Saturday, May 30, 2015

म्हारी काळजा री कौर कठै गई (राजस्थानी कविता )

आभा उड़ती कुरजा सागै
तू भेजती संदेशो
काळजै री कोरां मांय थारै
झबकती ओळूं'री बिजलियाँ
वा मोत्यां मूंघी मूळक कठै गई 
म्हारी काळजा री कौर कठै गई। 


मेड़ी चढ़ हरख अर उमाव सूं उडीकती
दरवाजै री औट स्यूं गैळ मांय झाँकती
म्हनै देख'र हरख पळकतो
थारै हाथा री चूड़ियाँ री झणकार में
वा हरख-उमाव आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई।


डागळा सूं तू उड़ावंती काला काग
हैत भरिया हीयै स्यूं गांवती अमीणा गीत
आखी रैंण करती हर'रा बिड़द बखाण 
दीवळा रै च्यानण लिखती हैत'रा संदेसा
वा हैत-प्रीत री डोर आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]






देखो कैसा भूकम्प आ गया

अंदर में चट्टाने खिसक गई
धरती ऊपर तक थरथरा गई
हजारों को ज़िंदा दफना दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

ऐतिहासिक  धरोहरें ढह गई
अट्टालिकाएं चुर - चूर हो गई
घरों को मिट्टी में मिला दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

विनाश का चक्र घूम गया
हजारों को कंगाल बना गया
हर कोई स्तब्ध रह गया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।

प्रकृति का गुस्सा बोल रहा
पर्यावरण बचाओ कह रहा
रुस्ट है धरा यह बता दिया
देखो कैसा भूकम्प आ गया।







Monday, May 11, 2015

कुछ अनकही ....


गुलमोहर की छाँव तले
मैं आज लिखने बैठा
   कुछ अनकही .... 

चमकते जुगनू
दिखाते रहे प्रेम-भाव 
       लिखने कुछ अनकही .... 

चाँद की चाँदनी 
छिटकती रही रात भर 
      लिखते कुछ अनकही .... 

नन्हें सितारे 
बिखेरते रहे दूधिया रोशनी 
          लिखने कुछ अनकही ....     

समूची कायनात 
 दे रही थी साथ
             लिखने कुछ अनकही ....    

मैं हथेली पर
नाम लिखता रहा
बातें याद करता रहा
   जो रह गई कुछ अनकही ...

















Thursday, May 7, 2015

तुम से फिर मिलूंगा

तुम्हारे महाप्रयाण को देख
आँखों से अश्रुओं की
सरिता बहने लगी

साँसें अंदर से
लम्बी और गहरी
निकलने लगी

मैं तुम्हारे मुखमंडल को
दोनों हाथों से सहलाने लगा
काश! तुम कुछ बोलो

अपनी अंतिम बेला में
दो शब्द कहने के लिए
काश ! तुम अपना मुँह खोलो

लेकिन तुम तो
अलविदा की बेला में भी
निस्पृह थी

गर्व से ऊँचा मस्तक
शान्ती से मुंदी आँखें
त्याग की प्रतिमूर्ति
लग रही थी

लेकिन सुकून था मेरे दिल में
कि एक दिन मैं तुम से
फिर मिलूंगा

पता नहीं कहाँ और किस तरह
पर तुम से जरूर मिलूंगा
उस पराजगत में ही सही
लेकिन मिलूंगा।


                                                     [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Tuesday, May 5, 2015

शर्मशार हो रही है मानवता

अफगानिस्तान  के
सुदूर पहाड़ी इलाको में
अमरीकी द्रोण बरपा रहें हैं कहर

आकाश की तरफ देखते हुए
अपने खण्डर बने घर में
आँचल में छिपाए बच्चे की माँ
सोचती है काश भगवान ही
उसकी कोई मदद कर देता

पर यहाँ तो आकाश से ही
आग बरस रही है
चारों ओर सुनाई दे रहा है
आहतो का क्रन्दन
बिखरे पड़े है क्षत- वीक्षत
शरीरों के लोथड़े

कोई नहीं बचा है बाकी
जलते घरों और
सड़ती लाशों के बीच
शर्मशार हो रही है मानवता।







Monday, May 4, 2015

जीवन के सुख-चैन चले गए

जीना तो अब केवल एक मज़बूरी रह गई                           
प्यार भरे दिन तो तुम्हारे संग ही चले गए।                                            

                                                             जीवन के उपवन में अब कोई बहार नहीं रही
                                                             मोहब्बतें - इजहार तो तुम्हारे संग ही चले गए।

बेपनाह बातें और मुलाकाते, यादें बन रह गई 
रूप,रस,गंध,स्पर्श तो तुम्हारे संग ही चले गए। 
      
                                                            अब तो केवल यादों के संग गुजर रही है जिंदगी 
                                                             चापल्य और उन्माद तो तुम्हारे संग ही चले गए।   
                                                                                            
अब तो रातों में सुख की नींद भी नहीं आती
सुनहरे ख्वाब तो सारे तुम्हारे संग ही चले गए। 

                                                                  
                                              तन्हाई के दर्द को सहने  मैं अकेला रह गया                      
                                                             जीवन के सुख -चैन तो तुम्हारे संग ही चले गए।      
 

[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]

Friday, May 1, 2015

तुमने बहुत छोटा जीवन जिया

उस दिन तुमने अपनी
नारी-जन सुलभ चातुरी से
मेरी नादानी को बिसरा दिया

चली गयी तुम मुझे बिना बताये
अपने सामने मेरी आँख से
आँसूं भी नहीं गिरने दिया

वैसे अच्छा किया तुमने
वरना तुम वैधव्य का जीवन
सहन भी नहीं कर पाती

बहुत कठिन होती यह राह
क्या तुम विछोह का दर्द
सहन कर पाती ?

तुम तो बिना मांग भरे
और बिना बिंदी लगाए
एक दिन भी नहीं रह पाती

नित नयी रंग-बिरंगी
साड़ियाँ पहने वाली क्या तुम
सफ़ेद साड़ी पहन पाती

मुझे दुःख केवल इस बात का है
कि इस बड़े युग में भी तुमने
बहुत छोटा जीवन जीया।


  [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]