बनाने के लिए दे देती है। 

इंसान आज तक
भेड़ चाल के नाम पर
 कटाक्ष ही करता आया है। 

 क्या उसने कभी
 भेड़ के इस त्याग को भी
  समझ ने की चेष्टा की है ?
    
गीता भवन
१२ जुलाई,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )