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Friday, May 20, 2016

खुशियाँ खो गई खँडहरों में

उजड़ गया मेरा चमन
लूट गयी मेरी बहारें
मुरझा गई प्यार की कली
फूल बन गए अंगारें

मिल गया अनन्त
विछोह का दर्द
साथ रह गया केवल
यादों का अथाह समुद्र

कुछ समय के लिए
आई थी जीवन में बहार
लेकिन अब तो जिन्दगी भर
पतझड़ ही बनेगा कहार

अब सिर उठाने को
न भोर है न सूरज है
और न सिर छिपाने को
शाम है न चाँद है

घसीटता रहूंगा 
जिंदगी के सलीब को 
बना कर सहारा 
तुम्हारी यादों को। 



[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]