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Tuesday, June 11, 2013

गंगा घाट

गंगा घाट पर
शाम के समय बैठ जाते हम
किनारे खड़ी नौका में

लहरों के थपेड़ो से
डोलती रहती नौका और हम
झुलते रहते नौका में

याद है मुझे आज भी
वो पुरे चाँद की रात जब
हम दोनों बैठे हुए थे नौका में

चाँद का प्रतिबिम्ब
इठला रहा था नदी में और लहरे
किनारे को छु लौट रही थी जल में

तुम जल तरंग सी
स्वर लहरी में भजन गा रही थी
बैठी हुयी नौका में

तुम्हारा भजन मुझे
कभी प्रवचन तो कभी पावन श्रुति
सा लग रहा था गंगा जल में

चाँद भी साथ-साथ हँस रहा था
चांदनी भी खिलखिला रही थी
गंगा के बहते जल में

तुम्हारी साँसों से कस्तुरी और
रोम-रोम से चन्दन की सुगंध
महक रही थी नौका में

तुम्हारी सुवास आभास करा रही थी
असंख्य स्वर्गिक अनुभूतियों का
गंगा घाट पर नौका में।


  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]