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Friday, March 25, 2016

समा जाओ मेरी बाहों में

सरसों झूम रही है खेतों में
आम्र मंजरी महक उठी है बागों में            
 अनुरागी भंवरा ढूंढ़ रहा कलियों को          
कोयलियां कुक रही है कुंजों में       

       मुस्करा कर ऋतुराज 
भर रहा बसंत को बाहों में 
     रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
          बाग़ और बगीचों में  
     
           बसंती चादर ओढ़
   सरसों झूम उठी है खेतों में     
    लताऐं कर रही पेड़ों का आलिंगन                
  गौरैया फुदक रही है आँगन में         

          लौट आओ तुम भी
              मदमाते बसंत की बहारों में              
     आकर एक बार फिर से
        समा जाओ मेरी बाँहों में।     



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]